विजय कुमार की कविता

अंधे बच्चे

अंधे बच्चों के बारे में कहा जाता है कि उन्हें रंगों के बारे में कुछ नहीं मालूम
पर तमाम अधे बच्चे आकाश की ओर देखते हैं
और उसमें एक इन्द्र धनुष ढूंढ निकालते हैं
पिता की उंगली छुड़ाकर वे खड़े रहते हैं आवाक
मौन अपलक
आकाश से अपनी पसन्द का रंग चुरा लेते हैं नन्हे हाथ
और निकर की जेब में ठूँस लेते हैं
फिर सीटी बजाती हुई एक ट्रेन गुजरती है
दुनिया में कोई चीज इतनी सुन्दर नहीं है
जितना यह सच
और शाम की, पेड़ो की, आकाश की शक्लें अचानक बदलने लगतीं हैं
पिता हमेशा बेखबर कुछ आगे निकल जाते हैं
धुँध में खो जाता है संरक्षण
सिर्फ हम वहाँ होते हैं
हम यानी हम कवि लोग
वहाँ
उन छोटे बच्चों में॔
अकेले, असहाय, दुर्निवार, घुटन भरे
और हमारी ये डबडबायी आखें झेपती हुईं सी
यह एक समय होता है यह
चुप्पी के आकार का विशालतम
हम निः शब्द कहते है
धन्यवाद ! जीवन धन्यवाद !!

पर यह जारी नही रह पाता देर तक
पिता ढूंढते हुए बच्चों के पास लौटते हैं
और हम बच्चों से बाहर निकल कर
अपनी कविताओं में लौट आते हैं
बाद में हम ही कहते फिरते हैं तमाम लोगों से
बहुत से सच हैं पर कोई भी सच
किसी दूसरे सच का हिस्सा नहीं है

विजय कुमार की अन्य कविताएँ )



फैजल अजीम की शायरी


गजल

अपने दामन में खुद छुपा मुझ को
और फिर ढूँढ भी ना पा मुझ को


इस जहाँ से फरार किया मानी
मिल ना पाए मेरा पता मुझ को

मैं अगर जुज्व हूँ तेरा, हूँगा !
तू सजा देगा खुद को या मुझ को?

यह लिबास अब तो तंग होता है
कल वह किस में समायेगा मुझ को?

तुझ को मैं यूँ भी अच्छा लगता हूँ
तू बड़े शौक से रुला मुझ को

आँख से क्या उबलने लगता है?
क्यों पिलाता है यह दवा मुझ को

जितने चेहरे हैं जख्मी लगते हैं
हर कोई एक सा लगा मुझ को

हार जाना भी इस खमीर में है
जानता है, पर आजमा मुझ को

मैं जो कल मौत बन के लहराया
याद आए मेरा खुदा मुझ को

है अदम की अगर कोई सूरत
भूल जाएगा आइना मुझ को

जब तलक मैं हूँ, तुम भी जिन्दा हो
फिर जो हो, सो हो, इस से क्या मुझ को

( फैजल अजीम की अन्य नज्म और गजल.. )


नरेन्द्र पुण्डरिक की कविता

थाने में खड़ी लड़कियाँ

थाने में खड़ी लड़कियाँ
मेरी अपनी लड़की तरह
लम्बा कुर्ता और सलवार पहने थीं
‌और वैसे ही सामने के उभारों को
दुप्पटे से छुपा कर रखे थीं

मेरी अपनी लड़की की तरह ही वह
घर की नहीं थाने की फर्श को
अपने अँगूठे से कुरेद रही थी
अपनी गल्तियों पर,

मेरी अपनी लड़की तरह
इनमें मिन्नत से भरा
टपक कर चू पड़ने वाला भोलापन था
थाने में खड़ी लड़कियाँ
मेरी अपनी लड़कियों से
अलग नहीं दिख रही थी
अन्तर सिर्फ इतना था कि
यह घर नहीं थाना था
जो लड़कियों के अपने वजूद को
इकदम से बदले दे रहा था
 

( नरेन्द्र पुण्डरिक की अन्य कविताएँ.. )


दो कवि -------दो कविताएँ

राजीव पाण्डे की कविता


ऊँचाई

बिखरे बादलों के बीच
आसमान के नीचे बैठ
मैं ऊँचाई पर टिमटिमाते तारों से
पूछता हूँ
कि
क्या तुम्हे हमसे दूर होने का गम है?

