कृत्या प्रकाशन की  पुस्तकें
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कृत्या २००८ में देश के जाने माने कवियों ने शिरकत की। कृत्या सभी कवियों की कविता को प्रिय कवि शीर्षक के अन्तर्गत प्रस्तुत करेंगे। कार्यक्रम की भागमभाग में हम किसी कवि की हिन्दी पाण्डुलिपि ना ले पाएँ है। इसलिए जो पाण्डुलिपि हामारे हाथ थीं हम उन्हीं से शुरुआत करना चाहते हैं।

विश्वनाथ प्रसाद तिवारी

प्रसिद्ध आलोचक, कवि और दस्तावेज जैसी दीर्घकालीन स्तरीय कविता पुस्तिका के सम्पादक। आपकी कविता सहज एवं जन मानस से जुड़ी हैं।

पुस्तकें

नही् , इस कमरे में नहीं
उधर
उस सीढ़ी के नीचे
उस गैरेज के कोने में ले जाओ
पुस्तकें
वहाँ, जहाँ नहीं अट सकती फ्रिज
जहाँ नहीं लग सकता आदम कद शीशा

बोरी में बाँध कर
चट्टी से ढँक कर
कुछ तख्ते के नीचे
कुछ फूटे गमले के ऊपर
रख दो पुस्तकें

ले जाओ इन्हें तक्षशिला- विक्रमशिला
या चाहे जहाँ
हमें उत्तराधिकार में नहीं चाहिए पुस्तकें
कोई झपटेगा पास बुक पर
कोई ढूँढ़ेंगा लाकर की चाभी
किसी की आँखों में चमकेंगे खेत
किसी के गड़े हुए सिक्के
हाय हाय, समय
बूढ़ी दादी सी उदास हो जाएंगी
पुस्तकें
पुस्तकों!
जहाँ भी रख दें वे
पड़ी रहना इंतजार में

आयेगा कोई न कोई
दिग्भ्रमित बालक जरूर
किसी शताब्दी में
अँधेरे में टटोलता अपनी राह

स्पर्श से पहचान लेना उसे
आहिस्ते आहिस्ते खोलना अपना हृदय
जिसमें सोया है अनन्त समय
और थका हुआ सत्य
दबा हुआ गुस्सा
और गूंगा प्यार
दुश्मनों के जासूस
पकड़ नहीं सके जिसे!

मृत्यु

मेरे जन्म के साथ ही हुआ था
उसका भी जन्म

मेरी ही काया में पुष्ट होते रहे
उसके भी अंग

मैं जीवन भर सँवारता रहा जिन्हे
और खुश होता रहा
कि ये मेरे रक्षक अस्त्र हैं
दरअसल वे उसी के हथियार थे
अजेय आजमाये हुए

मैं जानता था
कि सब कुछ जानता हूँ
मगर सच्चाई यह थी
कि मैं नहीं जानता था
कि कुछ नहीं जानता हूँ

मैं सोचता था फतह कर रहा हूँ किले पर किले
मगर जितना भी और जितना भी बढ़ता था
उसी के करीब और उसी दिशा में
वक्त निकल चुका था दूर
जब मुझे उसके षडयन्त्र का अनुभव हुआ

आखिरी बार
जब उससे बचने के लिए
मैं भाग रहा था
तेज और तेज
और अपनी समझ से
सुरक्षित पहुँच गया जहाँ
वहाँ वह मेरी प्रतीक्षा में
पहले से खड़ी थी
मेरी मृत्यु!

स्त्रीविहीन रेल का डिब्बा

क्या स्त्रियों ने बन्द कर दीं हैं यात्राएँ?

बाप रे, इतना लम्बा डिब्बा
और इतना मनहूस?

सौन्दर्य प्रतियोगिताओं में
या विज्ञापनों में

कोठों पर
तन्दूरों में
या श्मशानों में?

कैसे पहुँचेगी यह गाड़ी सही सलामत
स्त्री के बिना?


मैं ही हूँ

मैं ही हूँ प्रभु
और कौन हो सकता है

यह प्रकाश
यह अंधकार

यह महा प्रकृति
यह महाकाल

यह महा जाल
यह महा ज्वाल

इस अनन्त का भार
और कौन ढो सकता है।

कामनाएँ

दौड़ती रहें किरणें अनन्त पथ पर
गुजरते रहें प्रकाश वर्ष

फैलता रहे ब्रह्माण्ड
महाकाश महाकाल में
किलकती रहें नीहारिकाएँ
नहाते रहें ग्रह नक्षत्र
आकाश गंगाओं में

बहती रहें हवाएँ
बरसते रहें मेघ

पूरी हों, हों
न हों
प्रभु!
लहलहाती रहें कामनाएँ!
 


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