कविता
के अकाल मे शलभ
विद्याधर शुक्ल
शलभ श्री राम सिंह अपने दौर के तमाम औसत कवियों के बीच सामाजिक
चेतना से लैस एक युयुत्सु कवि थे।शलभ की काव्यात्मक चेतना कविता की
जातीय विरासत से उद्भूत थी। उनकी कविताओं में कबीर का अख्खड़पन
नजरुल की क्रान्ति चेतना और निराला का ओज कहीं कहीं कौंध जाता है।
शलभ अपनी कविताओं में मुक्तिका एहसास जिन्दा रखने में निरंतर
प्रयत्नशील रहे। वे सिर से पाँव तक कवि थे। कविता को उन्होंने अपना
जीवन सौंप दिया। शलभ कविता में ही जागे, जिए और मरे। लेकिन आज के
बन्दर बाटी आलोचक समकालीन कवियों की मर्दुमशुमारी में शलभ जैसे
शक्तिसम्पन्न और जनचेता कवि का नामोल्लेख तक नहीं करते। जबकि
सच्चाई यह है कि साठोत्तर कवियों में धूमिल के असमय निधन के बाद
शलभ से बड़ी उम्मीदें की गई थी, वे आधी अधूरी रह गईं। गोरख पाण्डे
पर भी आशाएँ टिकीं लेकिन उनकी आत्म हत्या ने ऐसी उम्मीदों पर पानी
फेर दिया। मौजुदा दौर में हिन्दी कविता पर काव्यात्मक गद्य लिखने
वाले साहित्यिक माफिया यानी कि "अभिजन वादी" काबिज है। राजन्द्र
यादव की चिन्ता वाजिब है:-इधर लिखी जानी वाली अधिकांश कविता
अप्रासंगिक, बौद्धिक और फालतू या अर्थहीन मुहावरों की कवायद है
इनके पास न अपने विषय हैं न भाषा, जिसे शायद कुछ मित्र कवियों के
सिवा कोई नहीं पढ़ता। अगर पुरस्कारों और लोकार्पणौं का फैशन न हो तो
हो सकता है वह साहित्य में दिखाई देना ही बन्द हो जाए। "
शलभ ने जब कविता लिखनी शुरु की, उस समय कविता अपने अस्तित्व के
संकट से गुजर रही थी। किसिम-किसिम की कविता के नाम पर उस दौर के
तथाकथित कवि, कविता को जिबह करने में लगे थे। उन्हें जातीय कविता
से कुछ लेना-देना नहीं था। वे विश्व कविता में अपनी हैसियत बनाने
वाले अवसर वादी कवि थे। शलभ जातीय विरासत वाले कवि थे अतः उन्होंने
1966 में "युयुत्सा" पत्रिका के माध्यम से कविता की इन विजातीय
विरासत के खिलाफ "युयुत्सु कविता" का नारा बुलन्द किया। इसे भी एक
वाद समझा गया, जबकि यह शलभ के विद्रोही स्वभाव की स्वाभाविक
प्रवृत्ति से उपजा एक सार्थक आन्दोंलन था। इसके द्वारा उन्होंने
जन-चेतना के खिलाफ चलती साजिस के विरुद्ध लोगों को आगाह भी कर दिया
"पूरब में चमकते सूरज के खिलाफ
एक साजिश चल रही है
ताकीद दी जा रही है लोगों को कि वे
झोले में अपना-अपना सूरज लेकर चलें।"
शलभ
उस दौर के कवि हैं जब तमाम कवि अपना रास्ता भूलने के कारण
पाश्चात्य सांस्कृतिक हमले के शिकार हो गए थे। ऐसा नहीं कि शलभ
इससे बरी थे, उन्होंने भी ऐसा भावानात्मक गद्य अधिक लिखा लेकिन शलभ
का सरोकार हर मोर्चे पर युयुत्सा से ही रहा है। युयुत्सु में
भावुकता नुकसानदायक है और शलभ में भावुकता ज्यादा रही। यदि ऐसा
नहीं होता तो वे एक बेजोड़ विद्रोही कवि होते। जब उनका विद्रोही
तेवर तीखा था, दृष्टि जड़ तक जाती थी।
पेट के इशारों पर उठते हैं हाथ
पाँव चलते हैं पेट के इशारों पर
पेट के इशारों पर हरकत में आता है शरीर
पेट आत्मा का पहला ग्रन्थ है
परमात्मा का आइना है पेट
पेट हमारा पहला और आखिरी उस्ताद है।
शलभ ने कविता की शुरुआत उर्दू शायरी से शलभ फैजावादी नाम से की,
बाद में वे नव-गीत आन्दोलन में शामिल हुए अब वे श्रीराम सिंह शलभ
हो गए। बाबा नागार्जुन ने कहा है "जब श्रीराम सिंह शलभ गीत रचता है
तब लगता है कि वे गीत हैं और गीत रचना क्या होता है।"अपने गीतों ने
