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राम
निवास मानव की कविताएँ जिन्दगी की खुरदुरी सतह पर टिकी हैं। आज के
व्वसायिक दौर में, जब कि सतही भावनात्मक कविताओं की बाढ़ आई हुई है,
ये कविताएँ जिन्दगी को जमीन से टूटने नहीं दे रही हैं, यही बात
सन्तोषजनक है।
लौट
आओ अश्व
होकर जिसकी पीठ पर सवार
दौड़ाता लाया था जिसे मैं
बिन चाबुक, बिन मार,
वही अश्व
अचानक अड़ गया,
बीच राह में बिगड़ गया
और गिराकर मुझे
गोदते हुए मेरा जिस्म
अपने पैने खुरों से,
दौड़ता जा रहा है सरपट,
टपटप-टपटप !
उसकी मन्द होती टापों से
मैं लगाता हूं अनुमान,
बहुत दूर जा चुका है वह।
मैं कराहता हूं,
और दबी आवाज+ में
पुकारता हूं : लौट आओ अश्व,
मेरे यौवन, ओ प्यारे वक्त !
आस्था
आस्था झील की काई नहीं,
जो यहां से वहां
हवा के साथ तैर जाये।
आस्था वह पौध भी नहीं,
जिसे इच्छानुसार
बोया और बढ़ाया जाये।
आस्था वह दूब है,
जो बाहर नहीं,
आदमी के भीतर उगती है
और जिसकी ताजगी
पहली बरसात में फूटी
हरियाली की तरह
सबका मन मोह लेती है।
आस्था आदमी को
आदमी की पहचान देती है।
कितना मुश्किल है

धर्म की लादी ढोते हुए भी,
हिन्दू, मुस्लिम या कि सिक्ख,
जैन, बौद्ध या क्रिस्तान
होते हुए भी
कितना मुश्किल है धार्मिक होना !
जैसे कोई शिल्पी
गढ़ता रहे शब्द सुन्दर
या रचता रहे छन्द टकसाली,
पर शब्द या छन्द की
रचना के बाद भी
कितना मुश्किल है कवि होना !
धर्म या कविता
कहां है विधान में !
अभिधान या परिधान में !!
जैसे बहुत मुश्किल है
फूल का पराग में,
खुशबू में बदलना,
वैसे ही बहुत मुश्किल है
विचार की धर्म में गति
और भाव की कविता में परिणति।
-७०६, सैक्टर-१३, हिसार-१२५००५ (हरियाणा)
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