#######
महाराज कृष्ण संतोषी की कविता

प्रायश्चित

एक तरफ भाषा है
एक तरफ चुप्पी
भाषा से ही होकर
मैं पहुचूंगा चुप्पी के पास
मेरी चुप्पी
मेरी भाषा का प्रायश्चित होगी
 

(  राजीव पाण्डे और महाराज कृष्ण संतोषी की अन्य कविताएँ.. )


दो कवयित्रियाँ -------

इला जैन की कविता

कुछ अल्फाज, बेटे के नाम

कैसे बतलाऊँ वह अहसास, जब तुम दुनिया में आए थे ।
मेरे जीवन के उपवन में, असंख्य पुष्प मुस्काए थे ।
तुमको पा कर संसार हमारा, पूर्ण हुआ सम्पूर्ण हुआ ।। १।।

कैसे बतलाऊँ वह अहसास, जब मैंने तुमको देखा था ।
जन्मों से संचित पुण्यों को, अपने आँचल में समेटा था ।
तुम्हारी भोली भाली मूरत में, मेरे सत्कर्मों का लेखा था ।।२।।

कैसे बतलाऊँ वह अहसास, जब संसर्ग हुआ तुमसे ।
आकाश से गिरती बरफ से ज्यादा, कोमल तुम्हारा था तन।
हर्षित होकर जिस पर मैंने, वारा अपना तन मन धन ।। ३।।

कैसे बतलाऊँ वह अहसास, जब तुम्हारे होंठों का स्पर्श मिला ।
वात्सल्य रस का मन में, वेगवान झरना बहा था ।
केसर के बागों की खुशबू ने, मन को मदमस्त किया ।। ४।।

कैसे बतलाऊँ वह अहसास, जब तुमने खोली आँखें ।
आसमान में झिलमिल तारे, मेरे आँगन आ चमके ।
इन्द्रधनुषी सतरंगी सपने, मेरी आँखों में दमके ।। ५ ।।

सपने मेरे अपने थे, मेरी यादो के मनके थे ।
तुम सबके प्यारे, पापा, बहना की आँखों के तारे।
तुम जागे तो मैं जागी, तुम रोये तो मन रोया।। ६।।

तुम मुसकाए, इठलाए, सरके या करवट ली ।
तुम हकलाए, तुतलाए, "पा" बोले या "ता" बोले।
तुम्हारी क्रिया में सिमटी, मेरी दुनिया सारी ।। ७।।


कब खड़े हुए, कब बड़े हुए, डगमग चलना सीखा।
कब अम्मा , पापा बोला, कब लिखना पढ़ना सीखा ।
हर अदा थी मुझको प्यारी, तुम पे मैं बलिहारी ।। ८।।

कैसे बतलाऊँ वे अहसास, शब्द नहीं मेरे पास ।
ये न कोई भेंट, न है ईनाम, भेज रहीं हूँ ।
अपनी यादों की दुनिया के कुछ अल्फाज ।। ९।

#######

इला प्रसाद की कविता

स्वेटर

तुम उतार दो यह स्वेटर
जो वे तुम्हें पहना गए हैं
इससे पहले कि वह तुम्हारी जरूरत बन जाए,
तुम उतार कर फ़ेंकों यह स्वेटर
इससे पहले
कि वह तुम्हारे गले का फ़न्दा बन जाए,
विश्वास करो
वे लौटकर आयेंगे
अपना स्वेटर उतार ले जाने को
उन्हें बस तुम्हारे कमजोर पड़ जाने का
इंतजार है
उन्होंने इसी तरह
हर बार
आदमी को
व्यवस्था के खिलाफ़ हो जाने से
रोका है.
 

( इला प्रसाद की अन्य कविता.. )


अभिनव शुक्‍ल की कविता

आत्मगीता

मैं कौन हूं,
क्‍यों मौन हूं,
क्‍या डर गया,
या मर गया,
उठ कर सुबह,
दफ्‍तर गया,
दिन भर वहां,
चलता रहा,
नव वह्‍नि बन,
जलता रहा,
साँझ हुई,
सूरज ढ़ला,
घर की तरफ,
रस्‍ता चला,
कुछ खा लिया,
कुछ पी लिया,
जग को लगा,
कुछ जी लिया,
फिर रात थी,
क्‍या बात थी,
कुछ हो गया,
फिर सो गया,
बिना कुछ सोचे कि
मैं कौन हूं....।


(अभिनव शुक्‍ल की और कविताएँ .. )



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