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सौफी मोस्तफवी
जब मुझे सौफी मोस्तफवी की कविताएँ पढ़ने को मिली, तो मुझे लगा कि
कहीं किसी सन्त कवि ने फिर से जमीन पर जन्म तो नहीं ले लिया ? इरान
की वासी सौफी ने जब से होश संभाला है तब से कविता करना शुरु कर
दिया, पाँच साल की उम्र से छपना शुरु कर दिया और ग्यारह साल की
उम्र में सौफी पर एक फिल्म भी बन चुकी है। सौफी की कविता के बारे
में कुछ कहने से अच्छा है उन्हें पढ़ना.. तभी हम जान पाएँगे कि
अच्छी कविता वही है जो देश, भाषा, समाज और लिंग की सरहदें पार कर
हर किसी के मन में वास कर लें।
१
मेरी चाहत है कि
हम न खोए एक दूसरे से
बल्कि खो जाएँ एक दूसरे में
२
हर कोई खूँटी बना है
कपड़े
नेकलेस
बुन्दें
टाइयाँ
और
पेन्ट टाँगने की खूँटी
लेकिन आदमी खुद कहाँ हैँ?
३
बड़ा बुरा लगता है
जब मैं झूठ बोलती हूँ
मानों किसी ऊँचाई से गिर पड़ी
४
मैंने फिरकनी ली
लेती रही
लेती रही
बरसाती बून्दों के नीचे
बादलों से ऊपर
बिना चकराए
गुरुत्वाकर्षण भी मुझे नीचे नहीं खींच पाया
मैं टिकी थी तुम्हारे प्यार पे
५
मैं अंधेरे से नहीं डरती
मुझे पसन्द नहीं काला रंग
६
एक दिन का कितना भाग रात है?
एक रात का कितना भाग दिन है?
कितने बजे हमें जागना चाहिए
और कितने बजे सोना?
७
समन्दर
कभी पानी से भरा होता है
तो कभी आँखों से
मुझे पानी से भरा समन्दर पसन्द है
मैं डरती हूँ तो आँखों से भरे समन्दर से
८
बच्चों की आँखों मे
बगीचा और कुछ नहीं
बस हरा गलीचा है
बूढ़ों की आँखों में
बगीचा कुछ नहीं
बस पीली टहनियाँ हैं
बच्चे दौड़ते हैं बगीचे में
जिससे दरख्त छड़ियां न देख सके
और उनकी आँखों से पत्ते न झड़ें
९
खुदा अपनी रोशनी से
अंधेरे से गुजरता है
उसके कदमों की छाप पर
दरख्त उगते हैं
उसकी सोच पर
पतझड़ जनमती है
१०
अपने को हिस्सों मे बाँट दो
जिससे बच जाए
अन्दुरुनी जेहन का हिस्सा- हिस्सा
११
मैं ही हूँ,
जिसने तुम्हे खोज निकाला
वह तुम हो हवा का झौंका बना
उतना बड़ा, जितना कि मैं
तुम मुझ पर झुक गए
कि मैं तुम्हें चूम सकूँ
तुम्हे महसूस कर सकूँ
कविता की तरह
तुम जानते हो कि
मेरा दिल बड़े शीशे की तरह है
तुम देखते हो मुझे उसमे
पर कभी सवाल नहीं करते
दूसरों की तरह
तुम्हारी मुस्कान बेहद नीली है
डर है कि डूब न जाऊँ
ओवरकोट के साथ
मुझे याद आ जाता है गर्मियों का मौसम
जब मैं नहाया करती थी समन्दर में
मुझे मालूम है कि तुम्हारा दिल क्या चाहता है मुझसे
वह चाहता है, बस एक अच्छी कविता
१२
सड़कों पर
तुम देखोगे आँखे, बादलों से भरी
या चेहरे, झुर्रियों से भरे
या फिर गम और
जन्नती आँसुओं से भरे चेहरे
काले, बेदिली कपड़े
जिनका कोई वास्ता नहीं कविता से
१३
आसमान स्याह पड़ गया
शब्द गलियों में खो गए
वे रो रहे हैं उन बच्चों की तरह
जिनकी माँ उनसे बिछुड़ गई
मेरी पोशाक अकेली है
पूरे संसार में अकेली
मैं चाहती हूँ कि गली के आखिर में
शब्द मिल जाएँ, किसी अच्छी खबर के साथ
१४
लोगों को शीशा वही दिखाता है
जो वे खुद हैं,
पर मुझे दिखाता है एक नंगा दरख्त
जिसकी सारी पत्तियाँ
हवा में झड़ गई
१५
जब मैं तीन साल की थी
मुझे आसमानी रंग से प्यार था
चार बरस की उम्र में
मुझे नीले रंग से प्यार हो गया
पाँच बरस की उम्र में मैने खेल का कमरा छोड़ दिया
क्योंकि हर लड़की को गुलाबी रंग पसंद था
अब जब मैं छह बरस की हूँ
समझती हूँ कि मैंने अपने बचपन में
सब तरह के नीले रंगों को पसन्द किया था
केवल बैंगनी रंग की चाहत में
मैं स्याह रंग पसन्द नहीं करूँगी
कदापि
जब तलक कि कविता मुझसे प्यार करना ना बन्द कर दे
अनुवाद-
अंग्रेजी से हिन्दी में ----रति सक्सेना
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