शोभनाथ यादव


शोभनाथ यादव की कविताएँ अभी भी हारे उस अंग की बात करतीं हैं, जिन्हें हमारा समाज बड़ी तेजी से भुला रहा है। झोपड़ी से बादल निहारना कल्पना नहीं हकीकत है, जिसे समझने में हम सदैव भूल कर जाते हैं

श्वेत धुले बादल

ऊपर से नीचे तक
पसरती चली गईँ
हरियाली के मखमली गलीचे पर
उठे हुए सफेद मकानों की पंक्ति
खिले श्वेत कुबेरों की तरह!
और
ऊपर ऐरावत जैसे
विशाल पर्वतों पर
सफेद धुले बादल
महाश्वेता अपसराओं से
नजर आते हैं हवा में उड़ते हुए!
यहाँ मैं जमीन पर
अपनी झुग्गी झोपड़ी में
सिमटा हुआ
ताक रहा हूँ उन्हे
निःशब्द मन से!

 


मेरी बात | समकालीन कविता | कविता के बारे में | मेरी पसन्द | कवि अग्रज
हमसे मिलिए | पुराने अंक | रचनाएँ भेजिए | पत्र लिखिए | मुख्य पृष्ठ