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कविवर त्रिलोचन
सोचा
न था, तुम चल दोगे
यूं यह चमन छोड़कर,
न देखा तुम्हें ,
न मिल ही पाया तुमसे कभी,
जिंदगी में ताउम्र मलाल रह गया।
ढूँढ़ूं कहां बाबा त्रिलोचन तुम्हें अब -
(चिरानीपट्टी में, काशी में या गाजियाबाद में?)
दर-ब-दर भटक कर
कहीं पाया है 'गर
तुम्हारा अक़्स तो
तुम्हारे अक्षर में
जिसे जतन से संजोया है
तुमने अपनी हर कविता में।
जिंदा रहेगा हरदम
फक्कड़ बांकपन तुम्हारा
हर भा-रत जन के
कवि-मन में। - (कविवर त्रिलोचन जी को श्रद्धांजलि)
जब कविता में होश संभाला तो कविवर त्रिलोचन इस दुनिया से विदा हो
चुके थे। नागार्जुन और शमशेर के बाद आधुनिक हिंदी कविता के त्रयी
के अंतिम स्तंभ बाबा त्रिलोचन के सांसों की डोर गत 9 दिसम्बर,2007
को गाजियाबाद में टूट गयी। उनके बाद कविता में आधुनिकता और परंपरा
का ऐसा अद्भूत समागम और कहां पाऊंगा?
त्रिलोचन भारतीय लोकचित्त के सबसे बड़े कवि हैं। कविता-कर्म उनके
लिये तप के बराबर था जिसके लिए वे कोई भी जोखिम उठाने को तैयार थे।
अपनी साधारण लगने वाली कविताओं में उन्होंने जिस काव्य-मूल्य की
सृष्टि की, वह आज के काव्य-परिदृश्य में एक उल्लेखनीय और
युगांतरकारी घटना मानी जा रही है जिसका ठीक -ठीक पहचाना जाना हिंदी
काव्यालोचना परंपरा के लिये एक गहरी चुनौती है। यह सोचकर घोर अचरज
होता है और दु:ख भी कि, पहले तो जीवन के अत्यंत सन्निकट या संपृक्त
रहने वाली त्रिलोचन की सरल-बोधगम्य रचनाओं को अन्यमनस्क होकर देखा
गया या फ़िर उपेक्षणीय मानकर त्याज्य कर दिया गया पर अन्य मानदंडों
पर रची गयी कविताएं जब देर तक दृश्य में नहीं टिक पायीं और
बाज़ारवाद की आंधी में बिखरने लगी, तो पुन: सबका ध्यान त्रिलोचन की
कविता पर केंद्रित होने लगा। यह आधुनिकतावादियों के काव्य-चिंतन पर
एक सवालिया निशान है।
जहां तक सृजनात्मक और रचनाधारित आलोचना का प्रश्न है, हमारे आलोचक
की अध्ययन-परम्परा भी गहन-गंभीर और संदर्भमूलक नहीं है। यहां
रचनाकारों के व्यक्तित्व-कृतित्व को माँजने और गुनने के बजाय
आलोचकों द्वारा उनके संबंध में अपनी नकारात्मक टिप्पणी और निष्कर्ष
ही अधिक दिये जाते हैं। जो काव्य के पारखी-आलोचक हैं वे भी अपने
यशस्वी मायालोक से इतने ग्रस्त रहते हैं कि उनका आलोचना-विवेक भी
लगभग आलोचना-अहंकार का पर्याय बन जाता है। अपने-अपने
पूर्वग्रह,विवाद और सुविधाओं के लालच और दुराग्रहों के कारण वे
आलोचना की खास ज़मीन और वज़ह खोजते हैं, इस कारण तटस्थ नहीं रह
पाते। संभवत: इन्हीं कारणों से त्रिलोचन के काव्य-संसार का अब तक न
तो समग्र मूल्यांकन हो पाया, न उनकी वह प्रतिष्ठा ही हिंदी साहित्य
में हो पायी जिसके वे सही मानो में हक़दार थे। अब जब नहीं रहे बाबा
