












कृत्या प्रकाशन की पुस्तकें
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जान
z गुजलास्वकि (John Z. Guzlowski)
पिछले महिने कृत्या के अंक को माँ के नाम पर समर्पित किया गया तो
क्रिस्टीना पिकाज (जिनकी कविताएँ पिछले
अकं के अग्रेजी सेक्शन में छपी थीं) ने
John Z. Guzlowski के ब्लाग का लिंक भेजा था।
http://lightning-and-ashes.blogspm/ .
हमने नाजी और हिटलर से सम्बन्धित काफी कुछ पढ़ा है, किन्तु इस युद्ध
का अगली पीढ़ी पर क्या प्रभाव पड़ा, यह बेहद कम
जान पाए। इस
लिंक को पढ़ कर मैंने एक नई दुनिया में प्रवेश किया। जान पोलिश-अमेरिकन कवि हैं, पोलिश-अमेरिकन
इसलिए कि वे मूलतः पोलिश
माता-पिता की सन्तान है जिन्हें नाजी युद्ध के उपरान्त अमेरिका में
बसाया गया था। जान ने अपनी कविताओं के बारे में कुछ विशेष बातें
कहीं है, जो उनके और उनके माता- पिता के जीवन से सम्बन्धित थीं।
युद्ध जान की स्मृति में माता-पिता की स्मृति से उतरा था, लेकिन
जान ने जो भोगा, वह एक अलग किस्म का युद्ध था। अपनी पहचान का
युद्ध, बेहद कम पढ़े- लिखे माता-पिता और अन्य पोलिश लोगों के साथ
बड़े होते हुए जान एक विशेष मनोग्रन्थी से पीड़ित थे कि पोलिश लोग
अमेरिकन की तुलना में नकारा, मेहनती पर बेवकूफ और पाई-पाई
के लिए लड़ने- झगड़ने वाले होते हैं। यह अनुभव उन्हे अपने ही जीवन से
मिला था। किन्तु जब उनकी अपनी कविताओं में माता- पिता के दुख बोलने
लगे तो वे समझ पाये कि अमेरिकन कवि न होने और पोलिश
अमेरिकन कवि
होने में क्याअन्तर है, यदि वे मात्र अमेरिकन कवि
होते तो उनकी
कविताएँ बस मौसमों के इर्द-गिर्द घूमती रहती।
जान की रोंगटे खड़े कर देने वाली इन कविताओं को कृत्या के पाठकों के
साथ बाँटने में मुझे सार्थकता प्रतीत हो रही है, इससे अधिक क्या कह
सकती हूँ।
सम्पादन एवं अनुवाद- रति सक्सेना
मेरी माँ ने जो दासों के यातना शिविरों के बारे में बताया
स्वतन्त्रता
वह दुनिया के बारे में
किसानी राय रखती थी
हर जगह गड़बड़,कीचड़ में
खत्म होती सड़कें, बेबात मुँह से
खून टपकाती
मुर्गे-मुर्गियाँ
ऐसी जिन्दगी पर कोई फिल्म नहीं बनाता
वह कहती और बताने लगती जब
पहली बार अमेरिकन उनके पास आए
वह सार्जेन्ट,जो बैरक और मैदान के बीच
सूटकेस लिए खड़ा था।
वह चिल्ला रहा था, चीख रहा था
लोग समझ नहीं पाए कि वह क्या चाहता है
वे डर गए, फिर एक औरत सामने आई
( अपने बच्चों को पलंग के नीचे छिपा कर)
फिर दूसरी चली आई, वे समझ गईं कि
वह जर्मन नहीं है, जब करीब पन्द्रह इकट्ठी हो गईं
उसने सूटकेस खोला, खाली कर दिया
जब खाली हो गया तो वह बोला
"लो यह सब पैसा तुम्हारा है, जो जर्मनों को देना था"
फिर एक ब्रिटिश आया
उन्हे दूसरे कैम्प में ले गया
जहाँ अभी तक लाशे दफनाई नहीं गईं थीं
पानी बेहद खराब था, माँ बीमार पड़ गई
उसका मल उन चुकुन्दरों की तरह लाल हो गया था,
जिन्हे वह हर दिन खोदा करती थी।
मेरे पिता मेहनत से लकड़ियाँ चीरते रहे
सर्दी की तैयारी में,जैसे कि पोलेण्ड में किया करते थे
वे यह काम जानते थे और बीबी और बच्चों के लिए
कर रहे थे, लेकिन ब्रिटिशों ने उन्हे फिर दूसरे केम्प में
भेज दिया, उन्हे चिरी-चिराई लकड़ी छोड़नी पड़ी,
हालाँकि पिता ने कुछ अपनी पीठ पर लाद लीं,
दूसरे कैम्प में काफी बच्चे मर गए, मेरी
बहन बेहद बीमार हो गई, शायद गन्दे पानी की वजह से
उसकी माँ और बहन कैसे मरीं?

