सुदर्शन प्रियदर्शनी


सुदर्शन प्रियदर्शनी की कविता को मैं नकार नहीं पाती हूँ, संभवतः इसलिए कि वे बेहद सरल लगती हुई सहजता से निसृत नहीं हुई हैं, इन सामान्य से दिखने वाले शब्दों के पीछे अदमनीय वेदना दिखती है, जिसे वही जान पाता है जो नसे गुजरा हो।
इस बार हम पुनः सुदर्शन प्रियदर्शनी की कुछ कविताओं के साथ प्रस्तुत हुए हैं।

भटकन

इतना
मायावी
तांत्रिक, जाल
इतना भक भक
उजाला...
इतना भास्कर
देय तेज
इतनी भयावह
हरियाली..
इतना .. ताम झाम
इतने मुँह बाये
खड़े सगे सम्बन्धी
पहले से ही
तय रास्ते
पगडंडियाँ..
और छोड़ देता
है.. वह नियन्ता
हमें सूरदास
की तरह
राह टटोलने...।

पुल

जिन्दगी
नदी पर
बना हुआ
लकड़ी
का वह
अस्थायी पुल है
जिस पर हम
डगमगाते डोलते
हिलोरें खाते
भयभीत
नीचे खाई में
न झाँकने
का प्रयास
करते
उस पार
पहुँचने की
ललक लिए
चलते
चले जाते हैं।
 


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