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कवि अभिनव शुक्ल एक शीर्ष भारतीय साफ्टवेयर कंपनी में इंजीनियर के
पद पर कायर्रत हैं । उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा मेरठ, नौगांव (असम)
एवं लखनऊ से प्राप्त की तथा इंजीनियरिंग की पढ़ाई बरेली से पूरी
करी । कुछ दिनों तक इलाहाबाद में रहने के उपरांत वे नौकरी करने के
लिए बैंगलोर चले आए ।
अभिनव शुक्ल की कविताओं में एक विचित्र कसमसाहट दिखाई देती है जो
आज के युवा आक्रोश को बयान करती है। ई मेल
है---shukla_abhinav@yahoo.com
चार दिन
बिन खाए वह चलता रहा दिन दिन भर
सपनों का महल बनाया फिर भी चार दिन,
हमे मालूम हैं कौन मसीहा अमन का,
हमने भी परिंदों को उड़ाया है चार दिन,
हाथों के फफोलों का टूट चुका है सब़्र ,
कमबख्त चिरागों को जलाया है चार दिन,
इस दौर की औलाद के अंदाज़ अजब हैं,
मां बाप से मिलने कोई आया है चार दिन,
मुद्दत से पतझड़ों की पनाहों में है मग़र,
इस गांव में वसंत भी आया है चार दिन।
चिन्तन का विस्तार
अपनी चाल मोड़,
थोड़ा सा रुक,
थोड़ा सा झुक,
नामी इलाके की,
इज्ज़तदार ज़मीन पर,
एक घर बना ले,
और खरीद ले एक कार,
सुनी सुनाई बात है कि,
अमीर वो नहीं
जिसने बहुत कुछ जोड़ा,
अमीर तो वो है,
जिसकी आवश्यकताओं का,
आयतन थोड़ा ,
मत कर विश्वास,
बन प्रेक्टिकल ,
नहीं तो रह जाएगा पिच्छड़
पुरानी कविताओं की,
अनपढ़ी पोथी,
बांहों में भींचे,
तू नहीं बन सकता
आंधी,या तूफान
लाख कोशिश कर
बन नहीं सकता गांधी,
क्यों रोए बेकार
यही रह गया
चिन्तन का विस्तार?
सब ठीक हो जाएगा
सब ठीक हो जाएगा,
दुखी मत हो,
पारा है उतर जाएगा,
देखा तो होगा,
कैसे देशभक्ति की फिल्म,
देखने के बाद,
हर दर्शक भगत सिंह हो बन गया,
पर ज़रा ही देर में,
भीड़ में खो गया है,
मुँह बन्द रख
भेड़ों की इस भीड़ में,
चुपचाप,
बिना इधर उधर देखे,
बिना कुछ सोचे, चलता चल
शुरू - शुरू में थोड़ा लगेगा,
और फिर,
सब ठीक हो जाएगा।
मशाल, दीपक और चिंगारियां
चलो कुछ चिंगारियां एकत्रित करें,
और मशाल ना सही ,
एक दीपक ही जला लें,
क्या पता कल ये दीपक,
किसी मशाल को रास्ता दिखा दे,
और चिंगारियों को जीना सिखा दे।
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