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अजेय
की कविता
वे तीन दिन और कुछ साँवली कविताएँ
तीन दिन
वैल्लूपल्ली की दर्शक दीर्घा में
विशाल काले स्तंभों की ओट
लुकती-छिपती कुछ सुन्दर कविताएँ
बड़ी-बड़ी कातर आँखों से देखती रहती मुझे
देर-देर तक
और भाग जाती!
तीन दिन
लिखते रहे लगातार
मुस्कराती आँखों से
अप्रस्तुत शब्दों में
बहुत कुछ कहती कविताएँ
जिन्हें पी लेना चाहता हुआ
न कुछ पढ़ पाया
न कुछ सुन पाया
पड़ा रहा निश्चेष्ठ सपनों में!
तीन दिन
लगता रहा बार-बार
कि इन कविताओं को समझा नहीं जाना है
जिया जाना है
कि जारी रहे एक खुशफहमी
गोया वही हो सच
तो भी समझनी ही पड़ती हैं
ज़िन्दगी में आने वाली तमाम कविताएँ
क्या करूँ उन तीन साँवले दिनों
और उन अदभुत कविताओं का
कैसे उड़ा ले जाऊँ
हिमालय के आखिरी कोने तक
सहेज कर स्मृतियों में।
24 जून 2007
(अजेय
की अन्य कविताएँ)
राजेन्द्र नागदेव
की कविता
शहर छोड़ने से पहले
अभी हमने छोड़ा नहीं है शहर
पर लगने लगा है
छोड़ चुके हैं
एक पराया पन घुल गया है बहुत जल्दी
यहाँ की हवा में, यहाँ के पानी में
यहाँ के वृक्षों में, यहाँ की सड़कों में
यहाँ की गलियों में, यहाँ के लोगों में
जब भी छोड़ेंगे
पूरे कि पूरे नहीं जाएंगे हम
कुछ न कुछ हम छूट जाएँगे यहाँ
और अकसर बहुत दूर से
मुड़-मुड़ कर देखते रहेंगे
अपने उस छूटे हुए कुछ को
बहुत पहले से तैयार थे बस्ती के लोग
हमने तो अभी सोचा ही था
और सोचने भर से
निर्वासित हो गए
(राजेन्द्र
नागदेव की अन्य कविताएँ)
सरोजिनी साहू की
उड़िया कविता
दाम्पत्य
हम दोनों बैठे थे
चुपचाप
दिन बीता,सांझ हुई
सांझ बीती,रात हुई
पंछी लौट चले अपने घोंसोलों में
चाँद निकलने वाला था,
हमें मालूम न था
कि यह शुक्ल पक्ष है या कृष्ण पक्ष
हम दोनों बैठे थे चुपचाप

चारों तरफ़ साँप-सपोले, कीडे-मकोडे
घेरे थे हमें लता-गुल्मों की तरह
उनकी ओर हमारी निगाहें न थी
अँधेरा गहराता गया
यहाँ तक एक दूसरे को देखना भी संभव न रहा
फिर भी दोनों बैठे रहे चुपचाप
क्योंकि पहचानते थे एक दूसरे की साँस को
हम बैठे रहे
ओस भिगाती गई,
कुहासा ढकता गया ,
पाँवों जमते गए ,
बर्फ बनने के पहले
किसी ने मेरी हथेली पर अपना हाथ रखा .
(अनुवाद : जगदीश महान्ति )
(सरोजिनी साहू की अन्य कविता)
शशि भूषण सिंह की कविता
साझे दिनों में
वो क्या है
जो खींच ले जाता है
सारा ध्यान सारा केन्द्रन
टूट जाती है सारी तन्मयता
बैचेन कर जाता है तन-मन...
वो क्या है
जो भीड़ और चीख भरे जीवन में
घुस आता है अचानक
खींच ले जाता है वहाँ
जहाँ अनहद मौन है....
वो क्या है
जो हटा देता है आँखें
आसपास की सारी कुरूपता से
खींच ले जाता है वहाँ
जहाँ सब कुछ सौम्य है, सुन्दर है....
वो क्या है
जो तपते सुलझते दिनों में भी
आता है अपनी सुकुमारता के साथ
खींच ले जाता है वहाँ
जहाँ झोंके हैं ठण्डी हवा के
मौसम है फुहारी सा....
शायद कोई जादू अदेखा
शायद कोई रहस्य अनजाना
शायद कोई घटना अलौकिक अदृश्य
अथवा एक अहसास
जो तुममे है, मुझमे है
जो पनपा है, पका है
पुख्ता हुआ है
हमारे साझे दिनों में

(शशि
भूषण सिंह की अन्य कविताएँ)
शैफाली शर्मा की कविता
चाँद का अचार
एक रात तन्हाई संग
छत पर टहलने निकली
तो देखा आसमान के आँगन में
चाँद का अचार रखा था
माँ उसे उठाना भूल गई थी
तो तारे उस पर लग गए थे
मैं उसे उठाकर ले आई
आँसुओं से धोया
और सपने के छज्जे पर रख दिया
जब कभी दोपहर बेस्वाद हो जाती थी
चाँद का अचार चख लेती थी
कभी कविता की रोटी पर चुपड़ लेती थी
कभी कहानी में उसका मसाला मल लेती थी
बहुत दिन बीत गए
चाँद का अचार खत्म हो गया
माँ भी नहीं रही
बेस्वाद-सी दोपहरें अब भी है
मीठी-सी शाम वो मज़ा नहीं देती
आज भी अकसर तन्हाई के संग
छत पर टहलने निकलती हूँ
तो याद आती है माँ
और चाँद का अचार......
( शैफाली
शर्मा की अन्य कविताएँ)
लीलाधर मंडलोई की कुछ नन्हीं
कविताएँ
अ-मृत
हमेशा नहीं रहते
पहाड़ों के छोये

पर हमेशा रहेंगे वे दिन
जो तुमने और मैंने एक साथ खोये।
विचारधारा
विचारधारा की तरह
कहीं-कहीं बची है चोटियों पर बर्फ
पर ठंड की तानाशाही
विचारधारा के बिना भी कायम है।
(अहमदाबाद आकार से साभार)
(लीलाधर
मंडलोई की कुछ अन्य नन्हीं कविताएँ)
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