कविता ‍आलोचना और उसकी अराजकता

डा. अरुण कुमार

अतीत में निडर धँसते हुए किसी धरातल पर आलोचना की जड़ें पाकर उत्साहित हुआ जा सकता है लेकिन सच्चाई यही है कि साहित्य की अन्य आधुनिक विधाओं की तरह आलोचना की आहटें भी यथा समय सुनी गयी। इस परिपार्श्व में भले हमारी शास्त्रीय समीक्षा परम्परा रही हो लेकिन उठान से पहले पाश्चात्य आलोचना कर्म से अवश्य ही साक्षात्कार हुआ। जिस वजह से कविता आलोचना में नयी दृष्टि अर्जित करने के कई बेहतर और सार्थक प्रयत्न हुए। परिवेशगत दवाब, सामाजिक बदलाव एवं सरोकार की वजह से आलोचना की अनुभव सम्पन्नता में काफी सघनता आयी। इस तरह, सोच समझ की सक्रियता बढ़ते ही आलोचना के अन्दुरूनी हिस्से में कवि कर्म के प्रति बदलाव की वांछा स्पष्ट हुई। कालान्तर, कविता आलोचना बदलाव की धार तेज करती हुई काफी क्रियात्मक हुई।

वास्तब में , भारतेन्दु ने आलोचना की थोड़ी खुरदरी जमीन तैयार की जिसकी विश्वसनीयता द्विवेदीयुग में बढ़ी और आचार्य शुक्ल ने सरोकार की गहराई देकर उसे और अधिक सार्थक बना दिया। यही वजह है कि आचार्य शुक्ल आज भी हाशिये में न होकर आलोचना के केन्द्र में हैं। सच पूछो तो उनकी इस चिन्ता की जड़ में मनुष्य की सामान्य स्थिति की रक्षा भावना थी। मनुष्य की सामान्य स्थिति की व्याख्या में उन्होंने लोक मंगल को संदर्भित किया। आचार्य शुक्ल की दृष्टि में लोक इसी व्यक्ति का पर्याय है।

शुक्लोत्तर समीक्षकों ने कमोबेश इसी लोक अवधारणा का समर्थन अपनी आलोचना में किया है। डा. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने स्पष्ट कहा है...."मध्य युग में जिसका समर्थन अध्यात्म ने किया है वही आज का मनुष्यत्व है।" इस मनुष्यत्व को बचाए रखना किसी भी भाषा साहित्य का दायित्व है, इससे इंकार नहीं किया जा सकता है। भले ही कलावादी चिंतन आलोचना की इस सुचिन्ता का समर्थन न करता हो लेकिन उसके निरन्तर विकासमान रूप की अवहेलना नहीं की जा सकती है । आज की आलोचना परम्परित आलोचना व्यवस्था के प्रति उदास और बेपरवाह दीखती है, तथा समकालीनता के सन्दर्भ में नए मूल्य स्तर की खोज करती है। अपने नए सोच संयम की वजह से आलोचना को नया आयाम मिला है,जिसकी पकड़ के लिए मनुष्य की समझ नितान्त जरूरी है। यदि बदले हुए सामाजिक सोच विचार के कारण कविता का मिजाज बदलता है तो उसकी भूमिका के अनुरूप आलोचना के मूल्यों और मापदण्डों में भी बदलाव आना चाहिए। इस तरह आलोचना के आचरण में बदलाव आया और केशव के आचार्यत्व आलोचना कर्म के लिए अपर्याप्त सिद्ध हुए। सच, समय का समर्थन न मिल पाने की वजह से शास्त्रीय मान्यताओं की चूलें बेहिसाब हिल गयीं। इधर कविता आलोचना अपने संकल्प एवं अपनी संचेतना की वजह से निरन्तर कराव की हालत में नये प्रतिमान तलाश करती रही है।

बदली हुई परिस्थितियाँ कविता आलोचना को हमेशा उकसाती रहीं हैं। अपनी मनचाही भूमिका में उतर जाने के ख्याल से आलोचना हमेशा जीवन सत्यों के आधार की माँग करती है न कि वादीय धरातल‌‌और शास्त्रीय सिद्धान्तों की। वाकई आलोचना किसी कला कृति के भीतरी सन्दंर्भों की तह तक पहुँचने का उपक्रम मात्र है, जो रचना को वैयक्तिक रुचियों की परिधि में नहीं घसीटती बल्कि सामाजिक सन्दर्भों में तौलती है। कविता आलोचना ने यह दायित्व अपने जिम्मे लिया क्यों कि "संघर्ष जिन्दगी की अनिवार्य शर्त है और अपनी सुरक्षा और पहचान का एकमात्र एकमात्र औजार भी", बदलाव की दिशा में संघर्ष की वजह से परम्परित आलोचना तिलस्म का टूटना अनिवार्य था । इस तरह, आलोचना के बंधे बंधाये रूपों और प्रकारों में अप्रत्याशित परिवर्तन हुआ। रद्दोबदल के इस दौर में कविता आलोचना सामाजिक आशय के सन्निकट आयीं। इतना भर ही नहीं, वह अपने स्वरूप विकास की चिन्ता में आधुनिक एवं वैज्ञानिक दृष्टि लेकर उपस्थित हुई।

