मैं कृत्या हूँ
कृत्या - मारक शब्द शक्ति,
कृत्या - जो केवल सच के साथ चलती हो,
कृत्या - जो पूरी तरह सही का साथ देती हो ।

 
 
 

हर कविता को ऐसे लिखो
गोया कि यह तुम्हारी आखिरी कविता है
यह सदी, जो कि प्रदूषण से भीगी है
आतंकवाद से कंपित है
उड़ती जा रही है सुपर सौनिक गति से,
अचानक चली आने वाली मौत
तुम्हारे हर शब्द को
जेल की दीवार पर टंगी
आखिरी पहचान देंगी

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यह एक समय होता है यह
चुप्पी के आकार का विशालतम
हम निः शब्द कहते है
धन्यवाद !


जीवन धन्यवाद !!

विजय कुमार

जब तलक मैं हूँ, तुम भी जिन्दा हो
फिर जो हो, सो हो, इस से क्या मुझ को


फैजल अजीम

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यदि बदले हुए सामाजिक सोच विचार के कारण कविता का मिजाज बदलता है तो उसकी भूमिका के अनुरूप आलोचना के मूल्यों और मापदण्डों में भी बदलाव आना चाहिए। इस तरह आलोचना के आचरण में बदलाव आया और केशव के आचार्यत्व आलोचना कर्म के लिए अपर्याप्त सिद्ध हुए।

डा. अरुण कुमार

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समन्दर
कभी पानी से भरा होता है
तो कभी आँखों से

मुझे पानी से भरा समन्दर पसन्द है
मैं डरती हूँ तो आँखों से भरे समन्दर से


सौफी मोस्तफवी
 

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प्रिया आ
मत दूर जा
लिपट मेरी देह से
लता लतरती ज्यों पेड़ से
मेरे तन के तने से
तू आ टिक जा
अंक लगा मुझे
कभी ना दूर जा
पंछी के पर कतर
जमी पर उतार लाते ज्यों
छेद करता मैं तेरे दिल का
प्रिया आ, मत दूर जा

अथर्ववेद

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VOL - 1 / PART 4
( सितम्बर2005 )

संपादक :  रति सक्सेना


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