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कविता के बारे मे कुछ टिप्पण्णियाँ-

पिछले दिनों पत्र‍ पत्रिकाओं में कविता के बारे में कई लेख पढ़े, मुझे लगा कि वे समानधर्मी होते हुए भी विविध पक्ष को रख पा रहे थे। वे जो कह रहे थे, उनमे सवाल की गुंजाइश थी, फिर भी मुझे लगा कि उन्हें पढ़ना अपने आप को कविता से जोड़ने जैसा था। इस अंक में कविता सम्बन्धी विचारों के कुछ अंश प्रस्तुत कर रही हूँ।

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कविता का सृजन कुल मिला के सौंन्दर्य भाव को ही मूर्त करना है। यह भाव मनुष्य, प्रकृति और समाज की गतिकी से जुड़ा होता है। किसी कविता को परखने के लिए हम सौन्दर्य बोध की चर्चा करते हैं। आज हम कविता में जैसा सौन्दर्य भाव पहचानते हैं, क्या ऐसा पहले था या हमारी इन्द्रियाँ, मन और विवेक के साथ इसका विकास हुआ है। कवि के आँखों से देखी दुनिया मन में सौंन्दर्य का भाव जगाती है। वह हमें ?अपनी ओर खींचती भी हैं। हम उसे चाहते हैं। पसन्द करते हैं। वस्तु के सौन्दर्य को देखकर हमारे मन में सौन्दर्य का भाव जगता है। तो ध्यान दें कि वस्तु प्राथमिक है। क्या ऐसा भाव दार्शनिक, जीव वैज्ञानिक और पुरातत्वविद के मन मे भी जगता होगा? यदि जगता होगा तो शायद वे सौन्दर्यभाव की व्याख्या दूसरी तरह से करेंगे। बहुत बड़े वैज्ञानिक ने माना है कि सौन्दर्य भाव सिर्फ मनुष्यों में ही नहीं होता हैं। कुछ ऐसे रंग, ध्वनियाँ और ऋतुएँ हैं जो पशु‍- पक्षियों को भी लुभाते हैं। ....मनुष्य में प्रेम का भाव उसका खास गुण है़ हृदय मे उगे भाव ही उसे कविता में कह पाते हैं। विश्व की महान कविता इसका प्रमाण हैं कि प्रेम ने उच्चतम सृजन को प्रेरित किया है।

विजेन्द्र
(कृति ओर से साभार)


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कविता का मैदान बहुत विस्तृत है। कविता जीवन के कोने-कोने में झाँकती है। जीवन को माँजती है, चमकाती है, परिष्कार करती है। जीवन को सुन्दर से सुन्दरतम बनाने के लिए कविता निरन्तर संघर्ष करती है।

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जिस तरह से किसान अपने खेत में फसल लगाने के पश्चात् बड़ी सतर्कता से उसकी देखभाल करता है और कमजोर पौधों को उखाड़ने में कोई संकोच नहीं करता, उसी तरह सच्चा कवि जितनी तन्मयता से कविताओं को रचता है , उतनी निर्ममता से कमजोर कविताओं को नष्ट भी करता है।

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आज कविता को आम आदमी से कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा होना चाहिए। निरापद कविता के ललित प्रातर में विचरण करने का समय नहीं है यह। निरापद कविता इस महादेश का कुछ भी भला नहीं कर सकतीं। फूलों से बर्फ नहीं पिघल सकती। उसके लिए ताप चाहिए ताप!...
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कविता तंत्र में मिसफिट होता है। तंत्र उसे उसको पच नहीं पाता है। तंत्र बन्धन है कविता मुक्ति, तंत्र बंधन में डालता है, भाँति ‍-भाँति के प्रतिबन्ध लगाता है। कवि को बन्धन स्वीकार नहीं....

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ज्ञान का उफान कविता के काम नहीं आता। कवि को थोड़ा अबोध भी होना चाहिये, थोड़ा अनाड़ी भी।....


शिव कुमार पराग

(कृति ओर से साभार)

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सच्ची कविता अकारण नहीं परन्तु अनायास आती है। यह उसका सहज प्रकटीकरण होता है। बगैर तामझाम वह कवि की अन्तः चेतना में उद्भूत होती है। कृत्रिमता का आवरण चिरस्थाई नहीं सकता और कृत्रिम सजावट से उसका चेहरा विद्रूप हो जाता है। ..


यह सही है कि काव्य प्रेमी ही कविता के सच्चे पाठक होते हैं। लेकिन उत्कृष्ट रचनाओं में चुम्बकीय आकर्षण होता है जो पाठकों को जबरन अपनी ओर खींच लेता है। ... कविता कवि के हाथ का खिलौना नही है। न ही वह शब्दों का खेल है। कवि कविता रचता है। ठीक उसी तरह कविता भी कवि का पुनर्निर्माण करती है़ .....

जरूरी नहीं कि अच्छी कविता लाउड हो। कविता केवल गर्जन-‍ तर्जन नहीं है। यह शीतल मन्द बयार भी है। जीवन की सरल सरल कोमल भावनाओं की संवाहिका भी है। कविता को इनसे वंचित करना इनके साथ अन्याय होगा।

ललन चतुर्वेदी

(कृति ओर से साभार)

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जहाँ तक किसी कवि को उसकी भाषा से पहचानने का सवाल है, एक सीमा तक तो यह ठीक है, लेकिन अन्ततः उसकी वास्तविक पहचान उस अन्तर्वस्तु से बनती है, जिसे वह अपनी भाषा में व्यक्त करता है। भाषा में चमत्कार दिखाने वाले कवि भी बहुत हुए हैं, लेकिन जिन्होंने अपने समय और स्व भाव को अभिव्यक्ति दी है, वे ही मैदान में टिक सके हैं।

जीवन सिंह

(कृति ओर से साभार)



 


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