गिर्मी सेर्पा की कविताएँ
गिर्मी
सेर्पा नेपाली के श्रेष्ठतम कवियों में से एक हैं। यद्यपि आपका
रुझान कविता की ओर बाल्यकाल से था, किन्तु आपकी औपचारिक साहित्यिक
यात्रा सातवें दशक से शुरु हुई थी। अनुवाद कविता के भाव को कुछ
मन्दिम कर देता है फिर भी हम श्री बिर्ख खड़का डुबर्सेली के अनुवाद
के माध्यम से कविता के मूल रस को पकड़ने की कोशिश करेंगे और
देखेंगे कि सेर्पा किस तरह अपने समाज एवं आसपास पर पैनी निगाह रखते
हुए भावों को तीखी धार देते हैं।
मैं इस तरह बैठा हूँ
यह पूर्वजों का शाप है शायद
कि अभी मैं समुद्र के किनारे की चट्टान हूँ
लहरों पर लहरों के प्रहार में भी
एक अडिग चट्टान हूँ!
कहाँ -कहाँ पहुँचने और ढहाने की चाह रखती तरंगे
क्यों मुझे टुकड़े-टुकड़े कर डालती हैं
क्यों मेरा शाप नहीं धोती हैं?
इस समुद्र को देखते हुए बैठे
अब लम्बा युग बीत गए।
मुझे इस युग का शाप है शायद
लगता है मैं यह धर्म युद्ध हार गया हूँ
मेरे स्वप्न के युग का आना बाकी है, कहते हैं
मेरे शाप की मियाद बढ़ गई है, कहते हैं
समुद्री तूफान और आँधी मेरे लिए कुछ नहीं है
यहाँ से निकलने वाली आग की ज्वाला
तुम जैसे के लिए, जो श्राप में नहीं पड़ा है
बड़ी जबरदस्त चुनौती है।
इस उजाले में देखो
इस आग की ज्वाला को पकड़कर देखों
अभी तो मुझ पर शाप का प्रभाव नहीं है
पूर्वजों का शाप
युग के शाप से प्रभावहीन घटना बन कर रह गई है
धर्मयुद्ध में, मेरी हार में
मुझे धो रही हैं ये शमित और श्लघ तरंगे
मैं उसी तरह बैठा हूँ
मैं उसी तरह सोच रहा हूँ।
मेरी इच्छा
मेरी इच्छा है-तुम हँस दो
मेरी आकांक्षा है- तुम खुश रहो
तुम्हारी खुशी में
मैं स्वयं खुश हो जाता था।
स्वयं से सम्मोहित हो जाता था।
शायद यह मेरा अपराध था
मेरी इच्छा के प्रतिकूल स्वप्न था
व्यर्थ ही मोहित होना-कुछ भी ना होना था
यह मेरी आसक्ति थी-यह अक्षम्य अपराध था।
तुम पत्थर की मूर्ती हो
ठण्डापन तुम्हारी जिन्दगी है
मृत्यु ही तुम्हारी आकांक्षा
और तुम्हारी प्रसन्नता
मेरी आकांक्षा और अभिलाषा को
कभी न समझ पाने की चाह है तुम्हारी
तुम्हारे ठण्डे हाथों के स्पर्श के बाद
मैंने समझा-तुम मुझे अपनी मौत का
सौगात दे रही हो।
मेरी मृत्यु की कामना करों तुम
मैं खुश हो जाऊंगा!
तुम पत्थर बन कर बची रहो
मैं यो ही विलीन हो जाऊँगा!
आओ भानू, हम जरा शहर घूम आएँ
आओ भानू, हम जरा शहर घूम आएँ
यह देखो, अनोखा शहर है यह
साल भर लोग ऊँघते रहते हैं यहाँ
साल भर खो जाते हैं लोग यहाँ
मैंने सुना था
कुम्भकरण छह महीने सोता था
महानिद्रा में बेसुध
छह महीने सोता था।
यह महा कुम्भकरणका शहर है
यहाँ लोग साल भर सोते हैं
कुछ पलों के लिए जागे तो फिर
सो जाते हैं।
कभी-कभी बड़बड़ाते हैं नीन्द में
कभी-कभी बोला करते हैं
बच्चों का खेल खेलते हैं
"डमी" लड़ाई लड़ते हैं
स्मृति लोप होते ही सब कुछ भूल जाते हैं
छोड़ दो सब कुछ ,थोड़े समय के लिए भानु
देखो इस शहर के पेड़- पौधे, झाड़-जंगाल और
हवा,सभी खिलखिला कर हँस रहे हैं
उछल कूद खुशी मना रहे हैं
नदी-नाले, पहाड़-कन्दरा
सुनो ये गा रहे हैं नई धुने
ध्वनि प्रतिध्वनि गूंज में
देखो हमारे ये कान्तिपुरी और बालाज्यू कैसे
हरे-भरे और खुशहाल हैं
कितने मन-भावन हैं।

ये लोग सो रहे हैं तो क्या
यह युग सो गया तो भी क्या?
इस प्रकृति की सुन्दरता अविराम अथाह है
और अनायास ही
कभी नये पल्लव कभी पुष्प गुच्छ
कभी थाल में फल लिए
तुम्हारा स्वागत कर रहे हैं!
हर पल जनमते रहे, प्रकृति के गीत गाते रहो!
