कृत्या प्रकाशन की  पुस्तकें
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"शलभ" श्री राम सिंह की कविताएँ ठेठ कस्बई अनुराग से प्लावित होने के कारण ऐसी भाषा में संवाद कर पाती हैं जो केवल अपने लोगों की हो सकती है। शलभ की कविता उस आग की तपन लिए है जो सीधे सीने से निकलती है। अभी हाल में ही अनियमित कालीन पत्रिका धरती ने शलभ पर एक विशेषांक निकाला। कृत्या उसी में कुछ कविताओं का चयन कर एक प्रमुख लेख देना चाहेगी। इस के लिए हम "धरती" पत्रिका के आभारी हैं।

जीवन बचा है अभी

जीवन बचा है अभी
जमीन के भीतर नमी बरकरार है
बरकरार है पत्थर के भीतर आग
हरापन जड़ों के अन्दर साँस ले रहा है!

जीवन बचा है अभी
रोशनी खाकर भी हरकत में हैं पुतलियाँ
दिमाग सोच रहा है जीवन के बारे में
खून दिल तक पहुँचने की कोशिश में है!

जीवन बचा है अभी
सूख गए फूल के आसपास है खुशबू
आदमी को छोड़कर भागे नहीं है सपने
भाषा शिशुओं के मुँह में आकार ले रही है!

जीवन बचा है अभी

दिल्लियाँ

हाथी की नंगी पीठ पर
घुमाया गया दाराशिकोह को गली-गली
और दिल्ली चुप रही

लोहू की नदी में खड़ा
मुस्कुराता रहा नादिर शाह
और दिल्ली चुप रही
 
लाल किले के सामने
बन्दा बैरागी के मुँह में डाला गया
ताजा लहूसे लबरेज अपने बेटे का कलेजा
और दिल्ली चुप रही

गिरफ्तार कर लिया गया
बहादुरशाह जफर को
और दिल्ली चुप रही
दफा हो गए मीर गालिब
और दिल्ली चुप रही

दिल्लियाँ
चुप रहने के लिए ही होती हैं हमेशा
उनके एकान्त में
कहीं कोई नहीं होता
कुछ भी नहीं होता कभी भी शायद

एक दिन

पृथ्वी पर जन्मे
असंख्य लोगों की तरह
मिट जाऊँगा मैं,

मिट जाएंगी मेरी स्मृतियाँ
मेरे नाम के शब्द भी हो जाएँगे
एक दूसरे से अलग
कोश में अपनी-अपनी जगह पहुँचने की
जल्दबाजी में
अपने अर्थ समेट लेंगे वे

शलभ कहीं होगा
कहीं होगा श्रीराम
और सिंह कहीं और

लघुता-मर्यादा और हिस्र पशुता का
समन्वय समाप्त हो जाएगा एक दिन
एक दिन
असंख्य लोगों की तरह
मिट जाऊँगा मैं भी.

फिर भी रहूँगा मैं
राख में दबे अंगारे की तरह
कहीं न कहीं अदृश्य, अनाम,अपरिचित
रहूँगा फिर भी-फिर भी मैं

राग-बोध

औरत ने कहा
मर्द ने कुछ भी नहीं सुना
मर्द ने कुछ भी नहीं कहा
औरत ने सुन लिया सब कुछ!

एक बच्चा
कि सपना औरत और मर्द का मिला-जुला
पूरा का पूरा आदमी बनकर खड़ा है!

औरत कुछ भी नहीं कह रही है
मर्द सब कुछ सुन रहा है
यहाँ तक कि औरत की साँसों में
साँस ले रही है चुप्पी को
सुगबुगाकर
सहस्रदल कमल बन गई है जो।

सुबह

सुबह-सुबह
किसने आकर मुझसे यह कहा
जीवन हूँ मैं
मेरे साथ आ!

धरती-जल-वृक्ष-लता-पुष्प
सभी धुले-धुले!
आँखों में रह-रह कर
अनगिन आकाश खुले!
हाथ के इशारे से
बुला रही है कब से
रंग भरी धूप
और
इठलाती हुई हवा!
जीवन हूँ मैं, मेरे साथ आ!

प्यार

प्यार था
मुस्कान में, चुप्पी में
यहाँ तक कि खिड़की में भी प्यार था!

अंधेरे में काँपता
छाया की तरह धूप में
सावधान करता
राहों के खतरों से बार-बार
प्यार था।

झरता हुआ पखंड़ी-पंखड़ी
ओस में भीगा भरा-भरा
हिलता हवा में रह रह कर
प्यार था।

आँखों में झाँकता
उतरता मन की गहरायों में
मुक्त करता हुआ किसी भी प्रस्थान के लिए
प्यार था
मुस्कान में, चुप्पी में,यहाँ तक कि खिड़की में भी।

रास्ता है

रास्ता है
इसी जंगल में है रास्ता!
इसी सिरे से शुरु होता हुआ
इसी जगह ठीक
हमारे पाँवों के नीचे
इसी जंगल में है रास्ता!
वहाँ जहाँ से उड़ी है
अभी कोई चिड़िया!
वहाँ जहाँ चीखकर
उछला है एक जानवर!
वहाँ जहाँ गिरी है अररा कर
पेड़ की एक डाल!
इसी जंगल में रास्ता इसी...
टपका है कहीं कोई फल
झरा है कोई फूल कहीं पर अभी-अभी
अभी-अभी हिला है पानी कहीं
रास्ता है!रास्ता है!!रास्ता है!!!
इसी सिरे से शुरु होता हुआ...
इसी जगह ठीक...
हमारे पाँवों के नीच...
इसी जंगल में....
 


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