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कविवर त्रिलोचन
पिछले लेख के आगे
हिंदी काव्य में लोकधर्मिता और प्रगतिशील आधुनिकता का निर्वहन
त्रिलोचन के अलावे कई अन्य कवियों ने भी बखूबी किया है जैसे
नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल,अरुणकमल आदि ने। पर त्रिलोचन के कवि
में लोकजीवन का जितना विस्तार और जितनी सघनता है उतने दूसरे कवियों
में अपेक्षाकृत कमतर और बाह्यतर है। नागार्जुन अधिक ठोस है, अत:
आघात भी करते है। शमशेर में अस्तित्व की उन्मुक्तता अधिक है,
इसलिये उड़ान भरते हैं। केदार में सामाजिक यथार्थवाद से पूरित
प्रगतिशीलता अधिक है तो अरुणकमल में जीवन को भरने की ललक। इन सबका
अपना-अपना महत्व है पर त्रिलोचन किसान-लोक के ज्यादा करीब हैं
जिसमें भारत की आत्मा बसती है, इसलिये जीवन के प्रति निष्कवच
खुलापन त्रिलोचन को आधुनिकता और लोकधर्मिता के वृहत्तर दायरे में
लेकर चलती है। यहां जीवन से गहरा लगाव,जन के साथ तादात्म्य और
संघर्ष में तपकर निखरते जीवन के प्रति विराट निष्ठाबोध ही सच्चे
अर्थों में त्रिलोचन को आधुनिक बनाता है। यह आधुनिकता न तो आयातित
है, न अंधविश्वास या स्वांग भर। इस आधुनिकता का भारतीय संदर्भ है।
यह भी नोट करने योग्य है कि यह आधुनिकता रुढियों, वर्जनाओं और
जर्जर परंपराओं के विरोध में खड़ी तो है पर अपना निष्कर्ष नहीं
देती। दूसरे शब्दों में, यहां अंतरंग अनुभवों का सादा बयान है
जिसमें व्यवस्था के प्रति अराजक विद्रोही स्वर नहीं है। ऐसे
अनुभवों को त्रिलोचन बिना अलंकार, बिंब, प्रतीक, जैसे काव्य
उपादानों के कविता में रखते है पर लोक की अटूट सन्निबद्धता के चलते
कविता दमकने लगती है-
उस दिन चम्पा आई , मैने कहा कि
चम्पा, तुम भी पढ़ लो
हारे गाढ़े काम सरेगा
गांधी बाबा की इच्छा है -
सब जन पढ़ना लिखना सीखें
चम्पा ने यह कहा कि
मैं तो नहीं पढ़ूंगी
तुम तो कहते थे गांधी बाबा अच्छे हैं
वे पढ़ने लिखने की कैसे बात कहेंगे
मैं तो नहीं पढ़ूंगी
मैने कहा चम्पा, पढ़ लेना अच्छा है
ब्याह तुम्हारा होगा, तुम गौने जाओगी,
कुछ दिन बालम सँग साथ रह चला जायेगा जब कलकत्ता
बड़ी दूर है वह कलकत्ता
कैसे उसे सँदेसा दोगी
कैसे उसके पत्र पढ़ोगी
चम्पा पढ़ लेना अच्छा है!
चम्पा बोली : तुम कितने झूठे हो, देखा ,
हाय राम , तुम पढ़-लिख कर इतने झूठे हो
मैं तो ब्याह कभी न करुंगी
और कहीं जो ब्याह हो गया
तो मैं अपने बालम को संग साथ रखूंगी
कलकत्ता में कभी न जाने दूंगी
कलकत्ता पर बजर गिरे.
('चंपा काले -काल्र अच्छर नहीं चीन्हती' से)
कितना सादा,किंतु अर्थपूर्ण बयान है!
