अश्वघोष की कविता

भाषाहीन होकर

मैं बिना शब्दों के बोलूँगा तुमसे
तुम बिना भाषा के समझना मुझे
अब संज्ञाशून्य हो गए हैं शब्द
और
बेमानी हो गई है भाषा

हम शब्द और भाषा को
किताबों में बंद कर
अपने रिश्तों को
चुप्पी की दीवारों पर
चिपकाएंगे
इश्तिहार की तरह

तुम उस चिड़िया को देखो
जो जोड़ती है एक साथ
मेरे और तुम्हारे भीतर
बहती हुई नदियों को
भाषाहीन होकर

(अश्वघोष की अन्य कविता)
 


नरेन्द्र कुमार की कविता

नंदीग्राम


मैं लाल झण्डे की कसम खाता हूँ
कि नन्दी ग्राम के बारे में
कोई बहस नहीं करूँगा
क्यों कि कामरेडों ने नंदीग्राम पर
बहस रोक दी है

आज मैं मुक्तिबोध पर बहस करूँगा
जिन्होंने लिखा था
"अभिव्यक्ति की रक्षा के लिए
उठाने होंगे खतरे
तोड़ने होंगे गढ़ और मय सब"

आज मैं सफदर हाशमी
की हत्या के बारे में बहस करूँगा
जिसका फासीवादी ताकतों ने
कत्ल किया था
आज मैं गुजरात के बारे में बहस करूँगा
जहाँ राजसत्ता और हिन्दुवादी गुण्डो ने
गोधरा के बहाने कत्ले ए आम किया था

आज मैं जलियाँवालाबाग के बारे में
बहस करूँगा
जहाँ विदेशियों की राजसत्ता ने
गोलियाँ चलाईं थीं
आज मैं भगत सिंह के बारे में बहस करूँगा
जिन्होंने फासीवादी ताकतों के खिलाफ
लड़ने का आह्वान किया था

लेकिन मैं नन्दीग्राम के बारे में
कोई बहस नहीं करूँगा क्योंकि
नंदीग्राम में मैने
जलियाँवाला बाग, गुजरात और
सफदर हाशमी की हत्या का दृश्य
एक साथ देखा है

नंदीग्राम के बारे में
बहस करना अब बेमानी है
नंदीग्राम के बाद
सिर्फ पक्ष चुनना बाकी है
कि आप किसकी तरफ से लड़ेंगे

और मैंने पक्ष चुन लिया है
इसलिए नंदीग्राम के बारे में
कोई बहस नहीं करूँगा

("ये पल" पत्रिका से साभार)

 


रति सक्सेना की कविता

कश्मीरी शरणार्थी शिविर को याद करते हुए दो बरस बाद

आजकल मैं काफी कुछ भूलने लगी हूँ,
चश्मा, पर्स या फिर चाभियाँ
कभी- कभी तो यह भी भूल जाती हूँ
कि क्या भूल रही हूँ
फिर वे सब मुझे याद हैं,
दो साल गुजरने के बावजूद भी

उनसे मिलते ही मुझे
माँ की बेसाख्ता याद आईं थीं
जिसे उसकी खूबसूरती के कारण
हर कोई उन्हीं से जोड़ता
जिनसे मैं आज मिल रही थी

मैं फिर से उन्हें देख रहीं थी
उनका चेहरा माँ से गड्मड हो रहा था

वे अपनी जमीन से उखड़ आए हैं
अपने देश में शरणार्थी बन
माँ बेमन बसी है बेटी के घर
उनके चेहरों की रौनक,
वैसी सी उड़ी है, जैसे कि माँ के

