मैं कृत्या हूँ
कृत्या - मारक शब्द शक्ति,
कृत्या - जो केवल सच के साथ चलती हो,
कृत्या - जो पूरी तरह सही का साथ देती हो ।

 
 

कृत्या प्रकाशन की  पुस्तकें
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युद्ध कह कर नहीं आते हैं, वे लुके- छिपे रहते हैं, काक्रोचों की तरह। किन्तु जब उनकी संख्या बढ़ जाती है तो वे दिन के उजालों में भी निकलने लगते हैं, कचरे के डिब्बे की जगह हमारी थाली पर उड़े चले आते है। युद्ध की उम्र काक्रोचों जैसी ही होती है, वे उन्हीं की तरह अमर होते हैं। झाड़ुओं से पिटने और जूतों से कुचले जाने के बावजूद वे सदियों सदियों तक जिन्दा रहते हैं। युद्ध भी आज की समस्या नहीं , मानव जाति के इतिहास का शायद ही कोई पन्ना होगा जो युद्ध की कहानी नहीं कहता हो।

यानि कि युद्ध से पूर्णतया निजाद पाना तो शायद संभव ही नहीं होगा, किन्तु उसके वार को कम किया जा सकता है। बिल्कुल उसी तरह, जिस तरह की काक्रोचो को खत्म करने की की कोशिश की जाती है। अंधेरों में उजाले भर कर , मन के कोनों से कचरों को निकाल कर. मानवता को कायम करने की कोशिश से।
उजाले की इस कोशिश में सभी का योगदान हो सकता है।

रति सक्सेना
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खून की गाँठ बन गई है इतिहास
ईश्वर आते हैं खसरा लेकर
और दरवाजे बन्द
खुदकुशी के लिए मजबूर औरत सी
है कथाएँ झरनों की
डेसमन्ड खारमाफ्लांग
*
इन पैसों से मौल लूँगा प्यार
मैं और प्यार
बहेंगे बयार में
फूलेंगे, फलेंगे, खुन भी टपकाएँगे
इस खून से रंगना नहीं अपना झण्डा।
चन्द्रकान्त मुड़ा सिंह
*
अपने स्वार्थहीन उद्देश्यों पर अपने माताओं और बच्चों की बलि चढ़ाते रहे
तो बलिदान के लिए कोई नहीं बचेगा
या फिर सभी प्रतीक्षारत बलिदानी
फूलों की पालकी पर चढ़ना चाहेंगे तो
कौन शासक होगा नए सवेरे का?"
राबिन डांङाम

*

मेरी आँखों में सूरज था
उज्जवल भविष्य के
सपने थे
लेकिन मेरे पाँवों में
पीछे छूट चुके
घर की बेड़ियाँ थीं
रिश्तों की आवाजे थीं
मेरे शहर की
छूट रही सीमाएँ थीं
मेरे पूर्वजों की आत्माएँ थीं
अमरजीत कौंके

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1.
सर्द धूप में सजे हैं दीप
अल्पनाओं पर
अतिथियों के समूह बिखरे हैं अलिंदों में
जैसे सजे हों कविताओं के गुलदस्ते
फूट रही हैं परिचय की कलियाँ
शुरू होने को है उत्सव
प्रतीक्षा का अंत होने को है

2.
शोभित है सभागार
जल उठा मंगल-दीप
स्वागत! स्वागत!!
पुष्पगुच्छों से अलंकृत वरिष्ठ जन
महक उठी है पहली कतार
कविता के अंतर्राष्ट्रीय सूर्य
चमक उठे हैं
एक ही छत के नीचे

3.
उमड़ी है कविताओं की सरिता
न... न... झरना है यह तो
हर पल बदलता अपने तेवर
झर... झर...
अभी यहाँ अभी वहाँ
देश और भाषाओं की परिधियाँ लाँघते
लो! उड़ने लगे करतलों के सीकर
रंग बदलते अप्रत्याशित प्रवाह
कौंधते स्वर
उमगते मन
कविता का उत्सव जारी है
पूर्णिमा वर्मन की रपट‍‍:-

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जी रही थी मैं अमिट कलंक में
फिर भी मन मेरा निर्मल रहा
एक महासागर था और वह मैं थी
और कोई नहीं

ओ तुम डरे हुए
शायद ही स्वयं तैर पाते तुम
यह तो मैं कोमल सुकुमार लहर की तरह
तुमको निकाल ले आयी किनारे तक

**

चुप बैठे हैं ज्वालामुखी,
राख गिर रही है उनके गह्वर में।
आराम फरमा रहे हैं दैत्य
कुकर्म कर लेने के बाद।

उल्लासहीन पड़ गई हैं उनकी सम्पतियाँ
और अधिक भारी लग रही हैं वे उनके कंधों को
बार बार प्रेतात्माएँ
प्रकट होती हैं उनकी रेतों में

**
किसमें थी इतनी शक्ति और विवेक?
कौन छीन ले गया मेरे गले की आवाज?
रो नहीं पाते उसके लिए
मेरे गले के स्याह जख्म।

बेल्ला अख्मादूलिना

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*
ब्रह्म पिता है कौन, माया की माता कौन,
खाता कौन पिता कौन, कहाँ वाकों घर है।
निर्गुन की जात कौन सगुन की गोत कौन
ज्योतिन का ज्योत कौन, कौन परात्पर है
सिद्धन का वेद कौन, योगियों का नाद कौन,
वेदन का भेद कौन शस्त्र क्या आधार है।।
कै निपट निरंजन गुरु का न जाना घर,
स्वर है कि नर या सूकर कूकर है।।

*
क्षेत्र गोत्र पुत्र पौत्र माता है न पिता कोई।
अहं खावे भक्ति पीवे न कोई वाको घर है।
अनंग है असंग है, अभंग है अरंग है।
सब घटव्यापक एक परात्पर है।
न काया है न माया है छाया है न आया गया,
नेती नेती वेद कहे वो तो तीर्थ ये रहै।
न पास है न दूर "निपट" हाजिर हजूर
असंग है अनंग है अभंग भरपूर है।
*

जागते नयन आप, सुनते श्रवण आप,
अखिलेश अलिप्त आप भोर भके सोई है।
पाप नहीं पुन्य कौन मुवे ना रोवे कोई
ऊँचनीच दुख नहीं, जागे सोवैं ठाईं है।।
दूर और नगीच पास ब्रह्म बीज सोई खास
आदि माया का बिलास, जग रचवाई है।

निपट निरंजन की वाणी

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VOL - IV/ PART VIII

(जनवरी-  2009)

संपादक :  रति सक्सेना


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