त्रिलोचन की कविता ही उदाहरण है कि उन्होंने जीवन की पाठशाला में
ही काव्य की दीक्षा ली है जो अपने लोक से उन्हें मिली है। इसी
रास्ते चलकर कविता को एक चेतन मन और स्पंदित समाज की अभिव्यक्ति का
आकार प्रदान कर पाये हैं। विकास का अर्थ उनके लिये जीवन में ही है,
उससे बाहर नहीं। जीवनेतर प्रगति व्यर्थ है, मिथ्या है उनके लिये!-
जीवन में ही प्रगति भरी है, अलग नहीं है।
जो बाहर है वस्तु तत्व से दूर कहीं है ।
स्पष्ट है, उनके जीवनधर्मी काव्यविवेक में ही परिवर्त्तन और प्रगति
की सार्थकता छिपी है। यहां यह भी लक्ष्य किया जाना चाहिए कि जीवन
में जटिलता भी है,दु:ख भी,अकेलापन भी, अथाह शून्यता भी, पर इन
विपदाओं का सर्वत्र रागालाप नहीं है।त्रिलोचन का कवि स्वीकारता तो
है कि पीड़ा है पर उससे वह टूटा- हारा नहीं है, हताश होकर बैठ नहीं
गया है। वह सदैव दु:खों की माला नहीं जपता। वह कर्मयोगी है। वह दुख
के सामने तनकर खड़ा होता है और अपने काम में व्यस्त हो जाता है। वह
दैव के भरोसे भी नहीं रहता, बल्कि कर्म-पथ पर अग्रसर हो जाता है,
अदम्य तत्परता के साथ। वह जीवन के उत्सव में हमेशा साझी है, चाहे
दुख हो या सुख क्योंकि उसकी जिजीविषा दृढ़ है-
संकोचों से सागर तरना
शक्य नहीं है
अगर चाहते हो तुम जीना
धक्के मारो इसी भीड़ पर,इससे डरना
जीवन को विनष्ट करना है
उर्वर होता है जीवन भी आघातों से
विकसित होता है,बढ़ता है उत्पातों से।
या फिर,
लड़ो बंधु हे,जैसे रघु ने इंद्र से लड़ा था/
क्रूर देव सम्मुख मानव दृढ़ खड़ा था।
यह जीवन के प्रति त्रिलोचन के गहरे अंतर्निष्ठा का प्रमाण है जिसे
वे जीवन के व्यापक प्रसार में देखते हैं। लोकहृदय की ऐसी पहचान
बनानेवाले जीवनधर्मी कवि को आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने सच्चा कवि
कहा है जो त्रिलोचन के कवि की उचित संज्ञा है। वह कविता को समाज के
सबसे न्यूनतम तबके से उठाते हैं यानि श्रमिक या किसान से। अपने
विचार,भाव और जीवन -सत्व भी वहीं से ग्रहण करते हैं। मानवता के
गहरे विश्वासी-कवि त्रिलोचन मानते हैं कि -
"उस जनपद का कवि हूँ जो भूखा दूखा है,
नंगा है, अनजान है, कला--नहीं जानता
कैसी होती है क्या है, वह नहीं मानता
कविता कुछ भी दे सकती है। कब सूखा है
उसके जीवन का सोता, इतिहास ही बता
सकता है। वह उदासीन बिलकुल अपने से,
अपने समाज से है; दुनिया को सपने से
अलग नहीं मानता, उसे कुछ भी नहीं पता
दुनिया कहाँ से कहाँ पहूँची; अब समाज में
वे विचार रह गये नही हैं जिन को ढोता
चला जा रहा है वह, अपने आँसू बोता
विफल मनोरथ होने पर अथवा अकाज में।
धरम कमाता है वह तुलसीकृत रामायण
सुन पढ़ कर, जपता है नारायण नारायण।"
त्रिलोचन इस तरह भावों की गहराई के कवि हैं, वे उसका नाटक नहीं
