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स्त्री अस्मिता और मुक्ति के कुछ यक्ष प्रश्न

डा. सेवाराम त्रिपाठी



"मैंने देखी है मौत, पाप और पंक की भी
मैं नहीं चाहती कोई स्त्री
बिखर जाये टुकड़ों में
उसे फांदना न पड़े इतने कंटीले तार
और सिर्फ अपनी मंजिल तक पहुँचने के लिए
किसी और औरत को लाँघना न पड़े यह गहन अरण्य
उसके पीछे न पड़ जाये कोई अरना भैंसा
न निकलना पड़े उसे किसी पुरुष की गुफा से लहुलुहान।"

स्त्री ने विकास के क्रम में अपनी स्वाधीनता ले क्रम में अपने को ठगा हुआ पाया है। उसके आगे बढ़ने की दिशा में लगातार अवरोध रहे हैं। वह जब भी अपनी पहचान बनाना चाहती है, आत्म सम्मान के साथ जीना चाहती है उसे सजा मिलती है। उसे पाप की खान, नरक का द्वार, माया ठगिनि आदि के नाम से चिन्हित किया जाता है। स्त्री और पुरुष के गैर बराबरी के इतने बड़े-बड़े मानक बने हैं कि उन मानकों की अनन्त ईकाइयों को तोड़ना उसके लिए बहुत आसान रास्ता नहीं है।

स्त्री विचार करने के कई कोण है। स्त्री पराधीनता की एक लम्बी शृंखला है। फ्रांस की राज्य क्रान्ति के पश्चात् समानता का जो मुद्दा आया था, वह स्त्री के लिए अभी भी मुद्दा ही है। स्वतंत्रता भी एक प्रश्न था़ स्त्री के लिए वह अभी भी बड़ा प्रश्न है। यह मृगमरिचिका ही है कि क्या वह मनुष्य है या केवल स्त्री। क्या स्त्री होना एक अपराध है? स्त्री चेतना के सिलसिले में उसके सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक पहलुओं के बारे में ऐसे अनन्त प्रश्न हैं।

सीमोन द बोउवार ने लिखा है कि " स्त्री और पुरुष की शारीरिक भिन्नता के कारण परम्परागत विभेद अर्थात् सामाजिक नैतिक पहचान में नारी को पुरुषों से कम या अन्य समझा जाना नारी की पराधीनता का मूल कारण है। नारी चेतना उसके विकास, स्वप्न और यथार्थ को लेकर कई तरह के सवाल उठते हैं। भारतीय सिद्धान्त के अनुसार स्त्री बचपन में पिता द्वारा, युवावस्था में पति द्वारा एवं वृद्धावस्था में पुत्र द्वारा रक्षित होती है। " जिमि स्वतन्त्र होई बिगरहि नारी" इसका अन्यतम उदाहरण है। स्वतन्त्रता उसके वैश्या बन जाने पर ही संभव है। स्त्री मुक्ति का एक रास्ता उसे धर्म की ओर ले जाता है। जिसे " मेटाफिसिकल सुसाइड भी कहते हैं। हमारी सामाजिक संरचना में इसके अनेक साक्ष्य हैं, देवदासी प्रथा स्त्री के साथ क्रूर मजाक नहीं तो क्या है?

विकास के इतने चरण पूरे करने के बावजूद हमारी सामाजिक व्यवस्था में भ्रूण हत्या धड़ल्ले से हो रही है। बहुओं को जलाया जाना कम नहीं हुआ है। एक जमाने में प्रचलित पर्दा प्रथा, जिसे मर्दों ने अपने अभिजात्य मनोविज्ञान का परिचय देने के उद्देश्य से जारी किया था, कालान्तरमें कोढ़ की खाज बन गया। स्त्रियों की अस्मिता और मुक्ति के लिए सभ्य और सुसंस्कृत पुरुषों द्वारा विभिन्न प्रकार के सुधार आन्दोलन चलाये जाते रहे हैं। लेकिन इस तरह के व्यापक कार्यक्रम भी स्त्री की स्थिति में कोई बहुत परिवर्तन का रास्ता नहीं खोल पाए। बींसवी सदी में स्त्री की परिस्थितियों में निरन्तर परिवर्तन होते दिखाई देते हैं। छिटपिट चलते नारी आन्दोलनों का कुछ प्रभाव दिखाई देता है। संचार माध्यमों और मीडिया ने भी स्त्री की छवि को बदलने की कोशिश की है। इससे स्त्रियों के दब्बूपने पर प्रभाव पड़ा है।

