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कृत्या 2008 --  कविता का समय

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पिछले वर्ष जुलाई के महिने की बात है।

Kritya2007 अभी- अभी बीता है, मन व तन दोनो ही थके हैं। चन्द्रकान्त देवताले जी का फोन आता है.. रति जी कार्यक्रम तो ठीक था, पर और अच्छा बनाया जा सकता था। आपकों मालूम है मैंने कितने कार्यक्रम आयोजित किए है। इस बार आप हम लोगों को अपनी टीम में रखिए, फिर देखिए कितना बड़ा कार्यक्रम होगा। छोटी-छोटी बातों पर ध्यान देना जरूरी है, जैसे कि चाय के साथ बिस्कुट होने चाहिए आदि। मैं कहना चाहती हूँ कि ये धन की बाते हैं, कृत्या के पास पैसा होता तो नन्हीं बारीकियों पर ध्यान दिया जा सकता था। खैर मुझे इस बात की खुशी हुई कि लोग अगले कार्यक्रम के बारे में सोच रहे हैं।

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देवताले जी प्रेमचन्द गाँधी आदि का नाम देते हैं, मैं उन लोगों से बातें कर रही हूँ, लेकिन लगता है कि वे समझ नहीं पा रहे हैं। देवल जी से बाते होती हैं, वे समझ रहे हैं किन्तु थोड़ा झिझक भी रहे हैं। आयोजन बड़ा है, वे समझते है, अन्ततः पातर जी से बात करके पंजाब में kritya2008 आयोजित करवाने का आश्वासन देते हैं।

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पातर जी व्यस्त है, पर सकारात्मक जवाब देते हैं, अन्त में वे अप्रेल के अन्तिम सप्ताह में मिलने का आश्वासन देते हैं। हम लोग यानी कि मैं , कृत्या के सैकेट्री मेत्तरु साहिब और उनकी पत्नी दिल्ली होते हुए चण्डीगढ़ का कार्यक्रम बनाते हैं। चण्डीगढ़ में हुई बैठक में सब कुछ अच्छा ही है। वे लोग बड़े- बड़े आश्वासन देते हैं- इधर ICCR से विनोद जी भी आश्वासन दे चुके हैं कि कम से कम दो लाख का अनुदान दिलवा देंगे। ONGC से भी अनुदान आदि का आश्वासन मिला। लेकिन मेरे मन में कुछ खटक रहा है, क्यों कि मैं सोच रही हूँ कि कृत्या में हर काम इतनी आसानी से तो होता नहीं, फिर यह कैसे .....

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साहित्य अकादमी 6 कवियों को भेजने का आश्वासन देती है। CILL इतना कर देने का आश्वासन देती है, जिससे भारतीय कवियों का खर्चा निकल जाए...अच्छा लगा

लेकिन ना आर्ट काउंसिल से संवाद हो पा रहा है, ना ही पातर जी से। मैं घबराने लगी हूँ.

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मैं फिर चण्डीगड़ और दिल्ली की यात्रा पर चलती हूँ, इस बार अकेली हूँ। लेकिन दिल्ली में विजय शंकर और अमित मिलते हैं. हम तीनों पंजाब आर्ट काउंसिल में ही ठहरते हैं। मुझे सरकारी तन्त्र का अन्दाज लगता है कृत्या स्वतन्त्र है, इसलिए काम तीव्रता से करना चाहती है। लेकिन यहाँ दो दिन रहने पर मुझे लगने लगता है कि काम आसान नहीं होगा, मैं काफी निराश हूँ, कृत्या उत्सव की खबर सब जगह जा चुकी है, और इस ढीलेपन से हम कैसे काम कर पाएंगे,समझ नहीं पाती

दिल्ली आने पर दूसरे झटके लगते हैं। ICCR में नई अफसर आ गई हैं, और वे कृत्या की प्रार्थना को पूरी तरह से खारिज कर देती हैं।
ONGC ने भी झटका दे दिया है। आर्थिक दृष्टि से कृत्या ओंधे मुँह नीचे पड़ी है। अमित कहता है- रति जी, घबराइए नहीं, हम लोग हैं ना।

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मैं लौटते ही तीव्रता से जगह- जगह प्रार्थनाएँ भेजती हूँ, आर्थिक सहायता के लिए। असंख्य लोगों से बात करती हूँ। हर जगह अंधेरा है, लोग बातें तो खूब करते हैं, पर हल कुछ नहीं निकलता।

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पातर जी को बार- बार फोन कर रही हूँ पंजाबी अनुवाद के लिए.. पंजाब आर्ट काउंसिल में होटल बुक नहीं हुए हैं.... मैं घबराने लगी हूँ....

