
कृत्या प्रकाशन की पुस्तकें
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कृत्या
2008 अन्तर्राष्ट्रीय
काव्योत्सव के लिए देखिए
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विदेश से आने वाले कवियों की भी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इस बार
अनेक भाषाओं की भागीदारी होगी। इसबार हमें मैंक्सिको, इतली,
फ्रांसिसी, जरमन आदि भाषाओं के साथी उजबेकिस्तान और इस्टोनियन जैसी
सांस्कृतिक दृष्टि से समृद्ध भाषाओं की कविता का आस्वादन लेने का
मौका मिलेगा। साथ ही सूफी संगीत, और पंजाब के लोक कलाओं का आनन्द
भी लिया जा सकेगा। कविता के साथ एक चित्र प्रदर्शनी भी आयोजित की
जा रही है जो " क" नामक सांस्कृतिक एवं वैचारिक पत्रिका के
तत्वाधान में विशिष्ट रूप से युवा कलाकारों द्वारा आयोजित की
जाएगी। इस तरह एक सम्पूर्ण उत्सव की तैयारी की गई है।
हमें विश्वास है कि काव्य प्रेमियों को उच्च स्तर की कविता का
आस्वादन मिलेगा।
कृत्या स्वैच्छिक संस्था है, जिसके पास मात्र मनोबल है, धनबल नहीं।
रति सक्सेना
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शहर के जीवन को
काट रहा हूँ दुधारी तलवार से-
एक ओर खून
दूसरी ओं मवाद रिस रहा है।
क्या कहें इसे?
एक जंगली चीज?
जो सोचना नहीं जानती-
या
सब कुछ जानने वाला
आधुनिक निस्पन्द जीवन विधान ?
के शिवा रेड्डी
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उन्होंने देखी है
मेरी कागद पर लिखी
केवल जगमगाती बहार
नहीं देखी
बीज से फूल तक की
चुनौतियों भरी रात
सुखविन्दर अमृत
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मुंह अंधेरे एक दिन पिता ने जगाकर कहा
उठो हल की मूठ संभालो
सुबह साधना का शुभ समय है जमीन की साधना
जमीन ही है सारी सृष्टि की अभ्यासस्थली
समीर तांती
ये कितने ही अनजाने चेहरे
जिन्हें हम देखते हैं रोज
कितनी ही बार उनके पास से गुजरते हैं
कभी साथ भी बैठ जाते हैं
नरेश अग्रवाल
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लड़कियां माँओं जैसे
मुक्कद्दर क्यूँ रखती हैं
तन सहारा और आँख समुन्दर क्यूँ रखती हैं
औरतें अपने दुख की विरासत किसकों देंगी
सन्दूकों में बन्द यह जेवर क्यूँ रखती हैं।
(इशरत आफरी)
स्त्री की मुक्ति क्या यूटोपिया है? या इसकी कोई वास्तविकता भी है।
औपनिवेशीक संसार में स्त्री की मुक्ति को लेकर कुछ चुप्पियाँ भी
हैं और कुछ उपेक्षा और उदासीनता के भाव भी हैं। गरीब, दलित,
अश्वेत, उत्पीड़ित एव् सताई गई स्त्रियों ने स्त्री मुक्ति आन्दोंलन
को आधुनिकता और विकास प्रक्रिया की उपज भर नहीं है। डा नामवर सिंह
ने स्त्री आन्दोलनों के सम्बन्ध में लिखा है कि "इन आन्दोलनों की
खास बात यह थी कि पुरुषों ने स्त्रियों के अधिकार के लिए लड़ाई लड़ी।
बाद में गांधी जी के असहयोग आन्दोलनों और मार्क्सवाद से प्रेरित
आन्दोलनों में स्त्रियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
डा. सेवाराम त्रिपाठी ....और »
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मुझे
इस युग का शाप है शायद
लगता है मैं यह धर्म युद्ध हार गया हूँ
मेरे स्वप्न के युग का आना बाकी है, कहते हैं
मेरे शाप की मियाद बढ़ गई है, कहते हैं
समुद्री तूफान और आँधी मेरे लिए कुछ नहीं है
यहाँ से निकलने वाली आग की ज्वाला
तुम जैसे के लिए, जो श्राप में नहीं पड़ा है
बड़ी जबरदस्त चुनौती है।
***
तुम पत्थर की मूर्ती हो
ठण्डापन तुम्हारी जिन्दगी है
मृत्यु ही तुम्हारी आकांक्षा
और तुम्हारी प्रसन्नता
मेरी आकांक्षा और अभिलाषा को
कभी न समझ पाने की चाह है तुम्हारी
तुम्हारे ठण्डे हाथों के स्पर्श के बाद
मैंने समझा-तुम मुझे अपनी मौत का
सौगात दे रही हो।
गिर्मी सेर्पा
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तड़प-तड़प कर
रात गुजारी
तरस-तरस मैं राह देखती़।
साईयाँ साईयाँ कूक रही मैं
गिन-गिन पल-पल इक-इक ।
भोर भये तुम आ गए सच,पर
भाग्य दासी के न्यारे,
चंचल रहे जो नयन रात भर,
वही मुंद गए सुबह सकारे।
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सांईया जी!
जिस जिस चीज पर नजर जमाऊँ
जिस जिसका प्यार मन लाऊँ,
तेरे बिन और कौन है
मोहित जिस पर हो पाऊँ?
अफसोस है उन अरमानों से
अपनी लगन लगाऊँ!
***
अपने अमित गुणों की खातिर
चाहे किसी प्यारे के सदके,
करों कृपा, कृपा के सागर।
उस जैंसी ही देख बड़ाइयाँ
तू अपना, तू अपना सांईयाँ।
भाई वीर
सिंह
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