अशोक गुप्ता की कविता


अशोक गुप्ता केमिकल इंजीनियर हैं, किन्तु कविता में भी रुचि है। अशोक गुप्ता की कविता में सपास की घटनाएँ सहज रूप से उजागर हुई हैं, जो शैली की अपेक्षा कथन के माध्यम से अधिक प्रभावित करतीं होती हैं।

रामला

वह एक फटी कमीज पहने
झाड़ू बर्तन कपड़े करने
हर रोज आता ।

मैंने उसे एक कमीज दी
जो मैं पहनता नहीं था
फिर एक
फिर एक और
पर वह फिर ही फटी कमीज पहने
झाड़ू बर्तन कपड़े करने
हर रोज आता ।

"क्यों"?, मैं पूछता
हर बार उसका जवाब होता
" घर भेज दी भाई के पास डूंगरपुर"
और वह फिर वही फटी कमीज पहने
झाड़ू बर्तन कपड़े करने
हर रोज आता ।

दादा जी

दादा जी और उनकी साइकिल के पीछे
बच्चे दौड़ते थे
झोपड़ी और बंगलों वालों के।
दादाजी की काली बड़ी देह
खिचड़ी सी दाढ़ी
और सीट के पीछे लटकती
लम्बी लहराती कमीज
चौड़ी मोहरी का पजामा
वे रोज गुजरते
उसी रास्ते
पैडल मारते

बच्चे देखते ही चिल्लाते
" दादाजी दादाजी"
और पीछे भागते
जब तक कि वे
पैर टिका
रंगबिरंगी पिपरमेन्ट
न दे देते

वे ज्यों ही चलते
बच्चे फिर भागने लगते
पीछे पीछे
जब तक कि वे
काफी दूर न निकल जाते

समय बदला
बच्चे बच्चे न रहे
एक दिन वे मुझे
अचानक मिल गए
किसी झोपड़ी के सामने
खटिया पर लेटे

उनके दायें अंग में लकवा था
वे सुन नहीं पाते थे
मैंने अपना कान उनके
बाये कान के किया
ओर जोर से बोला
"दादाजी दादाजी"

उन्होंने मुझे देखा
फिर धीरे धीरे मुड़े
एक लाल पीपरमेन्ट निकाल
मेरे हाथ पर रख दी

 


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