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 किसके लिए इतनी मानसिक और शारीरिक तकलीफ उठा रही हूँ? मै अपन- आप से सवाल कर रही हूँ...मेरा सवाल अनुत्तरित है , हमेशा की तरह........


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समय निकट आ गया है, मेरे पास बस दो सहायता हैं, साहित्य अकादमी और CIIL, Mysore से कवियों के टिकटों का बन्दोबस्त।


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प्रमुख ट्रस्टियों में से बालकृष्ण पिल्लै जी बीमार हैं, मेत्तरु जी बेहद व्यस्त। अकेले पड़ने लगी हूँ..

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पंजाब से लोगों के फोन आने लगते हैं,...अरे आप ने किसके साथ काम करने की बात सोची? ... वे कुछ नहीं कर सकते आदि... मैं घबरा कर कई लोगो को फोन करती हूँ , वरिष्ठ साहित्यकार गुरुदयाल जी से बाते होती हैं, स्थानीय साहित्यिक राजनीति नया नया जिन्न है, जो मेरी कृत्या की बोतल से निकला है...

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मेरा दम घुट रहा है...मेरी आँखो के सामने अंधेरा छाने लगा है...

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मैं आक्रमण मुद्रा मे आ जाती हूँ, फुफकारने लगती हूँ पंजाब आर्ट काउंसिल पर, पातर जी पर...


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पंजाब आर्ट काउंसिल के सचिव राजपाल कहते हैं, कि आप हमारे अलावा किसी से बात नहीं करेंगी, खर्चा हम कर रहे हैं,

नहीं , मैं बात मानने से इंकार कर देती हूँ...कृत्या स्वतन्त्र है... वह किसी के दवाब में नहीं आएगी।

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विजय जी, जो बेहद रुचि दिखा रहे थे, साथ छोड़ देते हैं, उनका कहना था कि उनकी तबियत ठीक नहीं है। डूबते जहाज से हर कोई उतरना चाहता है...

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अमित और विजेन्द्र जुटे पड़े हैं, वे उत्साहित हैं.. मुझे लगता है कि जहाज डूबेगा नहीं... मैं कप्तान की सीट पर फिर से आ जाती हूँ।

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मेत्तरु साहिब नहीं आएँगे, वे कृत्या के सकेट्री है और ना आने की वजह भी नहीं बताते। मेरे घर की मरम्मत चल रही है, मैंने अपने कामों की वजह से घर को कभी नहीं नकारा, मैं मजदूरों के साथ जुटी हूँ, मन दुखी है। मेरे आँखो से आँसू टपकने लगते हैं....

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शलभा फोन पर कहती है, माँ ! यह हमारी गलती है कि हम आप का साथ नहीं दे पा रहे हैं, आप हम लोगों के लिए जिन्दगी भर करती रहीं, अब हमारी बारी है कि आपके सपनों का ध्यान रखने की, चिन्ता मत करना मैं आपके साथ रहूँगी.... मुझे शक्ति मिलती है।


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मैं कवियों से उनके कार्यक्रम के बारे में सूचना लेती हूँ, कुँवर नारायण, केकि जी आदि सकारात्मक जवाब देते हैं । चन्द्रकान्त देवताले जी को  मैं शुरु से कृत्या के कार्यकलाप के बारे में सूचित करती आई हूँ, उन्हे मालूम है कि कृत्या को कहीं से पैसा नहीं मिला है।वे ट्रेन से आने के लिए तैयार थे। लेकिन इस बार कहते हैं कि उनकी तबियत खराब है, इसलिए यदि हम हवाई जहाज का किराया दे तभी वे आ सकते हैँ। कृत्या के पास तो जहर खाने का भी पैसा नहीं, मैं माफी माँग लेती हूँ..