पहले पाँवों ने जवाब दिया
फिर हाथों ने
फिर सड़ने लगी देह
पीप-धाव से
माँ की

और वे,
जिनके पहले पैर काटे गए
फिर हाथ
फिर सड़ा दिया उन्हें
टिन के शिवरों में

काफी भूलने बावजूद मैं
एक कमरे के शिवर में ब्याही घूँघट में छिपी
नव‍ वधु को नहीं भूल पा रही हूँ
माँ के गले से निकलती घौं घौं से मैं बैचेन
हो जाती हूँ. और सोचने लगती हूँ
कि
कैसे मनी होगी सुहाग रात उस जोड़े की
मेरी बैचेनी और बढ़ जाती है जब
असख्य सवालों के साथ चेहरा डट जाता है
मेरी आँखों के आगे

पता नहीं क्यों, मेरी भूलने की आदत
उन लोगों की याद को नहींभुला पाती है
जिनके दर्द को सभी भुला बैठे हैं

मेरा दिमाग सुन्न पड़ रहा है, और मैं
कोशिश कर रही हूँ कि उन्हें भी भुला सकूँ
माँ के साथ....
 



सीमा सचदेवा की कविता

वह सुंदर नहीँ हो सकती

अपनी ही सोचों में गुम
एक
मध्मय-वर्गीय लड़की
सुशील,गुणवती
पढ़ी-लिखी
कमाऊ-घरेलू
संस्कारी
ईश्वर में आस्था
तीखी नाक
नुकीली आँखें
चौड़ा माथा
लंबा कद
दुबली-पतली
गोरा-रंग
छोटा परिवार
अच्छा खानदान
शौहरत
इज़्ज़त
जवानी
सब कुछ...........
सब कुछ तो है उसके पास
फिर भी
वह सुंदर नहीँ हो सकती
क्यों?
उसके चेहरे पर निशान हैं
हालात के थपेड़ों के

(सीमा सचदेवा की अन्य कविताएँ)




सुनीता ठाकुर की कविता

संघर्ष

उसने कहा -भूख?
मै्ने कहा रोटी
उसने कहा-प्यास?
मैंने कहा पानी?
उसने कहा-नींद?
मैंने कहा सेज?
उसने कहा-थकान?
मैंने कहा गोद?
उसके हर सवाल पर
दिया मैंने -जवाब
मेरे एक सवाल पर वह खामोश है
मैंने कहा- हक?
और लगता है
वो बोलना भूल ....

(सुनीता ठाकुर की अन्य कविताएँ)

राम निवास मानव की कविता

शहर के बीचों-बीच

क्या हो गया है इस शहर को !
हर दरवाजे और मुंडेर पर
उलटी लटकी हैं अबाबीलें
और घूम रहे हैं चमगादड़।
जो घना बाजार
कभी भीड़ से अंटा होता था
और जिसमें शोर-शराबा
चमक-दमक से सटा होता था,
अब वीरान है।
सड़कों पर घूमते हैं
आज भी कुछ धड़धड़ाते चेहरे,
जो आदमी-से दिखते तो हैं,
पर आदमी नहीं होते,
क्योंकि उन्हें देखकर
आंखें पथरा जाती हैं,
चेहरा जर्द हो जाता है
और शरीर में
कंपकंपी-सी छूटने लगती है।
आज शहर की सारी चिड़ियां
जा छुपी हैं घोंसलों में।
उनका गाना, पंख फड़फड़ाना,
सब बन्द है।
जब भी निकलती है बाहर
कोई चिड़िया घोंसले से
बाज के खूनी पंजे
दबोच लेते हैं उसे।
लेकिन इस पर भी
कोई पंख नहीं फड़कता,
कोई आहट नहीं होती,
कहीं सुगबुगाहट नहीं होती,
क्योंकि जब भी 
कोई पंख फड़फड़ाता है,
बाज का अगला निशाना
उसी पर सध जाता है।
शहर के बीचों-बीच
गुजरते हुए लगता है,
हमने अपना धर्म-कर्म का बोध
उठाकर दूर धर दिया है
और पूरा शहर
एक बाज के नाम कर दिया है।
 
(राम निवास मानव की अन्य कविताएँ)
 


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