कृत्या प्रकाशन की  पुस्तकें
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पंजाब से लौटे हुए एक सप्ताह बीत गया किन्तु नवम्बर के गुलाबी की खुनक देह में, और कविता की गन्ध मन में अभी तक बसी है। कृत्या 2008 के सफल आयोजन के बाद उसके प्रभाव से निकलना मेरे लिए ही नहीं, कृत्या की युवा टीम के लिए कठिन हो रहा है।
इतना आसान नहीं था, बिल्कुल नई जगह, नए लोगों के बीच काम करना, वह भी आज के कूटनीति भरे माहौल में, फिर भी सब उतना ही अच्छा हुआ जितना कि हम चाह रहे थे। कृत्या उत्सव की तैयारी काफी पहले से शुरु हो गई थी। विजेन्द्र ने कला का क्षेत्र संभाल लिया था, हरफन मौला अमित हर किसी काम में दखल दे रहा था, शलभा दूर बैठी वाउचर, बजट आदि का काम देख रही थी और मैं हड़बड़ाती हुई फोन से सम्पर्क साधने का काम कर रही थी। चण्डीगड़ पहुँचने से काफी पहले से ही लगने लगा था कि काम आसान नहीं होगा। कृत्या के दो बुजुर्ग ट्रस्टी अस्वस्थ थे, मित्रों मे सभी लोग किसी ना किसी मुसीबत से घिरे थे। पंजाब से आने वाली सूचनाएँ पूर्णतया सकारात्मक नहीं थी। किन्तु जब मैं अकेली सामान लाद कर तीन दिन की यात्रा पूरी करके 9 नवम्बर को दिल्ली पहुँची तो चण्डीगड़ अमित साथ चलने को तैयार था. विजेन्द्र भी अपने हिस्से का काफी कुछ काम कर चुका था। मैं और अमित जब चण्डीगड़ पहुँचे तब पता चला कि इतने बड़े कार्यक्रम की किसी को भनक तक नहीं है। पता नहीं स्थानीय नीति थी, या फिर हर चीज को आराम से लेने की आदत। पंजाब आर्ट काउंसिल के पदाधिकारी शादी ब्याह में शिरकत करने गए थे, पातर जी व्यस्त थे। लेकिन तभी चण्डीगड़ के अनजाने मित्रों ने सहायता की। सुखदेव जी पहली सहायता के रूप में कृपाल नामक युवक को लेकर आए़ , सत्यपाल सहगल ने अपने कार्यक्रम के दौरान कृत्या उत्सव की घोषणा करने की सलाह दी। हमे महसूस हुआ कि जिस कार्यक्रम के लिए हम महिनों से तैयारी कर रहे थे, चण्डीगड़ उसके लिए तैयार तक नहीं था। जिस तरह का प्रचार- प्रसार होना था, उसकी भनक तक नहीं थी। स्थानीय मनमुटाव और आपसी रंजिश भी मन को विचलित कर रही थी, किन्तु फिर भी खुशी इस बात की थी कि अनेक लोग हमारी सहायता के लिए आने लगे। दस, ग्यारह और बारह को अमित , कृपाल और मैं भूत की तरह कृत्या के प्रचार में लगे गए, कालेजों में जाकर पोस्टर बाँटना, लोगों से फोन पर सम्पर्क साधना और जो लोग समय से पहले आ रहे थे, उनकों लाने का इंतजाम करना। 13 को हमारा सारा ध्यान अतिथियों को सही सलामती से होटलों में पहुँचाने का था, और जैसा कि हम आशा कर रहे थे, यह काम आसान नहीं था। कृत्या की टीम का काम करने का तरीका अलग है, हम सब स्वयं सेवकों जैसे काम करने में विश्वास करते हैं। लेकिन पंजाब आर्ट काउंसल सरकारी संस्था होने के कारण बैठकों और बातचीतों पर ज्यादा ध्यान देते थे। इसलिए कुछ समस्याएँ आई। लेकिन एक बार यह बात साढ हो गई कि हम दोनों को अपना अपना मोर्चा संभालना है तो काम आसान हो गया।