बौद्ध साहित्य में थेरी गाता नाम से जो रचनाएँ मिलती हैं, उनमें सामाजिक बन्धनों से अपनी मुक्ति और स्त्री पुरुष की समानता के कुछ प्रसंग हैं। एक थेरी सुमंगली कहती है कि वह अब घर के कामकाज और पति से मुक्त हो कर सुखपूर्वक चिन्तन-मनन कर सकती है। पश्चिम में "मेल फेमनिस्ट" जैसी पुस्तकें प्रकाशित हुईं। महादेवी वर्मा ने "शृंखला की कड़ियाँ" जैसी पुस्तक लिखी जिसमें पहली बार स्त्री मनोविज्ञान, स्त्री की देह, और उसके संवेगों को बहुत स्पष्टता और क्षमता के साथ उजागर करने का प्रयास किया है। मन्नू भण्डारी का "आपका बण्टी", चित्रा मुद्गल का "आँवा", ऊषा प्रियंवदा का " पचपन खम्भे लाल दीवारें", मैत्रैयी पुष्पा का "चाक", अल्मा कबूतरी, कस्तूरी कुण्डल बसै". कृष्णा सोबती का " रे लड़की" कुर्तुल एन हैदर का " तिरिया जनम झनि देय" प्रभा खेतान का "छिन्न मस्तका "आदि अनेक रचनाएँ स्त्री मन की परतें खोलतीं हैं।
स्त्रियाँ स्त्री प्रश्नों से भी ऊपर उठ रही हैं। मेधा पाटकर ने नर्मदा आन्दोंलन चलाया, जिसकी धमक लगातार सुनी जा रही है। प्रसिद्ध लेखिका अरुन्धति राय ने इस आन्दोंलन में अहम भूमिका निभाई। अब स्त्री परिधि से निकल आई है, वह अपने लिए एक दुनिया की खोज शुरु कर चुकी है। स्त्री अब देह भर नहीं रही है, उसके हृदय में प्यास है।

लड़कियां माँओं जैसे मुक्कद्दर क्यूँ रखती हैं
तन सहारा और आँख समुन्दर क्यूँ रखती हैं
औरतें अपने दुख की विरासत किसकों देंगी
सन्दूकों में बन्द यह जेवर क्यूँ रखती हैं।
(इशरत आफरी)

स्त्री की मुक्ति क्या यूटोपिया है? या इसकी कोई वास्तविकता भी है। औपनिवेशीक संसार में स्त्री की मुक्ति को लेकर कुछ चुप्पियाँ भी हैं और कुछ उपेक्षा और उदासीनता के भाव भी हैं। गरीब, दलित, अश्वेत, उत्पीड़ित एव् सताई गई स्त्रियों ने स्त्री मुक्ति आन्दोंलन को आधुनिकता और विकास प्रक्रिया की उपज भर नहीं है। डा नामवर सिंह ने स्त्री आन्दोलनों के सम्बन्ध में लिखा है कि "इन आन्दोलनों की खास बात यह थी कि पुरुषों ने स्त्रियों के अधिकार के लिए लड़ाई लड़ी। बाद में गांधी जी के असहयोग आन्दोलनों और मार्क्सवाद से प्रेरित आन्दोलनों में स्त्रियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। फिल्मों और मीडिया में जिस तरह से स्त्री को प्रस्तुत किया जा रहा है और मुक्त स्त्री के रूप में उसकी छद्म छवि प्रस्तुत की जा रही है, परिवार इसके खिलाफ है। " ( आउटलुक - सितम्बर, 2003) उन्होंने एक और मुद्दे पर हमारा ध्यान आकृष्ट किया है। " मैं मानता हूँ कि औरत ही पुरुष को मुक्त कर सकती है पर ऐसा वह उसमें भय पैदा करके नहीं कर सकती । स्त्री आज आक्रमक मुद्रा में है। उसके लिए नए रास्ते खुल रहे हैं। सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक जीवन में उसकी भागीदारी बढ़ रही है। शायद इसीलिए उसे अधिक संयमित होने की जरूरत है। ( सितम्बर-2003)

नारी ने अपने देह के इस्तेमाल का अधिकार अब अपने हाथ में ले लिया है तो पुरुष वर्ग ने औपनिवेशिक जकड़न के साधनों में परिवर्तन कर लिए हैं। अब रणनीति बदल गई है। यौनिक मुक्ति के क्षेत्र में पुरुष ने पूंजीवादी सम्पत्ति के अपने नियमों और विश्व बाजार की तलाश की है जिसके अन्तर्गत सौन्दर्य प्रतियोगितायें, विज्ञापनों में स्त्री शरीर का खुल्लम खुल्ला प्रयोग और उसका प्रदर्शन आदि पुरुषों द्वारा अन्वेषित किया गया एक खेल और उपभोक्ता बाजार ही है जिसे स्त्रियों ने फैशन परस्ती समझा और नारीवादी स्वतंत्रता का शास्त्र समझा।

स्त्री अस्मिता के प्रश्न अनेक हैं। बाजार का जो नया शास्त्र और रिश्तों के टूट-फूट का जो व्याकरण आया है उसने स्त्री की पारम्परिक छवि को एक नये रूप में रचा है। स्त्रियों के भीतर प्रतिरोध की आवाज शनैः शनैः तेज होती जा रही है। यहआवाज स्त्री की दशा और प्रगति के मार्ग में नये आयाम प्रस्तुत कर रही है। स्त्रियों में अभिव्यक्ति के खतरे उठाने का जज्बा बढ़ा है।

" इन बन्द कमरों में मेरी सांस घुट जाती है।
खिड़कियाँ खोलता हूँ तो जहरीली हवा आती है।

बन्द कमरों में स्त्री की सांस का घुटना और खिड़की खोलने पर जहरीली हवाओं की आवाजाही को रोके बगैर स्त्री की मुक्ति का सपना पूरा नहीं होगा। अभी स्त्री को एक लम्बी लड़ाई अपनी पहचान और मुक्ति के लिए अनिवार्यतः करनी होगी। मुक्ति का यह रास्ता न तो आसान है, और न छोटा।

(अक्षर पर्व से, साभार (संक्षिप्त))


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