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5 नवम्बर की रात को मैं अकेली कोषीकोष होती दिल्ली की ओर यात्रा आरंभ करती हूँ। कोषीकोष में पुस्तक मेला है, एक प्रोफेसर नम्बूदिरी मिलते हैं। वे मेरी होटल पहुँचने में सहायता करते हैं....मेरे मन में एक बात आती है कि कृत्या को सहायता मिलेगी, पर उसके चेहरे अलग -अलग होंगे..

पालघाट के लिए रवाना होती हूँ, 7 नवम्बर को

पालघाट रेलवे स्टेशन पर जिस प्रेम से कुली मेरा सामान संभालता है, मुझे अपनी बात पर विश्वास होने लगता है। उसका बिल्ला नम्बर 11 है वह बताता है, और मुझे बड़े आदर से कहता है -- अम्मा, आप जब भी पालघाट आओ, बस मुझे खोजना, मैं ही आपका सामान उठाऊंगा।

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पालघाट से में अग्निशेखर को फोन लगाती हूँ, वे व्यस्त हैं, जानती हूँ लेकिन उनमें बेहद शक्ति है, और कृत्या के जन्म से ही मित्र है। वे नहीं मिलते हैं.. क्षमा फोन उठाती हैं... कई बाते होती हैं...वे इस बात पर एतराज दिखाती है कि मैंने अग्नि शेखर के नाम के आगे कश्मीरी भाषा का कवि लिखा है, मैंने पिछली बार के किसी कवि को नहीं रखा है आदि आदि...

अग्नि से बात करने की कोशिश करती हूँ, वे बात नहीं करते....अग्नि नहीं आएंगे मैं समझ जाती हूँ

मंगलेश डबराल को किसी और मीटिंग में जाना है....
अरुण कमल पिछली बार की तरह आने का वायदा करते हैं... आएँगे नहीँ, उनकी बातों से लग जाता है।

 डूबते जहाज से सभी कोई उतरना चाहते हैं..

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आठ की रात को पातर जी का फोन आता है, वे सख्ती से डाँटते हुए कहते हैं कि मैंने उनका नाम कविता पाठ में रख दिया है और मुख्य पृष्ठ पर पंजाब आर्ट काउंसिल का logo नहीं लगाया है...वे कृत्या में नहीं आएंगे.ा kritya Festival का host Director ही ना आएगा? यह कैसा लगेगा?

मैं सचिदानन्दन और दिलीप झवेरी को फोन करती हूँ... आस- पास के यात्री मेरे चेहरे के रंग देखते है... मेरी पूरी रात जगते कटती है, थ्री टायर है,......लगता है कि कब्र में दबी पड़ी हूँ...दूसरे दिन बगल की सीट वाली महिला कहती है‍‍ .. आप क्यों इतना कष्ट उठाती हैं, आपके बच्चे मना नहीं करते? मुझे शलभा की बात याद आ जाती है... माँ हमे आप पर गर्व है..
मैं उस महिला से ...शायद अपने आप से कहती हूँ ...नहीं मेरे बच्चे मुझ पर गर्व करते हैं...

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9 नवम्बर को दिल्ली आ गई है, अमित स्टेशन पहुँच चुका है, अखिल जी भी प्रिटिंग का सामान लेकर आ गए हैं, किन्तु विजेन्द्र कार्ड रखना भूल गया है, मैं अमित को विजेन्द्र के घर दौड़ाती हूँ..हमे शाम को 5 बजे की ट्रेन पकड़नी है, और तीन बज चुके है...

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गाड़ी लग गई है अमित का पता नहीं... लेकिन मैं कुछ सोच नहीं पाती हूँ, दीमाग सुन्न हो गया है। किसी आपरेशन से पहले सुन्न करने की दवा दे दी गई हो जैसे..