कभी माँ कहती कि लवाव के पश्चिम में
स्थित उसका घर बार- बार सपने में आता है
जो सफेद कपड़े पहने फूल वाली लड़की की
पहली कम्यूनिअन प्रार्थना की ध्वनि में
सलेटी रंग में खुलता है. चर्च के चारों तरह की
गन्दी गलियाँ पादरी और लड़के -लड़कियों से
पवित्र
दिखाई देती है
प्रार्थना उसे कब्रगाह की ओर ले जाती है
जहाँ उसकी माँ और बहन गेन्जा और
बहन की बेटी सो रहीं हैं.
कीचड़ भरी कब्रें जहाँ उन भुक्खड़ों ने
उनके गुप्त अंगों को काट
बन्दूक की गोली से मार कर डाल दिया था
माँ कहती है कि वे लोग पूरब से आए थे
भैंसें की तरह भयानक और विशाल थे
वह सपने को हाथ हिला दूर भगाना
चाहती है और फिर खेत जोतने, सर्दी के लिए
लकड़ी काटने की बाते करने लगती है, और बताने लगती है
कि कैसे उसके हाथ से दुधारी कुल्हाड़ी फिसली और
पाँव में बड़ा सा घाव बना गई, और सोचती है कि
इससे उसका दिल के की गर्माहट बरकरार रहेगी
चुकुन्दर
वह उन चुकुन्दरों के बारे में बताती है
जो उसने जर्मनी में खोदे थे, बेहिसाब, गुलाब से
ज्यादा लाल, बर्फ से पहले जमीनं में भीतर तक गड़े
आदमी के दिल और गुर्दे से भी ज्यादा लाल
उसे उस पहले चुकुन्दर की याद है, जब वह
खेत में अकेली थी, माँ पिता करीब नहीं थे
न ही बहन, वे सब मर चुके थे
लवाव में अकेला छोड़ कर, जमीन गीली और
ठण्डी थी, लेकिन मुलायम नहीं, कभी भी नहीं।
उसने कच्चा चुकुन्दर खा लिया, हालाँकि
जानती थी कि पकड़े जाने पर पीटी जाएगी.
वह कहा करती है कि कभी- कभी वह बहरी,
मूर्खा या लंगड़ी लूली होने का दिखावा भी करती थी
कभी दिखाती कि टाइफाइड या हैजा हो गया
या फिर उस बीमारी का दिखावा करती
जिसे बच्चे फ्रैन्च बीमारी
कहते थे, जिसमें सबसे दूर रहना पड़ता था।
उसे मालूम था कि उसे
थप्पड़, कमर पर चाबुक या फिर
आँखों के ऊपर चमड़े के दस्ताने वाले हाथों के घूंसे
मिलेंगे
यदि वह उन्हे अपने स्तन नहीं चूसने देगी,
और कोख को फोड़ने नहीं देगी
वह इसलिए ये दिखावे करती जिससे
उस यातना से बच जाए, जिनसे माँ. बहन
और उसकी छोटी बच्ची गुजरी थी।
वह सोचा करती कि ऐसी दुनिया में रहने का
फायदा ही क्या,जहाँ ना प्यार हो और ना पैसा
वह नहीं जानती थी कि उस पैसे का क्या हुआ
जिसे अमेरिकन सार्जेण्ट युद्ध खत्म होने पर छोड़ गया था
वह सोचती कि क्या ईश्वर उसके कष्टों को
याद रखता है,ईश्वर है कि नहीं, यह भी वह सोचती

युद्ध ने क्या सिखाया उसे
मेरी माँ ने सीखा कि सैक्स बुरा होता है
आदमी बेकार, और हमेशा ठण्ड रहती है
खाने के लिए कभी भी पूरा नहीं पड़ता
उसने सीखा कि यदि तुम्हारा हाथ बेकार हैं तो
तुम कभी बच नहीं सकते, पतझड़ में बच गए तो
सर्दी में हरगिज नहीं
उसने सीखा कि कैम्प में बस युवा
बच सकते हैं, बूढ़े बेकार रद्दी की तरह
ढेर में पड़े रहते हैं, और बच्चे चिकन और
ब्रेड की तरह काफी कम होते हैं।
उसने सीखा कि दुनिया टूटी जगह है
जहाँ ना चिड़ियाँ गाती हैं ना ही परियाँ
खुदा की दी यातना को सहन नहीं कर पातीं हैं
उसने यह भी सीखा कि प्रार्थना यह नहीं कि
शत्रु कम पीड़ा दे, बल्कि यह कि वे तुम्हें नहीं मारें
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