मैं कृत्या हूँ
कृत्या - मारक शब्द शक्ति,
कृत्या - जो केवल सच के साथ चलती हो,
कृत्या - जो पूरी तरह सही का साथ देती हो ।

कृत्या2008 ‍ विशेषांक
 

कृत्या प्रकाशन की  पुस्तकें
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चण्डीगड़ में कविता का झरना बहा उसने आज के कठिन समय में कविता को रेखांकित किया। आज जब जीवन मौलभाव में फँसता चला जा रहा है, सिक्के अक्षरों पर भारी पड़ रहे हैं, दिखावा सहजता का गला दबोच रहा है, और अपनी भाषाएँ अर्थ खो रही है तो कृत्या भारतीय भाषाओं को नहीं बल्कि अनेक विदेशी भाषाओं को एक मंच में खड़ा कर संवेदनाओं को जोड़ने का काम कर रही है। बस यही इस कार्यक्रम की सफलता है, और यही अक्षर की विजय।

इस अंक में मैं कुछ प्रतिभागी कवियों की कविताओं को ही दे पा रही हूँ, क्यों कि अनेक प्रमुख कविताएँ हमे प्राप्त नहीं हो पाईं। हमारी कोशिश रहेगी कि आगे के अंको में इस कमी की पूर्ति की जाए।

रति सक्सेना
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कविता केवल अक्षरों में ही नहीं होती है, वरन् कलाकार की तूलिका से निकली हर लकीर में, कैमरे की आँख से झाँकते हर दृष्य में और नर्तकी के घुंघुरुओं की छनक में भी कविता होती है। यही कारण है कि कृत्या उत्सव में कविता के साथ साथ अन्य कलाओं को भी रेखांकित किया जाता है। इस बार kritya 2008 के समानान्तर में एक चित्र प्रदर्शनी का आयोजन किया गया। इस प्रदर्शनी की रूपरेखा दो कलाकार युवकों ने बनाई जो कृत्या के अभिन्न अंग हैं- अमित एवं विजेन्द्र
इनके सहयोग से आरती वी कदम, Daniel Connell , दिव्या पाण्डे, कुलदीप सिंह, विजेन्द्र विज ,विशाल भरद्वाज, विजय कदम और योगेन्द्र कुमार पुरोहित ने अपनी अपनी कलाकृतियाँ प्रस्तुत की। कार्यक्रम के दौरान योगेन्द्र और डेनियल कलाकारों के रेखा चित्र भी बनाते रहे। यह प्रदर्शनी बेहद सफल रही ।

रति सक्सेना

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मेरी तरफ देखों
और तुम बारी- बारी से उनकी तरफ
देखती हो
और अपने दिनों को एक दूसरे वक्त की तरह
जी लेती हो
घण्टों में, मिनिटों में, पलों में
इसी तरह तुम धीरे धीरे
वक्त को मिटा देती हो।
Odveig Klyve
चले आओ मेरी कब्र तक
इस द्वीप के किनारे पर
तट के बेहद करीब
चले आना बहते पानी के साथ
मेरी सड़ती देह को उसी के मलहम से जोड़ते हुए
कोई फर्क नहीं, मैं जिन्दा हूँ
Triin Soomets
मेरा चेहरा टूट गया है, बहुत पहले
सदियों से मैं इसके बिना रह रही हूँ
रो भी नहीं पाई, क्यों मेरी
आँखे भी फूट गई हैं
दर्पण गूंगा हो गया है
और उसके शब्दों पर ताला जड़ गया
मेरा चेहरा चूर चूर हो गया
ब्रह्माण्ड हिल गया
चेहरा बिखर
गय
Hanane Aad

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आयेगा कोई न कोई
दिग्भ्रमित बालक जरूर
किसी शताब्दी में
अँधेरे में टटोलता अपनी राह

स्पर्श से पहचान लेना उसे
आहिस्ते आहिस्ते खोलना अपना हृदय
जिसमें सोया है अनन्त समय
और थका हुआ सत्य
दबा हुआ गुस्सा
और गूंगा प्यार
दुश्मनों के जासूस
पकड़ नहीं सके जिसे!

**

मेरे जन्म के साथ ही हुआ था
उसका भी जन्म

मेरी ही काया में पुष्ट होते रहे
उसके भी अंग

मैं जीवन भर सँवारता रहा जिन्हे
और खुश होता रहा
कि ये मेरे रक्षक अस्त्र हैं
दरअसल वे उसी के हथियार थे
अजेय आजमाये हुए

विश्वनाथ प्रसाद तिवारी
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पालघाट के लिए रवाना होती हूँ, 7 नवम्बर को पालघाट रेलवे स्टेशन पर जिस प्रेम से कुली मेरा सामान संभालता है, मुझे अपनी बात पर विश्वास होने लगता है। उसका बिल्ला नम्बर 11 है वह बताता है, और मुझे बड़े आदर से कहता है -- अम्मा , आप जब भी पालघाट आओ, बस मुझे खोजना, मैं ही आपका सामान उठाऊंगा।
*
पालघाट से में अग्निशेखर को फोन लगाती हूँ, वे व्यस्त हैं, जानती हूँ लेकिन उनमें बेहद शक्ति है, और कृत्या के जन्म से ही मित्र है। वे नहीं मिलते हैं.. क्षमा फोन उठाती हैं... कई बाते होती हैं...वे इस बात पर एतराज दिखाती है कि मैंने अग्नि शेखर के नाम के आगे कश्मीरी भाषा का कवि लिखा है, मैंने पिछली बार के किसी कवि को नहीं रखा है आदि आदि...

आठ की रात को पातर जी का फोन आता है, वे सख्ती से डाँटते हुए कहते हैं कि मैंने उनका नाम कविता पाठ में रख दिया है और मुख्य पृष्ठ पर पंजाब आर्ट काउंसिल का logo नहीं लगाया है...

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 अंक- IV/ PART VII

(नवम्बर - 2008 )

संपादक :  रति सक्सेना


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