रमेश दिविक

कवि, अध्येता ‌और अनुवादक रमेश दिविक जी की कविताएँ बड़ी सहजता से बड़ी से बड़ी बात कह जाती हैं। जिन्दगी को कविता से जोड़ने के लिए यह स्वाभाविकता आवश्यक है।


आग को जब प्यार कह गया

मैंने कहा प्यार
और उससे उसके अर्थ की जगह आग निकली

मैंने चाहत कहा
और उससे भी अर्थ की जगह आग निकली

मैंने हर बार वह शब्द कहा ऐसे ही
उससे अर्थ की जगह आग ही निकली

ऐसा क्यों हुआ

क्यों बचता रहा आग को आग कहने से
क्यों टालता रहा
भीतर के असल शब्द को
किसी दूसरे शब्द से?

सोचता हूँ
ऐसा क्यों होता है
बहुसंख्यक लोगों!
तुम्हारी तरह बस सोचता हूँ

माँ

रोज-सुबह,मुँह-अंधेरे
दूध बिलोने से पहले
माँ
चक्की पीसती,
और मैं
घुमेड़े में
आराम से
सोता।

तारीफों में बंधी
माँ
जिसे मैंने कभी
सोते
नहीं देखा।

आज
जवान होने पर
एक प्रश्न घुमड़ कर आया है-

पिसती
चक्की थी
या माँ?


पंख

दरवाजा
शायद खुला रह गया है

इसी राह से
आया होगा उड़कर
यह खूबसूरत पंख!

खिड़कियाँ तो सभी बन्द हैं।

शायद सामने वाले पेड़ पर
कोई नया पक्षी आया है।

हो सकता है
बहुत दिनों से रह रहा हो।

दरवाजा खुला हो
तो, जरूरी नहीं
अन्धड़-तूफान ही
घुस आए घर में

खूबसूरत पंख भी तो
आ सकता है
उड़कर।
 


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