दूसरों की चिन्ता किए बिना
खुद को खुश बनाते रहे!
इस शहर का सन्नाटा क्या चीज है?
तुम्हारे अपने भी तो कई साथी हैं
उनकी सुन्दरता देखने वाली तुम्हारी अपनी आँखे हैं।
बेचारे ये लोग
ये सोए लोग
कैसे देख पाएँगे यह सुन्दरता?
यह हमारा शहर है, यह सुन्दर शहर, कैसे समझेंगे?
आओ भानु, यह शहरही ऐसा है
आदमी को लील जाना इसकी प्रकृति है।
चुम्बन करें हम?
यह तेरा हिस्सा है
क्यों कह देते हो बस एक टुकड़ा मुझे
घेरा लगाकर सुन्दर बनाने पर भी
यह मुझे कतई पसन्द नहीं
उस घेरे के भीतर
वह घर
उसके भीतर भी कमरे-अन्दर-कमरे
उन कमरों के अन्दर भी अपने-अपने
स्तर और स्थान हैं।
कैसा आश्चर्य!
कैसी चाह
कैसी प्रथा है यहाँ की?
तुम उस छोटे से घेरे के भीतर बैठकर
छोटी सी छड़ी घुमा रहे हो!
उससे किसी किसी को
मारते हो तो भी
उससे दर्द नहीं होता है
पीड़ा के स्वर नहीं निकलते हैं
कोई प्रतिवाद का नारा नहीं लगाता है।
उस छड़ी का डर
किसी दण्ड से दण्डित होने का डर
मुझे नहीं है!
मैं चाहते हूँ तोड़ दूँ तुम्हारे घेरे को
तोड़ दूँ तुम्हारे घर की दीवारों को
तुमने जो हिस्सा मेरे लिए छोड़ा है
मेरे लिए बहुत ही छोटा हो गया है।
तुम्हे मैं निमन्त्रण देता हूँ
वह आकाश
यह महासागर देखने के लिए
ये ही मेरी पूंजी हैं
इन्हे याद करने भर से भी
सुख की साँस लेता हूँ।
वज्र जैसे स्वर में चिल्लाओ
उसमें प्रतिशोध नहीं है
तुम्हें देखते ही
मुझमें दया जागती है
तुम्हे प्यार का चुम्बन दूँ, ऐसा लगता है।
हाँ चुम्बन ही
यह चुम्बन लेने के लिए भी
आकाश जैंसा वक्ष होना चाहिए।
अचानक बाहों में लेकर खुश होने के लिए भी
हिम्मत होनी चाहिए।
तुम यदि मान लेते हो तो
मैं कहूँगा-
फैंक दो तुम अपनी छड़ी
आवाज किये बिना ही चिल्लाने की चेष्टा करों।
स घर के बाहर
तुम्हे मैं लेकर जाऊँगा
किसी के कदम ना पड़े हों-ऐसी जमीन
मैं तुम्हे दिखाऊँगा।
शायद तुम डर जाओगे
यह सोचकर कि वहाँ शिकार में नहीं फँसे हिंस्र जानवर
आएंगे शिकार से बाज
तुम बन्दूक पकड़ना चाहोगे
छिः
क्यों ऐसी बातें करते हो?
मुझे तो लगता है
तुम सपने में बोल रहे हो
लगता है बेसुरे
और बेहोश हो गए हो तुम
तम पर दया आती है
इस जमीन पर पाँव रखो तो सही
स्वागत होगा तुम्हारा
यहाँ से अपनी जमीन पर
नजर तो घुमाओ
कितनी संकीर्ण है
कितनी तुच्छ है
जिस पर घमण्ड कर छड़ी घुमाते हो
अपने को वज्र कहते गरजने की कोशिश करते हो
तुम्हारे गर्जन में गूंज नहीं आवाज नहीं
सोये हुए लोगों को जगाने की क्षमता नहीं।
आओ!
मैं तुम्हारा चुम्बन लूंगा
अपना रसपूर्ण आसमान
तुम्हें दूंगा
अपनी क्षितिज की रेखाएँ
तुम्हे दे दूँगा
तुम्हारे बीजक की रेखाएँ
मेरी मृत्यु की रेखओं सी लगती हैं
किसी षडयन्त्र के तहत
मुझे कोई जाल में फँसाने की कोशिश कर रहा है।
वह घेरा
उसके भीतर का वह घर
उस घर के भीतर कमरे ही कमरे हैं
मत बाध्य करों मुझे
चिथड़ा कर देने वाले यंत्र के भीतर रहने को।
कभी-कभी एक क्षण सोचने पर
तुम, वह घर-
जिसमें दरवाजे नहीं हैं
जिसमें खिड़कियाँ नहीं है
कैसे खुश रहोगे छड़ी घुमाकर
तुम खुश नहीं हो
खुश होने का स्वांग करने वाले हिप्पोक्रेट है
तुम्हारी याद आने पर
मेरी साँस रुक सी जाती है
अजीब सी कसक होती है
तुम निकलों
वहाँ से, जल्द से जल्द
तोड़ दो लोहे के घेरे को
यहाँ आओ
मैं तुम्हे बाहों में लूँगा
तुम्हे सहलाऊँगा
तुम्हे सिखाऊंगा, चुम्बन करना।
( साभार साहित्य
अकादमी )