ट्रिन की कविता Triin Soomets's Poems
 


Triin Soomets is graduated from Tartu University as an Estonian philologist and member of Estonian Writers? Union since 1999. She has 8 poetry books in he account her Poems have also been published in German, English, Dutch, French, Slovenian, Finnish, Galegian, Polish, Swedish, Portuguese, Russian, Hungarian, Albanian, Latvian, Romanian and Spanish The awards she got are - The most alive book, by cultural newspaper Sirp 2004, Juhan Liiv annual prize 2000 and was nominee of year award of Estonian poetry 2006, 2004
 

*
चले आओ मेरी कब्र तक
इस द्वीप के किनारे पर
तट के बेहद करीब
चले आना बहते पानी के साथ
मेरी सड़ती देह को उसी के मलहम से जोड़ते हुए
कोई फर्क नहीं, मैं जिन्दा हूँ
अपने हाथों को मेरी टाँगों में से निकाल लेना
अब ये मेरी नहीं हैं
मेरे हाथ मेरे सीने पर रखे हैं
अपने विचारों को मुझसे दूर ले जाना
नहीं तो मै फिर से जिन्दा हो जाऊँगी
और हम एक दूसरे को पा लेंगे
किसी भी सदी में , किसी भी गाँव में
इस काम को जल्द निपटाओं
फिर,पूरी उम्मीद है कि हम सदियों सफर कर लेंगे
किसी तरह के निर्णय से टकराने के डर के बिना
दर्पण के अलावा।
*
अब खेलने को क्या बचा है-
कुछ भी
सफेद जूते में
लाल वाइन
पश्चिमी हवा, जहाज का मलबा
नाविकों की फूली हुई लाशे
अंध, सुदृढ़ सम्बन्ध
समुद्र कब्रगाह में घुसपैठ कर रहा है
काले बालों वाले और युवा
भूलने को क्या बचा है
कुछ भी

*

अपने आप से
बेकार सम्बन्ध बनाए जा रहे हैं
और वे रहते हैं
क्षण छिपते हैं, बड़ी घटनाएँ
तुम्हारे चेहरे की लकीरों को गहरा बनाती हैं
किस तरह तुम अपने चेहरे को हथेलियों में छिपाते हो
किससे मुहब्बत करना शुरु करते हो
किससे रास्ता पूछते हो
क्या देखते हो
क्या महसूस करते हो
किस पर मरते हो
हर किसी के लिए अन्तिम सीमा होनी चाहिए
जिस तरह कि मौत का दिन।

*

मैं तुम्हे अपना दिल दे दूंगी , लेकिन मिल नहीं पा रहा है
कहीं भी, यहाँ तक कि बटर कप की सुन्ध में भी
मैंने खो दिया हे इसे, कहाँ पता नहीं
शायद बरसात में भीगी आँखों के साथ सुनहरे पेड़ के नीचे

मैं तुम्हे एक रात दे दूँगी, पर मिल नहीं पा रही
तारा जो कि दिन के अन्त की घोषणा करता है
सुबह तुम्हे हपने होंठों को मेरे होंठों पर रखना पड़ेगा
धूप भरे दिन में ले जाना होगा

मैं तुम्हे अपने आप को दे दूँगी, पर खोज नहीं पा रही हूँ
कहीं भी, यहाँ तक कि परचिन्ह रेत में खो गए
तुम्ह हवा को पकड़ना और अनसुनी परछाई का
हौले से पीछा करना पड़ेगा

 


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