तो समालोचकों की नींद खुल रही है। यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।
लोकरस की सच्ची कविताओं की विलक्षणता की पहचान में विलंब का एक और
कारण उत्तर-आधुनिकता और पश्चिम के विजातीय विचार का भारतीय संस्कार
में तीव्र और विवेकहीन सम्मिलन भी है। लोक का जीवन और सौंदर्य तो
उसके श्रम की संस्कृति से उद्भूत होता है पर जब तथाकथित विकास की
आँधी हमारे यहां तेज हो गयी तो उसके वेग में लोक हाशिए पर धकेला
गया, इसके सृजन को अविकसित, रूढ़, पारंपरिक और छोटी पहल की कहकर हेय
समझा गया क्योंकि वह विचार पूँजी के संस्कार से फलित होता है
जिसमें जीवन का रस कृत्रिम और देहवाद, निरा कलावाद और रुपवाद से
निस्सरित होता है। इस बारे में लोक के पक्षपाती समीक्षक डा. जीवन
सिंह का विचार ध्यातव्य है। वे कहते है कि-"दरअस्ल बौद्धिकता के
ज्वार में हमने कविता में सरसता और भावपरायणता को इतना दरकिनार
किया है कि ये बातें कविता के लिये अछूत जैसी बना दी गयी है। इनमें
उन आलोचकों का भी हाथ रहा है जो अपनी काव्य-परंपराओं को भूलकर
विदेशी काव्य-चिंतन के पीछे इतने पड़े कि अपनी सुध-बुध ही भूल
गये।.....उसकी अनदेखी करके जो रचना होगी, वह नई और आधुनिक तो होगी
परन्तु आत्मिक स्तर पर उतनी समृद्ध और पूर्ण नहीं होगी।" उपर्युक्त
कारणद्वय से आधुनिक पाठकों और बडे़ आलोचकों कवियों की लिस्ट में
त्रिलोचन जी को पीछे रख दिया गया। पर उन्होंने कभी इसकी परवाह नहीं
की, न हार मानी। हरदम अपना देशी ठाठ और सृजन का अलग ढर्रा बनाये
रखा क्योंकि त्रिलोचन के कवि-प्रकृति को पता था कि लोकहृदय ही
दुनिया में मानवता की संस्कृति रच सकेगी।
त्रिलोचन के काव्यलोक से जुड़ा एक अहम् सवाल यह है कि उनकी कविता का
जनमानस में देर तक टिकने और आकर्षण की वज़ह क्या है। इस कारण की
जाँच-बीच उनके काव्यविवेक और उसमें अंतर्निहित रुप और वस्तु को
बिना समझे नहीं किया जा सकता।
उनकी सोच में प्रगाढ़ पार्थिवता थी जो उनके लोकसंस्कारी स्वभाव के
कारण उनकी कविताओं में स्वत: लक्षित होता है। वे गाँव के
कृषक-संस्कार के काफ़ी करीब थे जो उन्हें चिरानीपट्टी गाँव और काशी
में मिला था। चिरानीपट्टी ने उनको लोक की समझ दी और काशी ने काव्य-
चिंतन की। उनका लोक जिन तत्वों से बना है, उसमें बडी़-बडी़ बातों
के लिये जगह नहीं। इसलिये त्रिलोचन बातूनी कवि नहीं थे। बिना
लाग लपेट के सीधे अपनी बात कहने में विश्वास करते थे, इसलिये कविता
के बाहर भी निकल आना चाहते थे अर्थात् कला के बंधन में नहीं फँसते
थे। वे वस्तु के निकटतम स्थानापन्न, बल्कि वही हो जाना चाहते थे।
जैसे जहां जिस रुप में देखा, हू-ब-हू वैसा ही रच दिया। अपनी ओर से
जोड़-तोड़ से परहेज बरतते थे। यही लोक का स्वभाव भी है,यानि खरा,
