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के
शिवा रेड्डी की तेलुगु कविता
शहर के जीवन को
शहर के जीवन को
काट रहा हूँ दुधारी तलवार से-
एक ओर खून
दूसरी ओं मवाद रिस रहा है।
क्या कहें इसे?
एक जंगली चीज?
जो सोचना नहीं जानती-
या
सब कुछ जानने वाला
आधुनिक निस्पन्द जीवन विधान ?
शरीर के दो टुकड़े कर
बेचने वाली हाट कहें-
जहाँ पति पत्नी अजनबियों से बैठे हों
वैसा बस स्टाप कहें-
अपनी ही उंगलियाँ काट
टमाटर सूप में खाए जाने वाले नवीन सन्दर्भ कहें-
जादू के खेल में
शरीर के तीन टुकड़े कर
सबको दिखा
फिर जोड़ ना पाने का
असहाय साहस का व्यर्थ प्रयत्न कहें-
हर दो व्यक्तियों के बीच एक समुद्र
हर व्यक्ति के अन्दर
उसे दो टुकड़ों में काटने वाली आरी
इसकी तुलना करनी होगी
असंभव असंबद्ध प्रतिमा से।
कान पर खुंसा अधजला
बीड़ी का टुकड़ा जिन्दा है
फसल काटते वक्त कटी उंगली पर
लिपटा गीला कपड़ा जिंदा है
कमर पर गोबर की टोकरी टिकाए
मवेशियों के साथ फिरती
पेररेड्डी की रत्मम्मा जिन्दा है
पर सवाल यह है कि इन बेजान रास्तों पर चलें तो चलें कैसे-
क्षितिज तक फैले
इन आक्रोशों के रेगिस्तानों में सफर करें तो कहाँ तक-
काट कर सुखाई गई मछली भी तो नहीं है
रात जो चट्टानें गिरती है
उनके नीचे आए बिना जिएँ कैसे-
शहरी जीवन के अंधेरे गर्भ में
कौन किसे पहचानता है
हर कोई अपने इर्द गिर्द ही चक्कर लगा रहा है
इस उपद्रव से भरे जलते गोले पर तुम नहीं हो
तुम्हारी परछाई भी सच नहीं है
झूठी बातों को सच समझने वाली इस पगली दुनियामें
शहरी जीवन को काटने पर टुकड़ों में से
एक होगा बीता कल
और एक होगा वर्तमान जो बीत रहा है
शहरी जिन्दगी में चाँद नहीं होता है उदित
करीब खींच
ठोडी पर उंगली रख
प्रेम से अपलक देखने वाला कौन है?
एक तरह खून, दूसरी तरफ मवाद रिसती
इस लाश को
कौन ढ़ो सकता है कंधे पर?
शहरी जीवन को
दुधारी तलवार से काट रहा हूँ।
अनुवाद श्रीमती आर शान्ता सुन्दरी
(के
शिवा रेड्डी
की अन्य कविता)
नरेश
अग्रवाल की कविता
आवरण
अचानक
कोई जाग जाएगा
और देखेगा जो उसने खोया था
पा लिया है
और हर पायी हुई चीज को
रखना पड़ता है सुरक्षित अपने पास ही
और संचय पुराने होते जाते हैं
समय उन्हें ढकते चला जाता है
आवरण पर आवरण
और जीवन के आवरणों से ढकी हुई चीजों से
किसी बहुमूल्य को निकाल लेता हूं एक दिन
सारी सफाई के बाद एक उत्तम खनिज
जीवन के किस रस में ढालना है इसे
अब यह हमारी बारी है।
(नरेश
अग्रवाल की अन्य कविताएँ )
समीर तांती
की
असमिया कविता
महानगर में एक निंदित नागरिक
तीस साल पहले की बात है। फरवरी महीने की कोई एक शाम।
उसने पहले पहल कदम रखा था इस शहर के पथ पर।
क्या कोई पहचान पाया था उसे उस दिन
जान पाया था कि वह एक दिन कवि बनेगा
उसने भी तो नहीं सोचा था कि वह दरअसल एक असफल
प्रेमी, एक सिजोफ्रेनिक, एक निरर्थक अधिकारी
एक उदासीन पति, एक बेकार पिता
एक परनिर्भर मित्र, एक निंदित नागरिक है।
इससे किसे क्या फर्क पड़ता है
तीस साल का मतलब लंबा समय है। तीस सालों में पृथ्वी पर
कितनी घटनाएं घटती हैं। क्या इतने दिनों में वह कुछ कर पाया?
बेहिसाबी, बेहिसाबी...
