जेरि मर्फि (Gerry Murphy)की कविताएँ

शब्द का वजन

यह रहा कवि
शब्द भण्डार की पहाड़ी पर चढ़ता हुआ
पनिहारिन की तरह सन्तुलन बनाता हुआ
शार्टर आक्सफोर्ड डिक्शनरी के
दो पूरे अंकों के बीचों-बीच

कविता, एक साँस में

तुमने शायद ध्यान
नहीं दिया हो
कि जब जब तुम
बरामदे से गुजरती हो
लेनिन की मूर्ती
जरा ऊपर उचकती है
यह देख पाने के लिए कि
किस सहजता से तुमने
अपनी गोलाइयों को भरा है।

(जेरि मर्फि (Gerry Murohy)की अन्य कविताएँ)


 सुरेन्द्र प्रबुद्ध की कविता

अकाल

माँ सहजता से
बातचीत में
सुख- दुख को
दुख-सुख कहती है
क्रम को उलट देती है
कब से
पता नहीं

माँ दुख-सुख को
भूख- दुख कहती है
सुख को काट देती है
यूँ ही नही

बच्चे
अकाल में
माँ की ज्यादा याद करते हैं
कब से
पता नहीं
यूँ ही नहीं

(सुरेन्द्र प्रबुद्ध की अन्य कविताएँ)
 


अमित कल्ला की कविता

उसकी आँखें

उसकी आँखों में जो
चमक थी
क्या कहूँ
सितारा या स्वप्न
एक तरफ आकाश
जिसकी परिधि रंगी
स्वर्ण वर्ण से
चिड़िया चाहती बनाना
घोंसला
हिरण जहाँ विश्राम को लालायित
और भटक रहा था मैं
शरणागति के लिए।

(अमित कल्ला की अन्य कविताएँ)
 



इला कुमार की कविता

कहा था मैंने
(माँ के लिए)

कहा था मैंने
लौटकर
कभी न कभी अवश्य आऊँगी

किसी गर्म उमस भरी दुपहरिया में
ठसाठस भरी बस से उतरकर
अपने शहर की मोहग्रस्त धरती पर

छूट गया समय
एक बारगी हिलक उठता है

दूर गुलमोहर के पीछे
आकाश के विस्तार में छिपी है
दो आकुल आँखों में भरी प्रतीक्षा

सम्पूर्ण सिहरते वजूद का यह वाष्पित दाब

(इला कुमार की अन्य कविताएँ)
 

ओम भारद्वाज की कविता

पहाड़ पर बच्चा

बच्चे को देख विशालता में मग्न
पहाड़ चूमता है गगन
एक- एक कण
खेलता है कई दिनों बच्चा
कण- कण टूटता है पहाड़
बच्चा है बेखबर
पहाड़ का टूटना
उसने नहीं देखा
वह अपने खिलौने पर
कर लेता है अंतरिक्ष यात्रा
एक छोटे से कमरे में
लौ आने पर
चूहे दौड़ते देख
मुस्कुराता है
चूहे की पूँछ से बंधा पहाड़
छटपटाता है।

( ओम भारद्वाज की अन्य कविताएँ)
 


कृष्ण कुमार यादव की कविता

नया जीवन

टकटकी बाँध कर देखती है
जैसे कुछ कहना हो
और फुर्र हो जाती है तुरन्त
फिर लौटती है
चोंच में तिनके लिए
अब तो कदमों के पास
आकर बैठने लगी है
आज उसके घौंसले में दिखे
दो छोटे- छोटे अण्डे

जब भी कुर्सी पर बैठता हूँ
पता नहीं कहाँ से आकर
बैठ जाती है कुर्सी के हत्थे पर
कहना चाहती है कुछ शायद
फिर फुर्र हो चली जाती है
घोंसले मे, सुबह नीन्द खुलती है
चूँ चूँ की आवाज
दो नये जीवनों का आरंभ
खिड़की खोले ही
नजर आती है उसकी चमक भरी
आँखे और चूँ चूँ
चूँ चूँ...।

(कृष्ण कुमार यादव की अन्य कविता )
 


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