करते। वे दुख-दर्दों की हाला पीकर और भी उर्जावान होकर काव्य-सृजन
करते हैं। यह उनके दृढ व्यक्तित्व को इगित करता है। आज मानवता के
ह्रास का एक बड़ा कारण चरित्र का दोहरापन है और कई बार तो चरित्र के
विचलन को ही आधुनिकता का पर्याय मान लिया जाता है क्योंकि सरप्लस
पूंजी ने मानव के सबंधों को सिर्फ़ धन -संबंधों में ही बदलने का
कार्य किया है और सुख की झूठी परिभाषा की है। परंतु उनके चरित्र का
ठोसपन और एकनिष्ठता वस्तुत: आधुनिकता का भारतीय संदर्भ है जिसकी
जड़ें हमारी परंपरा और संस्कृति में है जो वे अपने पारंपरिक ज्ञान
और संस्कार से लेते हैं । यही कारण है कि इनके प्राण-तत्व के रुप
में तुलसी और निराला उनके आदर्श हैं जिनकी गुरुता उन्होंने
स्वीकारी है हॉलाकि दोनो अलग-अलग काल और परिस्थितियों के कवि हैं
परंतु त्रिलोचन के अंतस में समाकर एकरस हो गये हैं। अत: उनकी
परंपरा किताबी नहीं वरन् संस्कार-जन्य और व्यावहारिक है। कविता के
बीज भी उनके बाल्य-मन में लोकगीतों (चीरानीपट्टी में गाये जाने
वाले गीत यथा; चौताल,उलारा आदि) से ही फलीभूत हुए। इसलिये वे अपनी
ज़मीन को कभी नहीं भूलते। पर यह भी गौर करने के लायक है कि वे
उदार विकसित जीवन के पक्ष में हैं यानि नवाचारी जीवनोन्मुख गतिविधि
के हिमायती हैं। उसके लिये अपने मन के द्वार बंद नहीं रखते।
त्रिलोचन की कविताओं में आकर्षण का एक और कारण है, उनकी कविताओं
में बड़ी मात्रा में लोक-चित्रों और प्रकृति का समुपस्थित होना। वे
अपने आस-पास की प्रकृति का सूक्ष्म निरीक्षण करते हैं, उनकी बारीक
गतिविधियों का अवगाहन करते हैं और सादी भाषा की लड़ियों में पिरोकर
कविता की सुन्दर माला रच देते हैं। इस प्रकार प्रकृति के व्यापारों
से न्यस्त होकर उनकी कविता में कला का स्वत: प्रस्फूटन हो जाता है
अथवा कहें कि, वे कला के लिये कविता नहीं करते थे। इसलिये उनकी
कविता में वक्रता और गूढ़ता की जगह आत्मीयता और सरलता का बोध होता
है। यही उनका कलावाद है-
"पवन शान्त नहीं है"-
आज पवन शांत नहीं है श्यामा /देखो शांत खड़े उन आमों को /हिलाए दे
रहा है /उस नीम को /झकझोर रहा है /और देखो तो /तुम्हारी कभी साड़ी
खींचता है /कभी ब्लाउज़ /कभी बाल /धूल को उड़ाता है /बग़ीचों और
खेतों के /सूखे तृण-पात नहीं छोड़ता है /कितना अधीर है /तुम्हारे
वस्त्र बार बार खींचता है /और तुम्हें बार बार आग्रह से /छूता है
/यौवन का ऎसा ही प्रभाव है /सभी को यह उद्वेलित करता है /आओ ज़रा
देर और घूमें फिरें /पवन आज उद्धत है /वृक्ष-लता-तृण-वीरुध नाचते
हैं /चौपाए कुलेल करते हैं /और चिड़ियाँ बोलती हैं।
वर्तमान समय में त्रिलोचन के कविता की प्रासंगिकता - 1990 के बाद