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अमित दिखा, हम दोनों सामान उठा कर भागने लगते हैं... हमारा डिब्बा सबसे आगे है, हमारे पास बहुत ज्यादा  सामान है। डिब्बे में जाकर अनजाने लोगों के पास सामान टिका कर फिर लौट आते हैं, फिर भागते हैं...मैं हल्का  सामान उठा रही हूँ, असली बोझा तो अमित के हाथ में है। गाड़ी चलने से पहले हम दोनों सीट पर बैठ चुके है...


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हम दोनों बेहद भूखे हैं, दोनों ने सुबह से कुछ नहीं खाया है। समोसा और सेण्डविच देखते ही हम टूट पड़ते है, मैं अमित को काफी कुछ बाते बताती हूँ। पातर जी के फोन के बारे में भी..वह पूछता है कि क्या करना है, मैं कहती हूँ कि अब हम बस अगले क्षण के बारे में सोचेंगे... बस

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मैं दीपक मनमोहन जी को फोन लगाती हूँ , गैस्ट हाउस में कमरे के बारे में... पता लगता है कि कमरा बुक हो गया है। सत्यपाल भी दूसरे गैस्ट हाउस एक कमरा बुक करने की बात करते हैं।

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हम लोग स्वतन्त्र रहना चाहते हैं, इसलिए पंजाब आर्ट काउंसिल ना जाकर गैस्ट हाउस जाते हैं, इस बार अमित पैसा बचाने के लिए आटों में सामान भरता है।

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मैं कई लोगों से फोन पे बात करती हूँ, देश निर्मोही ने बड़े वायदे किए थे, पैसे के साथ- साथ चीफ मिनिस्टर के साथ खाने के भी... पर वे गायब है. सत्यपाल जी कहते है कि इतने बड़े कार्यक्रम की चण्डीगड़ में कोई सूचना तक नहीं है। सुखदेव सुबह एक बच्चे को लाते हैं.. यह है कृपाल, दुबला- पतला कमजोर सा युवक, जिसकी गर्दन हल्की सी झुकी है। यह आपकी मदद करेगा मैडम... कह कर वे चले गए...

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अमित खुश है उसे साथी मिला, मै भी बेहतर महसूस कर रही हूँ। वे दोनों कार्डस पर पते लिख कर पोस्ट करने जाते है...यह काम आर्ट काउंसिल को करना चाहिए था, हमने चण्डीगड़ और पंजाब में करीब 400 कार्डस भेजे थे, किन्तु सब की यही शिकायत थी कि कार्डस नहीं मिले

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गैस्ट हाउस में हिन्दी का सेमीनार चल रहा है, मैं इसलिए बैठी हूँ कि लोगों को kritya2008 festival के बारे में बता सकूँ। पंजाब आर्ट काउंसिल के सचिव शादी में गए, क्लर्क अनिल शर्मा का बातचीत का लहजा बेहद अजीब था। हम तीनों होटल देखने गए, जिस जगह हम विदेशी मेहमान रखना चाह रहे थे, वह केवल दो दिन के लिए बुक किया गया था। हमे साधारण होटल में विदेशी कवियों को रखने की कोशिश करनी पड़ी। हमने अनिल के माध्यम से फ्लैक्स पोस्टर बनवाने के लिए दिए..थोड़ी देर बार अनिल ने बताया कि राजपाल साहिब ने पोस्टर रुकवा दिए... मुझे बेहद गुस्सा आया...

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दिलीप जी ने कहा था कि हमे चण्डीगड़ से लुधियाना जाकर पातर जी को मनाना चाहिए, पर  मुझे लगा कि इस वक्त इंतजाम करना ज्यादा जरूरी है। 10 नवम्बर बीत गया। वह कमजोर सा दिखने वाला नौजवान बेहद मजबूत लगा। रात को जब वह जाने लगा तो मैंने उससे कहा कि कल से तुम हमारे साथ ही रहो, हमे सम्बल मिलेगा।