पवित्र। यहां भावना प्रधान होती है, न कि कला। वैसे भी रीतिकाल के
बाद साहित्य में जीवन का सतत विकास और कला का पराभव ही दृष्टिगत
हुआ है। कहने का अर्थ है कि वे हृदय से लिखते थे,बल्कि यूं कहें कि
कविता को अपना हृदय ही दे देना चाहते थे। कलम की दिमागी कसरत नहीं
करते थे। उन्होंने खुद कहा है-
"मुझे वह रुप नहीं मिला है जिससे कोई/ सुंदर कहलाता है,हृदय मिला
है/ जिससे मनुष्यता का निर्मल कमल खिला है।"
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने वाल्मीकि के काव्य-सौष्ठव का उल्लेख करते
हुए कहीं कहा है कि"किस सूक्ष्मता के साथ कवि कुलगुरू ने ऐसे
प्राकृतिक व्यापारों का निरीक्षण किया है,जिनको बिना किसी अनूठी
उक्ति के गिना देना ही कल्पना का परिष्कार और भाव का संचार करने के
लिये बहुत है।" इसी परिप्रेक्ष्य में त्रिलोचन की काव्यकला भी
देखनी-परखनी चाहिए। कविता में कला का सायास यत्न कभी उन्होंने नहीं
किया, इसलिये उक्तियों की वक्रता, गूढ़ता और अनूठेपन का सहारा भी
नहीं लिया। प्रकृति, लोक और जीवन का सूक्ष्म निरीक्षण ही स्वयं
त्रिलोचन की कविता को कला का रुपाकार देते हैं। ऐसा, विरल कवियों
में लक्षित होता है और इसे कलाहीन कला और जीवन की कला (an artless
art for life) की संज्ञा दी जा सकती है।
अभिव्यक्ति की इस कला में उनकी भाषिक संरचना का भी कम योग नहीं है।
भाषा के प्रति त्रिलोचन आरम्भ (1950-51) से ही सजग थे। उनकी भाषा
सबसे अलग, अनूठी और कला की ही तरह सरल है जिसका ठेठ देशज जातीय रुप
ही उसकी पहचान है और महानता भी। बोली, भाषा के साथ यहां इतने
रचे-बसे हैं कि इसका संश्लेषण इतने व्यापक रुप में किसी अन्य कवि
की रचना में गोचर नहीं होता। तद्भव-तत्सम का यह संश्लिष्ट रचाव
बडे़ विस्मयपूर्ण ढंग से उनकी कविता में खुरदुरे और क्लासिक चीजों
का मेल कराती है जो अकल्पनीय है। अपनी भाषा के इस प्रकृत गुण को
त्रिलोचन ने सदैव बनाए रखा। तत्सम शब्दावलियों में भी उनकी भाषिक
संरचना उतनी ही महत्वपूर्ण है।
त्रिलोचन की कविताओं में अभिव्यक्ति की सहजता (simplicity of
expression) भी इतनी अन्यतम है कि वह नये काव्य-सौंदर्य का सृजन
करती है जिसका पाठक के मन पर दीर्घ और गहरा प्रभाव पड़ता है। यह
सहजता मात्र लोक की बानगी के कारण नहीं है, अपितु भाषा की तरलता,
हृदय-तत्व के समावेशीकरण और कवि की स्वयं की प्रकृति और
"प्रयत्नहीन कला" (effortless art) के हुनर का परिणाम है जो मात्र
त्रिलोचन के यहां विपुलता के साथ देखा जा सकता है। इसलिये यह
अद्भुत है, एकल है और इसका विशेष महत्व है।
प्रस्तुति
सुशील कुमार (प्रिन्ट
पत्रिका के लिए लिखित
)
क्रमशः
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