कवितोत्सव का शुभारंभ हुआ। पंजाब आर्ट काउंसिल ने पंजाब के कामर्स मिनिस्टर को अमन्त्रित किया था, उनकी अनुपस्थिति में हिन्दी के वरिष्ठ कवि कुँवर नारायण ने कवितोत्सव का शुभारंभ किया। और फिर तो एक के बाद एक खूबसूरत कविताओं का दौर शुरु हो गया एक के बाद एक कविता सत्र शुरु हुए। आरंभ हुआ वयोवृद्ध कवि रमाकान्त रथ कि प्रभावपूर्ण कविताओं से, उनकी कविताओं का अनुवाद वनिता जी ने पंजाबी में पढ़ा और अंग्रेजी अनुवादों को प्रोजेक्टर की सहायता से दिखाया गया। आपके उपरान्त वरिष्ठ पंजाबी धीर साहब की
बारी आई। जिनकी छोटी- छोटी मनभावक कविताओं के अनुवादों को अजमेर रोडे जी ने पंजाबी में पढ़ा। तत्पश्चात केकी दारुवाला जी की कविताएँ पढ़ी गई। दोपहर के खाने तक सभी लोग कविताओं से जुड़ चुके थे। इस तरह कृत्या उत्सव में एक बार कविता दौर शुरु हुआ तो नदी की मानिन्द चलता रहा। करी 60-70 कवियों ने अपनी कविताएँ पढ़ी। हमारे विदेशी प्रतिनिधि कवि थे - नोर्वे की Odveig Klyve , Kari Klyve Gulbrandsen , और Bjorn Gulbrandsen. इटली की - Elisa Biagini, मैक्सिकों से Araceli Mancilla Zayas, Natalia Toledo और ROCIO GONZALEZ , इस्टोनिया से -Margus Lattik और Triin Soomets, इसराइल से Naim Araidi, अमेरिका से -Deirdre O'Connor, इंगलैण्ड से Peter Waugh Joan और Anim-Addo आइरलैण्ड से John Siddique, आस्ट्रिया से Evelyn Holloway , लेबनान से - Hanane Aad और उजबेकिस्तान से Uktamkhon Kholdorova. कनाडा से अजमेर रोडे, इंगलैण्ड से Mazhar Tirmizi , दुबाई से पूर्णिमा वर्मन । इस तरह हमें विदेश की विविध विविध भाषाओं की कविता का स्वाद मिला । इन कवियों की कविताओं को पंजाबी में अनुदित करने की भी पूरी की गई।भारतीय भाषाओं से भी नामी गिरामी कवियों ने हमारे कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई। प्रमुख नाम हैं- रमाकान्त रथ (उड़ीसा),कुंवर नारायण जी (हिन्दी), नन्द किशोर आचार्य (हिन्दी), सचिदानन्दन (मलयालम), केकि दारुवाला( अंग्रेजी) , उदय नारायण सिंह (मैथिली), . सुरजीत पातर(पंजाबी), चन्द्र प्रकाश देवल (राजस्थानी), दिलीप झावेरी, (गुजराती), ममंग दई (अरुणाचल प्रदेश), जीबन नाराह( असम), रोनिन एस Ngangom( मणिपुरी ) विश्वनाथ प्रसाद सिंह तिवारी (हिन्दी), शम्भु बादल (हिन्दी), अजमेर रोडे (पंजाबी- कनाडा), एस एस नूर (पंजाबी), श्री किक्केरि नारायण। इसके अतिरिक्त अनेक कवियों ने कवियों को open forum भी मंच दिया जाएगा। कविता पर चर्चा गोष्ठी का भी आयोजन किया गया।
पंजाब के नामी गिरामी कवियों के पाठ भी किया। कवि सम्मेलन के समानान्तर में चित्रकला प्रदर्शनी का आयोजन हुआ जिसमे युवा कलाकारों की पेन्टिंग प्रदर्शित की गईं। इन युवाओं ने पंजाब आर्ट काउंसिल का कोना कोना सजा दिया, और कविता पाठ के दौरान कई युवा कलाकार रेखाचित्र बनाते रहे।

चण्डीगड़ में कविता का झरना बहा उसने आज के कठिन समय में कविता को रेखांकित किया। आज जब जीवन मौलभाव में फँसता चला जा रहा है, सिक्के अक्षरों पर भारी पड़ रहे हैं, दिखावा सहजता का गला दबोच रहा है, और अपनी भाषाएँ अर्थ खो रही है तो कृत्या भारतीय भाषाओं को नहीं बल्कि अनेक विदेशी भाषाओं को एक मंच में खड़ा कर संवेदनाओं को जोड़ने का काम कर रही है। बस यही इस कार्यक्रम की सफलता है, और यही अक्षर की विजय।

इस अंक में मैं कुछ प्रतिभागी कवियों की कविताओं को ही दे पा रही हूँ, क्यों कि अनेक प्रमुख कविताएँ हमे प्राप्त नहीं हो पाईं। हमारी कोशिश रहेगी कि आगे के अंको में इस कमी की पूर्ति की जाए।

शुभकामना सहित

रति सक्सेना

पत्र-संपादक के नाम                                                   
 


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