कृत्या प्रकाशन की  पुस्तकें
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पिछले चार अंकों से हम ऋतुसंहार का हिन्दी अनुवाद दे रहे हैं, जिसे हिन्दी के प्रशस्त साहित्यकार रांगेय राघव जी ने किया था। यद्यपि कालिदास की साहित्यिक कृतियों में ऋतुसंहार लघु- कृति के रूप में जाना जाता है, फिर भी पूरी कृति का अनुवाद देना संभव नहीं लग रहा है, इसलिए हम सभी ऋतुओं के बारे में कुछ श्लोकों को देंगे। इस बार हम हेमन्त ऋतु से सम्बन्धित श्लोकों के अनुवाद को दे रहे हैं।

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            लो प्रिये हेमन्त आया!

नव प्रवालोद्गम कुसुम प्रिय, लोध पुष्प प्रफुल्ल सुन्दर,
पके शाली, तुहिन हत हो पद्य खोये मलिन होकर,
किन्तु कुसुम राग रंजित अब विलासिनि पनिस्तन है,
रूपरशालिनि वक्ष पे ाब कुन्द इन्दु तुषार सित है
हरि मोती के रहे हिल, नयन में उल्लास छाया,

              लो प्रिये हेमन्त आया!

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बाहुयुग्मों पर विलासिनि
           के वलय अन्गद नहीं हैं
नव दुकूल न नितम्बों पर
           कमल श्री पद में नहीं है,
पीन उन्नत स्तनों पर
           अंशुक नहीं वे सूक्ष्म दिखते,
हेम रत्न प्रदीप्त मेखल
           से नितम्ब न और सजते,
नुपूरों में हंस रव
           बजता न पग पग पर गुंजाया

लो प्रिये हेमन्त आया!

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लिप्त कालीयक तनों पर
    सुरत उत्सव का प्रसाधन,
सुखकमल पर दिख रहा
    कस्तूरिका का पत्र लेखन,
चिकुर कालागुरु सुगंधित
    धूप से, यों तन सजाया
लो प्रिये हेमन्त आया!

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सुरत श्रम से पाण्डु कृश मुख हो चले, नव रूप धर कर,
तरुण कामी पा रहे हैं हर्ष का उत्कर्ष मनहर,
दसन से क्षत ओष्ठ पीड़ित हो गए हैं किलि करते,
इसलिए वे उच्चारण विमुक्त होकर है न करते
रति चतुरस्त्री ने उसे मुस्कान में अपनी छिपाया,
        लो प्रिये हेमन्त आया!

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शोभनीय सुडोल स्तन का
      नैशः अतिमर्दन हुआ है
अतः मन में शीत के
      कुछ खेद का आतुर हुआ है
भोर पत्तों के किनारों
      पर तुहिन जो दिख रहा है
अश्रु है हेमन्त उर के,
      पर व्यथा ने है रुलाया
     
लो प्रिये हेमन्त आया!

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व्याप्त प्रचुर सुशालि धान्यों
      से हुआ रमणीय सुन्दर
हिरनियों के झुण्ड से
      शोभित हुआ अब अवनि प्रान्तर
अति मनोहर क्रौञ्च के
      कलनाद से गुंजित मनोहर
दूर सीमान्तर ललित तक
      एक जादू सा रिझाया,
शोभनीय सुडोल स्तन का
      लो प्रिये हेमन्त आया!

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दन्त क्षत से अधर व्याकुल,
       तरुण मद से नयन धूर्णित
मीन कुच कर सधन मर्दित
       लेप सब करते विचूर्णित,
अंगना तन में सुरत ने
       मधुर निर्दय भोग पाया,
    लो प्रिये हेमन्त आया!

चिर सुरत कर केलि श्रमश्लथ
       शिथिल सालस गात अपने
स्फुरित जंघा औ" स्तनों से
       पुलक मुखरित हर्ष अपने
तैल अंगों पर लगातीं
       स्निग्ध करतीं हेमकाया,
   लो प्रिये हेमन्त आया!

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पके प्रचुर सुधान्य से
       सीमान्त ग्रामों के गिरे हैं
सतत सुन्दर, क्रौञ्च
       माला से गले जिसके पड़े हैं
अगनगुण रमणीय, प्रमदा
      चित्रहारी, शीतकाया,
तुहिनमय, हेमन्त सुख
      देता सभी को,स्नेह छाया,
लो प्रिये हेमन्त आया!
 

 

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