मध्यवर्गीय कसक और लाचारी को शब्द दिए हैं। एक गीत ने उन्हें बहुत
शोहरत दी था-
" नफस नफस, कदम कदम
बस एक फिक्र दम बदम
गिरे हैं हम सवाल से जवाब चाहिए
जवाब दर सवाल है, इंकलाब चाहिए।"
" कल सुबह होने से पहले": शलभ का पहला कविता संग्रह है जो 1966 में
प्रकाशित हुआ था। इसके बाद" अतिरिक्तः पुरुष आया।
1988 में वे गजलों के संग्रह "राहे हयात" के साथ प्रकट होते है, इन
गजलों में शलभ की जनवादी दृष्टि को पहचाना जा सकता है। नागार्जुन
ने फिर कहा" शलभ की गजल उस्तादी लिए हुए है। शलभ ताल ठोंक कर खड़ा
है गजल में। 1983 में नागरिकनामा की कविताओं में शलभ एक नया तेवर
लेकर खड़े हैं।
बुनियादी तौर पर शलभ प्रेम और प्रकृति के नहीं बगावत के कवि है। "
औरत, कुदरत और बगावत" ये तीन तत्व उनकी कविता के प्रेरणा स्रोत और
केन्द्र बिन्दु हैं। लेकिन वे प्रेम के महत्व को कबीर की तरह
पहचानते हैं।
नहीं किया जिसने प्यार
युद्ध नहीं कर सकता वह
युद्ध में जाती है जान
जान देने की तमीज सिखाता है प्यार...
युद्ध में जन्म लेता है जीत का विचार
विचार को जिन्दा रखता है प्यार....
शलभ की कविताओं में स्त्री को लेकर जितनी भावभंगिमाएँ हैं, उतनी
शायद किसी अन्य समकालीन कवि में होंगी।
"एक हँसी का नाम है स्त्री
स्त्री एक रुलाई का नाम है
एक खामोशी का नाम है स्त्री
स्त्री एक नजर का नाम है
स्त्री एक लहर का नाम है
एक चेतना का नाम है"
शलभ प्रकृति के ऐसे कवि है जो उसकी विनाश लीला से रह-रह कर हतप्रभ
हैं।
"ठूँठ पर एक पत्ती है
रह रह कर हिलती है
हवा के बहाव पर दर्ज कराती
अपना होना
ठूँठ में जीवन की उपस्थित बयान करती
...
एक पत्ती है ठूँठ पर।"
शलभ का सबसे प्रबल पक्ष है बगावत का। वे जन साधारण के जीवन को
त्रासद बनाने वाली शक्तियों के खिलाफ मोर्चे पर तैनात कवि हैं। वे
समय और समाज के प्रति सचेत कवि हैं। देश की भयावह हालात पर वे कहते
हैं..
"बच्चों की खोपड़ियों का व्यापार
हो रहा है यहाँ
व्यापार हो रहा है उनकी हड्डियों का
गुर्दों आँखों और खून का व्यापार....।
शलभ कविता लिखना सामाजिक जीवन का पर्याय मानते हैं। शोषण, मुक्ति
और मनुष्यता के लिए अनवरत जारी संधर्ष में एक सिपाही की तरह शरीक
रहने वाले शलभ एक नव समाज का सपना देखते हैं। उनका विश्वास है कि
लोगो कि एक जुटता ही शोएण मुक्त समाज कायम कर सकती है।
अकेले में न मुक्ति है न मृत्यु
जन्म और जीवन भी
अकेले में कहाँ मिला है किसी को..
"एक साथ उठने का समय है यह...
समय है एक साथ खोजने और सोचने का
पृथ्वी को एक जुट हो बचाने का समय है यह।"
शलभ के कवि का बगावती रूप उनके प्रकृति और प्रेम से ज्यादा चटकदार
है और असरदार है। शलभ अपनी कविताओं में आम आदमी के सपने और संधर्ष
को ओजपूर्ण स्वर प्रदान करते रहे हैं। बगावत लगता है उनकी कविता की
मूल प्रतिज्ञा है।
"बन्दूक का रुख मोड़ने के लिए
बन्दूक उठाओ
सभ्यता का तकाजा है बर्बर हो जाओ
अब यह बेहद जरूरी है
खून की धार रोकने के लिए खून बहाना।

शलभ प्रगतिशील जातीय विरासत के कवि हैं। वे जनता के कवि है। उनकी
कविता का जातीय स्मृति बोध उन्हे जीवन्त कवि बनाता है। वे "हम ना
मरै मरि है संसारा" के विरासत के कवि हैं, वह दाबे के साथ कहते
हैं-
एक दिन
असंख्य लोगों की तरह
मिट जाऊँगा मैं भी.
फिर भी रहूँगा मैं
राख में दबे अंगारे की तरह
कहीं न कहीं अदृश्य,अनाम,अपरिचित
रहूँगा फिर भी-फिर भी मैं
(धरती नामक पत्रिका में छपे लेख का सारांश,
साभार)