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ग्यारह नवम्बर को सुबह सवेरे मैंने फोन करना शुरु किया और कालेजों में जाकर लोगों से मिलने का कार्यक्रम बनाया। दिन भर के लिए एक आटों कर लिया। हमने अभी एक दो कालेज के चक्क्रर लगाए थे कि पंजाब आर्ट काउंसिल से फोन आया, मैडम , तुरन्त आइये... मुझे गुस्सा आ रहा था कि उन्होंने काम तो कुछ नहीं किया पर सम्मन इस तरह से भेजते हैं जैसे कि ...
अमित ने कहा .. रति जी जाइये, हम दूसरे कालेजों का चक्कर लगाते हैं... पंजाब आर्ट काउंसिल में नाहर सिंह थे, जो इस तरह पूछताछ करने लगे मानो पुलिस हो... यह साहित्य अकादमी का नाम कार्ड में, Cill का या...मेहमानों की लिस्ट कहाँ है आदि
मैंने कहा कि आप मेरे गैस्ट हाउस आइये... मैं पूरी जानकारी देती हूँ.. पर उनके पास वक्त नहीं था...जब मैं वापिस लौटी तो कालेज बन्द हो चुके थे...
रात को सत्यपाल जी ने कहा.. आपके पास बस एक दिन है.. आप जितना प्रचार कर सकती हैं,करिए...अब कृपाल और अमित अपनी तरह से काम कर रहे थे...मैं तो बस सम्पर्क साध रही थी।

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रात हो गई, मैंने सुखपाल जी को प्रेस कान्फ्रेंस के बारे में याद दिलवाया तो वे साहिब सिंह को लेकर आए... साहिब सिंह के हाथ में चोट थी, वे बोले कि यदि दो दिन के लिए टैक्सी मिल जाए तो वे मेहनत कर प्रेस रिलीज करवा देंगे...इसी बीच पंजाब आर्ट काउंसिल से फोन आया.. आपने बड़े साहब को प्रेस कान्फ्रेंस में आमन्त्रित किया क्या...

मुझे गुस्सा आया... मैंने कहा ..देखिए मैं चण्डीगड़ में आकर काव्योत्सव इसलिए नहीं कर रही हूँ कि मैं अपने अतिथियों को रोटी नहीं दे सकती, मैं तो यह सोच कर आई हूँ कि पंजाब में कविता का माहौल बने

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रात को कृपाल हमारे सथ रह गया, अमित को ना जाने क्या सूझी, उसने अपनी पत्नी से नौकझौंक से लेकर छोटे- छोटे घरेलू किस्से कहने शुरु कर दिए, हम लोग रात के बारह बजे ठहाका मार कर हँसने लगे। ...
शायद यही कारण था कि दूसरे दिन हमारे चेहरे चमक रहे थे।

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दूसरे दिन डेनियल आ गया,अमित और कृपाल के सामने ढ़ेर से काम थे... उजबेक से लड़कियाँ आ गईं थी... उन्हे अमृतसर से बुलवाना था...कृपाल के घर से कार लाना था...मैं प्रेस क्लब में गई तो नूर साहिब और दीपक जी थे... डेनियल भी था।

हम प्रेस रिलीज के लिए ग्यारह तारीख को 2 बजे तक मैं प्रैस कान्फ्रेस में रहे, शाम जब मैं अपने कम्प्यूटर पर प्रेस के लिए नोट तैयार कर रही थी, पंजाब आर्ट काउंसिल के सचिव जी का बुलावा आया... अब तक अमित कृपाल के घर से उसकी कार ले आया था। हम वहाँ पहुँचे तो वे छोटी -छोटी डिटेल के बारे में सोच रहे थे। उन्होंने कहा कि रति जी मेहमानों को रिसीव करवाने का काम आप संभालिए... हम नहीं कर पाएँगे...
तभी मुझे याद आया कि मार्गस और ट्रिनिन स्टेशन पर होंगे... मैं तुरन्त अमित के साथ भागी, उन्हें स्टेशन पर छोड़ कर आई तो विजेन्द्र आ गया था. हम लोगों ने अगले दिन के लिए लिस्ट बनाई.. तभी सत्यपाल जी ने फोन किया... मैंने उनसे प्रार्थना की वे दूसरे दो छात्रों को भेज दे....

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पातर जी का पता नहीं था..टैक्सियाँ समय पर नहीं आ रही थी.... सत्यपाल जी ने  छात्र भेज दिए थे, उन्हे समझा कर  कवियों को बुलाने के लिए भेज दिया.... बच्चे नए थे....उन्हें काम समझने में देर लगती है

अभी तक यह भी मालूम नहीं था कि कौन सी कविताएँ  पढ़ी जाएँगी...

