
कृत्या प्रकाशन की पुस्तकें
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Kritya2008 |
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वेब
पत्रिका साहित्य को विकेन्द्रीकरण की प्रवृत्ति प्रदान करती है, जो
उसके विकास और व्यापकता की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। वेब हर किसी
को उपलब्ध हो सकता है, अर्थात् लिखना और छपना उस हरेक के लिए सुलभ
हो सकता है शर्त यह कि उसमे लिखने का जुनून हो। यह एक ओर तो
साहित्य को व्यापकता दे सकता है, दूसरी ओर विवधता। हर लम्हा, हर पल
साहित्य बन सकता है। अब साहित्य को पैदा करने के लिए किसी कारखाने
की जरूरत नहीं, और नहीं चाहिए किसी मठाधीश का शासन । ऐसा भी नहीं
कि किसी खास तरीके की पत्रिका में छप गए और प्रतिष्ठित मान लिए गए
और ह्रास की ओर उन्मुख हो चले। कई लोगों को यह भ्रम हो सकता है कि
यदि साहित्य पर लगाम ना लगाई गई तो अच्छा-बुरा, गलत-सलत सभी
साहित्य में घुसता चला जाएगा। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि
साहित्य खुद अपनी दिशा निर्धारण कर सकता है। इस लिए इन बातों से
घबराने की जरूरत ही नहीं। अच्छी रचनाएँ वृक्ष बनेंगी तो बुरी खुद ब
खुद मिट कर खाद बन जाएँगी। उपयोग तो दोनो का ही समान ही है।
रति सक्सेना
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विचारधारा की तरह
कहीं कहीं बची है चोटियों पर बर्फ
पर ठंड की तानाशाही
विचारधारा के बिना भी कायम है।
लीलाधर मंडलोई
*
जब भी छोड़ेंगे
पूरे कि पूरे नहीं जाएंगे हम
कुछ न कुछ हम छूट जाएँगे यहाँ
और अकस्र बहुत दूर से
मुर मुड़ कर देखते रहेंगे
अपने उस छूटे हुए कुछ को
राजेन्द्र नागदेव
*
थोड़ी थोड़ी ले लो/ बन्धु
अपनी आग में मिला कर
इसे बरतो/ और देखना इस का ताप
गुपचुप पहुँच जाती है चीज़ों में अपने आप!
इस ठंडी अंधेरी रात में
रोशनी की रोशनी
गरमाईश की गरमाईश
बोलो रक्खोगे मुठ्ठी भर?
अजेय
*
बहुत
दिन बीत गए
चाँद का अचार खत्म हो गया
माँ भी नहीं रही
बेस्वाद-सी दोपहरें अब भी है
मीठी-सी शाम वो मज़ा नहीं देती
शैफाली शर्मा
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शलभ ने जब कविता लिखनी शुरु
कि उस समय कविता अपने अस्तित्व के संकट से गुजर रही थी। किसिसम
किसिम की कविता के नाम पर उस दौर के तथाकथित कवि, कविता को जिबह
करने में लगे थे। उन्हें जातीय कविता से कुछ लेना देना नहीं था। वे
विश्व कविता में अपनी हैसियत बनाने वाले अवसर वादी कवि थे। शलभ
जातीय विरासत वाले कवि थे अतः उन्होंने १९६६ में "युयुत्सा"
पत्रिका के माध्यम से कविता खी इन विजातीय विरासत के खिलाफ
"युयुत्सु कविता" का नारा बुलन्द किया। इसे भी एक वाद समझा गया,
जबकि यह शलभ के विद्रोही स्वभाव की स्वाभाविक प्रवृत्ति से उपजा एक
सार्थक आन्दोंलन था। इसके द्वारा उन्होंने जन चेतना के खिलाफ चलती
साजिस के विरुद्ध लोगों को आगाह भी कर दिया
"पूरब में चमकते सूरज के खिलाफ
एक साजिश चल रही है
ताकीद दी जा रही है लोगों को कि वे
झोले में अपना-अपना सूरज लेकर चलें।"
विद्याधर शुक्ल ....और »
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हाथी
की नंगी पीठ पर
घुमाया गया दाराशिकोह को गली गली
और दिल्ली चुप रही
लोहू की नदी में खड़ा
मुस्कुराता रहा नादिर शाह
और दिल्ली चुप रही
*
पृथ्वी पर जन्मे
असंख्य लोगों की तरह
मिट जाऊँगा मैं,
मिट जाएंगी मेरी स्मृतियाँ
मेरे नाम के शब्द भी हो जाएँगे
एक दूसरे से अलग
कोश में अपनी अपनी जगह पहुँचने की
जल्दबाजी में
अपने अर्थ समेट लेंगे वे
*
औरत ने कहा
मर्द ने कुछ भी नहीं सुना
मर्द ने कुछ भी नहीं कहा
औरत ने सुन लिया सब कुछ!
एक बच्चा
कि सपना औरत और मर्द का मिला जुला
पूरा का पूरा आदमी बनकर खड़ा है!
*
प्यार था
मुस्कान में, चुप्पी में
यहाँ तक कि खिड़की में भी प्यार था!
"शलभ" श्री राम सिंह
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फूजीवारा नो किन्तसुने
(1171-1244)
फूलों की बर्फ नहीं है,
जिसे उत्तेजित जंगली वायु घुमाती है
बगीचे के चारों ओर
यह जो मुरझा कर गिर रहा है
इस जगह वह मैं हूँ।
फूजीवारा नो कियोसुके
(1104-1177)
यदि मैं अधिक जीवित रहूँ
फिर शायद यह वर्तमान दिन
मेरे लिए प्रिय हो,
जैसे अतीत का दुख भरा काल
धीरे से विचारों में आ जाता है।
फूजीवारा नो तोशीनारी
(1114-1204)
मैं सोचता हूँ इस संसार से
कहीं बच निकलना संभव नही।
मैं छुपना चाहता था
पर्वतों की अत गहराइयों में
पर फिर सुनाई दी एक हिरण की पुकार।
लेडी होरीकावा
क्या हमेशा के लिए
वह आशा करता है कि हमारा प्रेम बना रहेगा?
उसने उत्तर नहीं दिया।
और अब मेरे दिन के विचार
उलझ गए हैं मेरे काले बालों की तरह।
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