अपने देश में उदारीकरण और वैश्वीकरण का जादू सिर चढ़कर बोलने लगा।
यह एक ऐसा सर्वग्रासी विचार है जिसमें मानव के वही मूल्य, वस्तु,
कला और प्रयत्न टिक पायेंगे जो बाजार के पक्ष में हो और
उपभोक्ता-मनुष्य के लिये उपयोगी हो क्योंकि यह विचार जीवन और
संस्कृति के हरेक कर्म, वाक्य, शब्द और परिणाम को एक बिकाऊ उत्पाद
में बदल देने पर आमादा है। ऐसे में भारतीय साहित्य के देशज चरित्र
के नष्ट हो जाने का खतरा स्वाभाविक है। साथ ही यह आदमी में ऐसी
रुचि को उत्पन्न करने का उपक्रम कर रहा है जो बाजार और विज्ञापन की
भाषा को तरज़ीह दे। यह सृजन, विचार और आत्मिक भाव की भाषा को हाशिए
पर रखता है। इस कारण त्रिलोचन और ऐसे अन्य कवियों को लोग क्योंकर
पढेंगे? लोककला, लोकसंस्कृति और लोकसाहित्य तो उस ज़मीन का पता
देते हैं जिसके विषय में ये रचे जाते हैं। अत: वैश्वीकरण मनुष्य के
लोकोन्मुखी प्रकृति पर ही वार करता है और वह मनुष्य के सोचने के
ढंग को ही बदल देना चाहता है।
दूसरी ओर, लोक की कोख़ से जन्मा साहित्य मनुष्य को उसकी अपनी
अस्मिता और ज़मीन से जोड़ता है। दुनियाभर में श्रम की संस्कृति को
प्रतिस्थापित करता है और आदर भी। इसलिये कहा जा सकता है कि यह
मनुष्यता की संस्कृति में विश्वास रखता है। इस संदर्भ में त्रिलोचन
की कविता को देखने से यह पता चलता है कि उनकी कविता उस लोक-हृदय का
पता देती है जिसमें बाजार के लिये जगह नहीं। अत: बाजार से बेजार
होते इस लोक-समय में उनकी कविताओं का महत्व और बढ़ जाता है जो बाजार
के विपरीत, मानव की मूल संवेदना को जगाने में समर्थ है क्योंकि
दुनियाभर में संप्रति चल रहे लूट-खसोट, छल-छद्म, हिंसा, दंभ,
अहंकार, प्रदर्शन ,अन्याय और उत्पीड़न से अलग वह एक प्रेममय,
विलक्षण संसार की रचना करता है जिसमें सच्चाई को प्रतिष्ठित करने
की और आदमी को झूठ से अलगाने की शब्दों की ताक़त है।
अत: वरिष्ठ कवि और समालोचक विजेंद्र जी ('कृतिओर' के सम्पादक) की
यह उक्ति हमें स्वीकारने में तनिक भी संकोच नहीं कि "त्रिलोचन
मनीषी भी हैं। तपस्वी भी। कविता उनके अत्यंत दायित्वशील जीवन का
पर्याय है। उन्होंने कविता का मान रखने के लिये हर बड़ा जोखिम उठाकर
हमारे लिये एक अनुकरणीय प्रतिमान रचा है। ऐसे कवि ही अपनी जाति के
गौरव होते हैं। आनेवाली पीढियां उनसे प्रेरणा लेती हैं। ऐसी कविता
हमारे लिये हर समय ज्योति-स्तंभ का कार्य करती है। त्रिलोचन जैसे
कवि अपने समय का भेदन कर उसे इस प्रकार अतिक्रमित करते हैं जो हमें
भविष्य के कवि भी लग सकें।"
इसलिये त्रिलोचन के शब्दकर्म की पुनर्पुन: समीक्षा और प्रतिष्ठा
वर्तमान समय की माँग भी
प्रस्तुति
सुशील कुमार (प्रिन्ट
पत्रिका के लिए लिखित
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