असल में, कविता आलोचना हमेशा नये किस्म के आलोचनात्मक चिन्तन और व्यवहार की अनिवार्यता महसूस करती है। सम्प्रति, समीक्षा कृति में उभरने वाले बिम्बों प्रतीकों, अर्थों, सन्दर्भों और विचारों की तह में आलोचना जाने का यत्न करती है ताकि रचना तल का स्पर्श किया जा सके। वह यह भी पड़ताल करती है कि अभिव्यक्ति के जिन उपकरणों का उपयोग रवनाकार ने अपनी कृति में किया है, वे कहीं रचना सार्थकता को बाधित तो नहीं करते हैं। इतना ही नहीं, वह रचना प्रक्रिया की इस पक्ष की भी पहचान करती है कि कहीं ये उपकरण अर्थ उद्घाटित करने में मार्ग अवरुद्ध तो नहीं करते हैं।

सामाजिक सरोकार को बुनियादी काव्य निष्ठा के रूप में ग्रहण कर लिया जाना समकालीन आलोचना की अद्वितीयता है। आलोचना और रचनाकार की इस सन्निकटता का कारण यह है कि दोनों समाज से रिश्ता बना कर अर्थ का उत्कर्ष प्राप्त करना चाहती हैं। यों मार्क्सवाद के विश्वासी आलोचकों की एक ऐसी जमात भी है जो कविता और समाज के बीच प्रगाढ़ हो रहे रिश्ते को अनदेखा करती है, क्यों कि उसके पास पुरानी और नयी शास्त्रीय मान्यताओं का एक कुनबा है, जिनमें वह उलझी हुई है।

रघुबीर सहाय ने कविता में बिम्बों और प्रतीकों की अनिवार्यता से इंकार कर दिया है। क्योंकि ये उपकरण रचना की सच्चाई से सीधा साक्षात्कार नहीं होने देते हैं। ठेठ इंकार की यह भाषा आलोचना के क्षेत्र में संकट साबित हुई। यह दीगर बात है कि आज भी आलोचना की साँसे उलझन में फँसी हैं फिर भी उसका दायित्व रचनाकार पर अपनी मान्यताओं को थोपना नहीं बल्कि कृति की रचनात्मकता और सामाजिक सरोकार पर दृष्टि केन्द्रित करना है। वह रचना की भीतरी यात्रा करती हुई वास्तविक जगत के यथार्थ से अपरिचित नहीं रहती हैं। फिर उसका दायित्व रचनाकार पर अपनी मान्यताओं को थोपना नहीं बल्कि कृति की रचनात्मकता और सामाजिक सरोकार पर दृष्टि केन्द्रित करना है। वह रचना की भीतरी यात्रा करती हुई वास्तविक जगत के अनुभव को अपने भीतर उतार कर रचना अनुभव को अवश्य तोलती है यह सब कुछ हो सकता है आलोचना के दायरे में, बशर्ते कि आलोचना रचना में पूरी तन्मयता के साथ डूबकर फिर निस्संग होकर अर्थ के छिलके उतारते हुए असंगतियों ‌और अन्तर्विरोधों को उजागर करे।

फिलहाल आलोचना में वह विवेक नहीं जो होना चाहिए। यदि उसके साम्प्रतिक स्वरूप पर विचार करें तो यथार्थ और उसकी अराजकता से साक्षात्कार हो जा सकता है । सच तो यह है कि आलोचकों के कई घराने हैं। एक घराना तो ऐसा है जो सिर्फ कीर्तन कर रहा है, वह भी कविता का नहीं । आलोचकों की यह कीर्तन मुद्रा अराजकता ही पैदा नहीं करती, बल्कि आलोचना की सेहत के लिए सर्वाधिक अहितकर है। एक आध घराना है, जिसका सदर मुकाम दिल्ली है, जो रचना आलोचना के साथ सिर्फ दिल्लगी करता है। कविता के ऐसे दरोगाओं की भूमिका काफी संन्दिग्ध है । सच्चाई यह है कि शिविरों में बँटे हुए ये आलोचक कहीं मूर्छा में है तो कहीं मुखबिरी में हैं। चिन्ता का विषय है कि कविता आलोचना वैचारिक पक्षाघात की शिकार है।

सुलझी हुई दृष्टि और विवेक के अभाव में आलोचना दिन भर में अढ़ाई कोस चल रही है। कविता जब आगे निकल जाती है तब आलोचना उसकी पूँछ पकड़ने की कोशिश करती है। विडम्बना कहिए कि आज आलोचना कविता से पिछड़ रही है। ‍उंगली के पोरों पर गिने जाने वाले आलोचक अपने समय में लिखी जा रही कविता के साथ चल रहे हैं। लेकिन अन्य समकालीन आलोचक गैर जरूरी चीजों पर अपनी दृष्टि केंद्रित किये हुए हैं।