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अमित अब कलाकारों के साथ था.. वहाँ भी उसकी जरूरत थी...

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प्रदीप आ गए, किसी एयरोनाटिक्स की मीटिंग में भाग लेने, उन्हे देखते ही मुझे संबल बनता है। वे कहते हैं कि दो दिन के लिए उनके पास टैक्सी है.. और मुझे  जो जरूरत है, वे हैल्प करेगे.

5 बजे याद आया कि जोन का प्लेन आने वाला है, टैक्सियों का पता ही नहीं... तभी पातर जी आए, तो मैं पातर जी की टैक्सी लेकर जोन के लेने भागी..तभी राजपाल जी का फोन आया‍‍‍ .. रति जी, मैं सुबह से बैठा हूँ, आपका पता ही नहीं... मैंने कहा कि मैं रोज तो आ रही हूँ आपके आफीस में, आप तो अब आएँ हैं चण्डीगड़, और अब अतिथियो का स्वागत करूं, या डफ्तरी ड्यूटि करूँ?.. ..जब मैं जान को लेकर लौटी तो शलभा आ चुकी थी, और पातर जी के साथ बैठी हुई दूसरे दिन दिखवाई जाने वाली कविताओं पर काम कर रही थी. मुझे लगा कि मेरा बोझ कम हो गया...

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पंजाब आर्ट काउंसिल में राजपाल आगबबूला बैठे थे... एक बार फिर बात बिगड़ते बिगड़ते रह गई... वे बिफरे तो मैं भी बिफर गई... वे उद्घाटन समारोह के बारे में वही करने जा रहे जो मैं नहीं चाहती थी, यानी कि मंच पर अधिकारियों की भीड़... पर अब मैंने धारा के विरुद्ध लड़ने की जगह अपने को धारा  पर खुला छोड़ दिया था...

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वहाँ से निकल कर मैं अतिथियों का स्वागत करने अलग -अलग होटलों में जाने लगी, सचिदानन्दन और पातर जी साथ थे...और पातर जी के साथ सुखबिन्दर भी..... मैं और सुखबिन्दर आगे बैठे थे... हम भूल ही गए कि हमने बैल्ट नहीं लगाई है.. एक पुलिस का सिपाही चौराहे पर रोक लेता है...
ड्राइवर बेवकूफी में अपने मालिक को फोन कर देता है जो शायद पुलिस का बन्दा था... इससे पुलिस वाले बिफर जाते है..पातर जी मुझे बुलाने आते हैं...रति जी , आप आइए...मैं हाथ जोड़ कर पुलिस वाले से कहती हूं...देखिए मैं बाहर से आई हूँ, गल्ती हो गई आप फाइन ले लीजिए.. पर हमें छोड़ दीजिए... हमारा कल कार्यक्रम है.. वे आदर से कहते हैं.. मैडम जी, आप पढ़े लिखे है, पर यह ड्राइवर हमें पुलिस वाले की धमकी दे रहा है.. यह हम नहीं सहेंगे...लेकिन आप जाइए और काम कीजिए...

क्या क्या और करना पड़ेगा... मैं सोचती हूँ

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एवलिन खुश नहीं है, उसे होटल अच्छा नहीं लगा... बाकि सब खुश है... रमाकान्त रथ जी बच्चे सी भोलेपन के साथ स्वागत कर रहे हैं...
कुँवर नारायण, जी के बेटे अपू्र्वा कहते हैं... पापा कहीं नहीं जाते,पर ना जाने यहाँ आने को कैसे तैयार हो गए...

मैं भी नहीं जानती कि कृत्या में क्या शक्ति है जो मुझे नचा रही है...

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वापिस लौटती हूँ, शलभा काम में लगी है, अमित पंजाब आर्ट काउंसिल चला गया है, सुबह 4 बजे नन्द किशोर आचार्य जी आने वाले हैं, अमित कहता है कि वह संभाल लेगा।

फिर भी फोन कर लेना, मैं आ सकती हूँ..मैंने कहा...