एक सहकर्मी ने दूसरे से कहा।
देखा न घर नहीं, गाड़ी नहीं, जमीन नहीं, कर्ज पर कर्ज
फिर भी बेटे का घमंड कम नहीं हुआ।
अड्डे पर एक ने दूसरे से कहा।
इससे किसे क्या फर्क पड़ता है
कविता की ख्याति का मतलब ही जीवन की सुरक्षा नहीं है।
नगर की एक सुंदर महिला ने कहा
कवि होने पर भी वह एक कुली है। कुली मतलब बहिरागत।
तीस सालों की फसल। क्या हुआ क्या हुआ इतने दिनों के बाद
एक बार एक बुजुर्ग कवि ने एक युवा कवि से कहा
कुछ नहीं कुछ नहीं। सिर्फ साल दर साल का पशुश्रम
केवल बातें और बातें। अर्थहीन प्रलाप के अलावा यह सब और क्या है
एक रसिक ने दूसरे रसिक से कहा
इससे किसे क्या फर्क पड़ता है
वादा भूलने वाला, वक्त से न चलने वाला, नियम न जानने वाला यह दरअसल
है क्या?
(समीर तांती की अन्य कविताएँ )
सुरेश सेन निशान्त की कविता
बोझा उठाए पहाड़ से उतरती स्त्री
तुम्हारी पीठ पर बोझा है
पहाड़ भर का
पहाड़ भर के दुख हैं
तुम्हारी थकी पीठ पर
पहाड़ भर की चिन्ताएँ हैं
तुम्हारे चेहरे की झुर्रियों में।
पहाड़ भर की थकान है
तुम्हारे पस्त कदमों में।
बुझे हुए चूल्हे की राख सा
रह गया है तुम्हारी इच्छाओं का रंग
जले हुए जंगलों में
पागलों की तरह पता नहीं क्या
ढूंढ़ती हो हर रोज
अपने लिए हरे रंग सी
कभी न मिलने वाली वह खुशी।
तुम्हारे बेटों को
ले गए हैं बरगलाकर
शहर के खुशनुमा सपनें।
तुम्हारा मर्द
नशे की नदी में डूब कर
गालियाँ बकता
लौट रहा होगा लड़खड़ाते हुए कहीं।
तुम्हारी देह भरी पड़ी है
उसकी मार के नीले निशानों से
किसी भी पोथी में नहीं है दर्ज
तुम्हारे आँसुओं का कसैलापन
तुम्हारी कराहटों का हिसाब।
पहाड़ भर का आक्रोश है
तुम्हारे गुस्से में झरती उस गाली में
पहाड़ भर की भूख सजी है
तुम्हारी उस पीतल की थाली में।
तुम्हारी पीठ पर बोझा है
पहाड़ भर का।
पहाड़
भर के दुख हैं
तुम्हारी थकी पीठ पर
सूख रही नदियों का विलाप है
तुम्हारे गीतों में।
तुम्हारी सिसकियों में
तुम्हारा ही नहीं
तुम्हारी बेटियों का भी रोना है
(सुरेश
सेन निशान्त की अन्य कविता)
सुखविन्दर अमृत की पंजाबी
कविता
उन्होंने देखी है
मेरी कागद पर लिखी
केवल जगमगाती बहार
नहीं देखी
बीज से फूल तक की
चुनौतियों भरी रात
उन्होंने देखी है
मेरी कागद पर लिखी
सिर्फ रिमझिम करती बरसात
नहीं देखा
समुद्र के सीने से
बून्दों के कशीदे होने का दर्द
उन्होंने देखी है
मेरी कागद पर लिखी
सिर्फ जगमगाती रौशनी
नहीं देखा
जलती मोम का
तिल तिल पिघलता वजूद
अगर वे देख लेते
ये सब कुछ
जो उन्होंने नहीं देखा था
तो जान जाते
फूल, वर्षा और रौशनी का मौल!
(
सुखविन्दर अमृत की अन्य कविताएँ)
ईश्वर कृष्ण की कविता
शब्द
क्या लिखूँ
कोई शब्द तो हो
सार्थक नहीं
निरर्थक ही सही
अभी अभी मैंने
कुछ अनगढ़ शब्दों को
बहते देखा है
देखा है उन पर
बहते रक्त कणों को
छोटे छोटे शब्द
आपस में घुलते मिलते शब्द
न जाने कहाँ चले गए
कहाँ उड़ गए
देखो

कोई कीट पतंग सा
उड़ता हुआ शब्द
स्थिर होने की कोशिश में
मुझे भ्रमित करने वाला यह शब्द
रुकेगा नहीं
थमेगा नहीं
उड़ जायेगा
हमेशा की तरह
और
यह पृष्ठ भी
कोरा रह जाएगा
हमेशा की तरह
क्या लिखूँ
कोई शब्द तो हो.......
(ईश्वर कृष्ण की
अन्य कविताएँ)
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