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लीलाधर
मंडलोई हिन्दी कविता के क्षेत्र में स्थापित कवि हैं। आपकी कविताओं
में एक विचित्र सी वैचारिक तरलता है जो काव्यतत्व को बरकरार रखती
हुई भाव लोक में आमन्त्रित करती है। संभवतः प्रकृति पुत्रहोने के
नाते उनका दुनिया को देखने का नजरिया बेहद अकृतिम है, जो उनकी
कविताओं में झलकता है।
प्रार्थना
फलो!
गरीब और कमजोर बच्चों के लिए
दखते ही बढ़ कर पक जाया करो
फलो!
जब तुम मँहगे बेचे जाओ तो सड़ जाया करो
छूते ही
और छूने न दिया जाये तो देखते ही।
अकेला
तारीखें भी तीस और आदमी अकेला
हफ्ते भी चार और आदमी अकेला
ऋतुएँ भी छै और आदमी अकेला
महीने भी बारह और आदमी अकेला
वर्ष भी अनेक और आदमी अकेला
काम भी बहुत से और आदमी अकेला!
तो
तो जब उसने कहा कि अब सोना नहीं मिलेगा
तो मुझे कोई फरक नहीं पड़ा
पर अगर कहता कि अब नमक नहीं मिलेगा
तो शायद मैं रो पड़ता।
से

बच्चा सोता है
हिलाने से
राजा जागता है।
हैसियत
उसने तीन चार प्यारे-प्यारे नामों से
मौत को पुकारा
मगर मौत नहीं आई
उसके बाद मौत ने जिन्दगी को
तीन चार प्यारे-प्यारे नामों से पुकारा
बस इतने में वहाँ हजारो लाशें बिछ चुकीं थीं।
(अहमदाबाद आकार से साभार) |