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शलभा रात भर काम कर रही है, उसे आखिरी वक्त कविताएँ मिली । मैं खट पट में सोने की कोशिश करती हूँ, सुबह 4  बजे अमित का फोन आना है... रति जी गाड़ी स्टार्ट नहीं हो रही...मैंने कहा कि मैं अभी आती हूँ..
कृपाल देर रात सोया है,  मैं जगाती हूँ...बेटा उठ... मुझे अमित के पास छोड़ कर आ...विजेन्द्र के पास कार है, पर वह मोबाइल नहीं उठा रहा है..
मैं और कृपाल स्कूटर पर निकलते है, हवा तीखी लगती है तो मैं कृपाल से कहती हूँ कि किसी टैक्सी स्टैण्ड पर रोक कर टैक्सी लो, एक टैक्सी स्टैण्ड आता है, पर वहाँ कोई नहीं है। कृपाल मुझे छोड़ कर अमित को लेने चला जाता है, इसी बीच उसने किसी टैक्सी से भी बात कर ली है.। इस दुबले- पतले लड़के में कितनी शक्ति है.... सब लोग उसे संकट मोचन कहने लगे हैं.. हमेशा शान्त रहता है...

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आचार्य जी की गाड़ी लेट है, हम बच जाते है, उन्हे होटल में छोड़ कर मैं लौटती हूँ, शलभा फिर से कम्प्यूटर पर लगी है.

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14 की सुबह हो गई है

हम पंजाब आर्ट काउंसिल पहुँचते हैं, इतने सारे कवि, इतनी भाषाएँ, मैं भावविभोर हो उठती हूँ

पंजाब आर्ट काउंसिल ने वित्त मंन्त्री को उद्घाटन के लिए आमन्त्रित किया, उनका नामो निशान नहीं.... पंजाब आर्ट काउंसिल के सारे अफसर मंच पर जम गए है,
सच्चिदानन्दन दुखी हैं, उन्होंने पिछला कार्यक्रम देखा था, उसकी भव्यता के सामने वे इस गड़बड़ी को देख दुखी थे। केकी जी कहते है, रति जी, आप तो केरल में ही किया कीजिए अपना कार्यक्रम, वहाँ कला का सम्मान होता है।...

लेकिन काव्यपाठ शुरु होते ही सब ठीक हो जाते है... मैं बिल्कुल ध्यान नहीं दे रही हूँ लोग क्या चला रहे है, कौन सी मन्त्रणा हो रही है.. अब बस कृत्या है और कविता...बेहद अच्छे कवि हैं इस बार..
अब बस एक नदी बह रही है. कविता की, .. छोटी- मोटी नौकझौंक हो रही हैं, पर कोई शिकायत नहीं, क्यों कि पूरा चण्डीगड़ कृत्या के साथ है, हमारे कवियों और कलाकारों ने रंग जमा लिया है....

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कितने बड़े बड़े नाम है, रमाकान्त रथ, कुँवर नारायण, उदय प्रकाश, नन्दकिशोर आचार्य, विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, , सच्चिदानन्दन , मेहन्दी रत्ता जी, ये सब युवाओं के साथ घुल मिल कर खुश हैं, युवा सीख रहे हैं, पर बुजुर्ग भी आल्हादित हैं। रमाकान्त रथ जी बच्चे से भोलेपन के साथ कहते हैं- रति जी, मुझे एक बात का दुख है कि यहाँ आने से पहले मैं अपने को अच्छा कवि समझता था,किन्तु अब मुझे लगता है कि मैं इन सब के सामने कहीं भी नहीं हूँ। ...
क्या इससे बड़ा प्रमाण चाहिए मुझे कृत्या की सफलता के लिए..

मैं आल्हादित हूँ..

 


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आखिरी दिन हम सब नाच रहे हैं, खुशी के मारे... गले मिल रहे हैं...कृत्या ने अपना रंग जमा लिया है...कविता लोगों के सिर पर चढ़ कर बोल रही है.. इतनी अच्छी कविताएँ
कौन कहता है कि कविता का समय नहीं रहा...

 

 

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