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आज
कल मैं इस बात से बड़ी आश्वस्त हूँ कि अपने देश में वेब पत्रिकाओं
और ब्लाग पत्रिकाओं का चलन बड़ी तेजी से बढ़ रहा है। तीन-चार साल पहले
कृत्या के लिए लोगों को यह समझाना ही मुश्किल था कि वेब पत्रिका
में भी अच्छे साहित्य की गुंजाइश है, लेकिन आज हमें वेब पटल पर
अच्छी-अच्छी साहित्यिक पत्रिकाएँ दिखाई दे रही हैं। यह स्थिति
हिन्दी में अन्य भाषाओं की तुलना में देर से आई, मलयालम आदि छोटे
प्रान्तों की भाषाओं में वेब पत्रिका का चलन अच्छा-खासा पुराना है।
हिन्दी में भी वेब पत्रिकाएँ बड़े शहरों की अपेक्षा छोटे शहरों में
ज्यादा प्रचलित हुई। अब तो फिल्मी सितारों के वेब निकलने के
उपरान्त यह एक चर्चित माध्यम बन गया है। फिर भी अनेक साहित्यिक
मित्रो द्वारा यह सुझाव आता रहता है कि भई ! अब तो कृत्या प्रिन्ट
में निकालिए, प्रिन्ट ही लोग पढ़ते हैं। दरअसल अभी भी मन के किसी
कोने में यह दबा छिपा भाव है कि प्रिन्ट होने पर ही कोई पत्रिका
स्थापित मानी जा सकती है।
मैं उनकी बात सुनती हूँ, पर चुप रहती हूँ। कृत्या को निकलते हुए
साढ़े तीन वर्ष पूरे हो गए। इस बीच यह भारतीय पाठकों ही नहीं बल्कि
विदेशी पाठकों के बीच भी अपनी जगह बना चुकी है। हम दो प्रान्तीय और
एक अन्तर्राष्ट्रीय काव्योत्सव मना चुके है, अब चण्डीगड़ में चौथा
काव्योत्सव मनाने जा रहे हैं । अतः प्रिन्ट के क्षेत्र में उतरना
हमारे लिए कठिन नहीं है। लेकिन कुछ मुद्दे हैं, जिस पर कृत्या बार-बार बहस करना चाहेगी। उन में से पहला मुद्दा है- विकेन्द्रीकरण का,
दूसरा है पर्यावरण का।
हम पहले मुद्दे पर ध्यान केन्द्रित करे तो पायेंगे कि वेब पत्रिका
साहित्य को विकेन्द्रीकरण की प्रवृत्ति प्रदान करती है, जो उसके
विकास और व्यापकता की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। वेब हर किसी को
उपलब्ध हो सकता है, अर्थात् लिखना और छपना उस हरेक के लिए सुलभ हो
सकता है शर्त यह कि उसमे लिखने का जुनून हो। यह एक ओर तो साहित्य
को व्यापकता दे सकता है, दूसरी ओर विविधता। हर लम्हा, हर पल साहित्य
बन सकता है। अब साहित्य को पैदा करने के लिए किसी कारखाने की जरूरत
नहीं, और नहीं चाहिए किसी मठाधीश का शासन । ऐसा भी नहीं कि किसी
खास तरीके की पत्रिका में छप गए और प्रतिष्ठित मान लिए गए और ह्रास
की ओर उन्मुख हो चले। कई लोगों को यह भ्रम हो सकता है कि यदि
साहित्य पर लगाम ना लगाई गई तो अच्छा-बुरा, गलत-सलत सभी साहित्य
में घुसता चला जाएगा। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि साहित्य
खुद अपनी दिशा निर्धारण कर सकता है। इस लिए इन बातों से घबराने की
जरूरत ही नहीं। अच्छी रचनाएँ वृक्ष बनेंगी तो बुरी खुद ब खुद मिट कर
खाद बन जाएँगी। उपयोग तो दोनो का ही समान ही है। अच्छा बीज और अच्छी
खाद।
अब दूसरे बिन्दु पर ध्यान दें, पर्यावरण। एक कागज बनाने के लिए
कितने वृक्षों को बली देनी पड़ती है। केरल में रहने के कारण में सीने
में खंजर घुपाए रबड़ के पेड़ों को देखती हूँ, तो सोचती हूँ कि जहाँ
तक हो प्लास्टिक और रबड़ से परहेज किया जाए। यदि कृत्या प्रिन्ट में
निकल रही होती तो अभी तक हजारों वृक्षों की बलि ले चुकी होती। वेद
की छात्रा होने के कारण और केरल में निवास होने के कारण मैं वृक्षों
को सबसे बड़ा मित्र मानती हूँ। कालडी विश्वविद्यालय में रहते हुए जब
मैं होस्टल से विश्वविद्यालय की ओर जाती हूँ तो ये ऊँचे खूबसूरत
पेड़
मुझसे झुक कर बाते करते हैं, जब भी मन भ्रमित होता है तो मै उनसे
दुआ भी माँगती हूँ। वृक्ष मेरे इतने करीब है कि मैं उनके कत्लेआम
के बारे में सोचते ही सिहर उठती हूँ। इसी लिए मैं सोचती हूँ कि यदि
कृत्या वेब में रहे तो अच्छा है, प्रिन्ट में आते ही ना जाने कितने
वृक्ष मित्रों की जान चली जाएगी। धरती को बचाने के लिए एक छोटा सा
प्रयास भी बड़ा प्रभाव डाल सकता है। यह हमारा चालीसवाँ अंक है और हम
चाहते हैं कि हम बिना एक वृक्ष की भी बलि लिए आपसे चारसौ अंकों तक
संवाद कर सकें।
बस मित्रों, मैं यही कहूँगी कि यदा- कदा प्रिन्ट निकालने की बात
अलग है, कृत्या वेब पत्रिका के रूप में जीना चाहेगी। इस अंक में
फिर से आप फिर से अच्छी कविताएँ पढ़ेंगे इसी अंक के चित्र ईरान की
युवा चित्रकार, कलाकार Mahya Farmani द्वारा बनाए गए हैं, जो
तेहरान की यूनीवर्सिटी में चित्रकला की शिक्षा ले रहीं हैं।
रेखाचित्र राजेन्द्र परदेशी द्वारा बनाए गए हैं। आशा है कि इस अंक
में काव्य सामग्री पाठकों को कुछ नया और अच्छा अवश्य दे पाएगी।
शुभकामनाएँ सहित
रति सक्सेना
An
International Poetry festival -
Kritya2008
पत्र-संपादक
के नाम
kritya2007
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