कुँवर नारायण की यह आशंका व्यर्थ नहीं है कि इन दिनों कविता इतनी समीक्षा प्रेरित लिखी जा रही है कि जीवन से सीधे जुड़ाव का स्थान कहीं कथ्य और विषय का रुढ़िबद्ध पालन और भाषा का ठहराव न ले ले। हड़बड़ी में स्थापित होने की इच्छा से कुछ युवा कवियो की रुढ़िप्रियता बढ़ी है। चर्चा में बने रहने के लिए ये कवि केदारनाथ सिंह की कविता के तर्ज पर गाय की जगह बकरी खूंटे में बाँधे दीखते हैं। इन दिनों आलोचना में वही पिटे पिटाये जुमले, नये मुहावरे की तलाश, समय का तापमान और तेवर का जोरदार चलन है । सच आलोचना की अराजकता देखकर उसकी विश्वसनीयता पर उंगलियाँ उठ रहीं हैं।

आलोचना का हाल यह है कि वह कविता के संग तटस्थता नहीं जीती है। दस पन्द्रह वर्षों की आलोचनात्मक हलचलों का आकलन करें तो इस बात का सबूत मिल जाता है। दस पन्द्रह वर्षों की आलोचनात्मक हलचलों का आकलन करें तो इस बात का सबूत मिल सकता है कि वह वैयक्तिक आग्रहों और तरह तरह के पक्षपातों से मुक्त नहीं हो रही है। आज की आलोचना के इरादे और उसकी अराजकता से सन्तुष्ट नहीं हुआ जा सकता। वह कहीं श्रद्धावस मौन है तो कहीं वाचाल और उदंड भी। कहीं रचनाकार के खिलाफ आग की भाषा उगलती है या फिर प्रासंगिक हस्तक्षेप न करती हुई किसी खास रचनाकार को यशस्वी बनाने का व्यूह रचती है संवेदना की सीमा. सहजानुभूति का अभाव, गुटबाजी, बाड़ेबाजी, हठ और जलन के कारण समकालीन कृतियों का सम्यक् मूल्यांकन नहीं हो पाता है। कृति की आलोचना करते हुए आलोचक जब तक रचनाकार के प्रति रागद्वेष से विमुक्त नहीं होता तब तक आलोचना की वस्तुनिष्ठता पर भरोसा नहीं किया जा सकता है।

दरअसल में. आलोचना का अविवेक रचना विवेक से इतना फासला बनाये हुए है कि तनाव, आशंका और अराजकता की स्थिति है। कविता की नब्ज छूकर आलोचना रचना सन्निहित समय के तापमान का अनुभव करती है। आलोचना कर्म व्यक्तिगत रुचि विधि के लिए गु्जाइश छोड़ता है, लेकिन वह रचना वास्तव के प्रति सतर्क और सक्रिय रहता है। अतएव, रचना वास्तव की सन्निकटता के लिए आलोचना को पहल करनी होगी। आज अपेक्षा यह है कि वह अपनी दृष्टि, अपने विचार एवं बोध प्रमाणित करे और अपने रचनात्मक हस्तक्षेप से किसी कृति को कुंद और अतिवादी न होने दे। यों आलोचना के एजेन्डा पर इस तरह का प्रासंगिक हस्तक्षेप नहीं दीखता है।

सव यह है आलोचना कर्म को वर्जना विवश करती है। इस हालत में, उससे विश्वसनीयता की अपेक्षा कोई मायने नहीं रखती है। फिर भी वह अपने कर्म और संस्कार के लिए स्वतंत्र है लेकिन आलोचना के पूरे परिदृष्य पर एक ऐसी अपसंस्कृति विकसित हुई है, जिसमें साफ साफ कहने की ताकत नहीं है, जो काफी खतरनाक है। यही वजह है कि रचना की पहचान धुँधली हो रही है और रचनाकार उभरकर सामने आ रहे हैं। इस अपसंस्कृति को विकसित होने की अनुकूल जमीन मिली है अखबारी कालमों और लघु पत्रिकाओं के समीक्षा स्तंभों में। कहीं कहीँ तो कविता पर ऐसी चालू टिप्पणी मिलती है, जिससे रचना का दूर का रिश्ता भी नहीं होता है। वाकई कविता आलोचना कृति वास्तविकता से अलग साहित्येतर दबावों मे जी रही है। ताज्जुब की बात यह है कि हर रचनाकार के पास अपना एक आलोचक है जो अपने को आलोचना का समर्थ उत्तराधिकारी समझता है। साहित्य में ऐसे आलोचकों की उपस्थिति से आलोचना के मरने की आशंका व्यर्थ नहीं बढ़ रही है।

प्रस्तुत लेख अरुण कुमार जी द्वारा लिखा गया है। आप कवि होने के साथ साथ अच्छे आलोचक भी हैं, हमने अरुण कुमार की कविताओं को पिछले अंक में पढ़ा, इस अंक वे वर्तमान समय में कविता की आलोचना की क्या स्थिति के बारे में बेबाक राय दे रहें है।

 

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