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इस बार उसने ना तो दरवाजा खटखटाया, और न ही आवाज दी, वह चारदीवारी के बाहर भी खड़ा नहीं दिखाई दिया। वह सीधा हमारे आँगन से होते हुए हमारे भीतरी कक्षों में चला आया। उसकी जुर्रत तो देखो कि हमेशा की तरह कुछ गरीब गुरुबों को मारने की जगह उसने उन लोंगों पर वार किया जो अपने को चींटियों की तरह कुचले जाने की कल्पना भी नहीं कर पाते हैं। वे दस थे, इधर दस हजार, या फिर दस लाख या फिर उससे भी ज्यादा। डरे वे भी थे, डरे हम भी थे। इस फिर ऐसा नहीं था कि कुछ पलों में ही किसी मीनार को धाराशाही कर दिया गया हो, इस बार तो हर काम धीरे- धीरे समझ बूझ कर किया गया। बस तभी हमने जाना कि युद्ध क्या होता है, हमारी फौज के जवान क्या क्या झेलते हैं, क्या होता है अपनी आँखों के सामने मौत का ताण्डव नाच....पूरे साठ घण्टे तक पूरा देश उस ताण्डव को देखता रहा, महसूसता रहा।

युद्ध कह कर नहीं आते हैं, वे लुके- छिपे रहते हैं, काक्रोचों की तरह। किन्तु जब उनकी संख्या बढ़ जाती है तो वे दिन के उजालों में भी निकलने लगते हैं, कचरे के डिब्बे की जगह हमारी थाली पर उड़े चले आते है। युद्ध की उम्र काक्रोचों जैसी ही होती है, वे उन्हीं की तरह अमर होते हैं। झाड़ुओं से पिटने और जूतों से कुचले जाने के बावजूद वे सदियों सदियों तक जिन्दा रहते हैं। युद्ध भी आज की समस्या नहीं , मानव जाति के इतिहास का शायद ही कोई पन्ना होगा जो युद्ध की कहानी नहीं कहता हो।

यानि कि युद्ध से पूर्णतया निजाद पाना तो शायद संभव ही नहीं होगा, किन्तु उसके वार को कम किया जा सकता है। बिल्कुल उसी तरह, जिस तरह की काक्रोचो को खत्म करने की की कोशिश की जाती है। अंधेरों में उजाले भर कर , मन के कोनों से कचरों को निकाल कर. मानवता को कायम करने की कोशिश से।
उजाले की इस कोशिश में सभी का योगदान हो सकता है। हर व्यक्ति अपनी अपनी तरह से काम कर सकता है, लेकिन कुछ लोगों का दायित्व ज्यादा होगा। और संभवतः उनमें कलाकारों का नाम सबसे ऊपर आना चाहिए। कलाकार, वे चाहे फिल्म से जुड़े हों या लेखन, चित्र या संगीत से, मानवता के इस काम में अच्छा योगदान दे सकते हैं। बस जरूरत है कि वे अपने अपने दड़बों से निकल कर सामूहिक अभियान करें, एक साथ एक दिशा की ओर बढ़ें.. एक सोच को रखें।

पिछले कृत्या के कवितोत्सव में मेरा जो अनुभव हुआ, वह बेहद कटु था। जिस तरह मैंने कवियों को गिरोहों में बँटा पाया... मुझे बेहद निराशा हुई...मुझे लगता नहीं कि कला की सबसे खूबसूरत विधा कविता से संबन्ध रखने वाले लोग बड़ी आसानी से अपने दड़बो से छूट पाएंगे, फिर भी आशा तो की जा सकती है, विशेष रूप से उस समय, जब हम समय के नए कोष्ठक में प्रवेश करने जा रहे हों...

इस अंक के चित्र विदेशी कवयित्री और चित्रकार Pat Hogan King द्वारा बनाएँ गएँ हैं, और रेखाचित्र हिन्दी के कवि चित्रकार राजेन्द्र नागदेव द्वारा बनाए गए है। इस अंक हमने खासी के तीन कवियों की कविताएँ ली हैं, जो हमारे विचार क्षेत्र को विस्तार देंगी, कोई सन्देह नहीं। प्रिय कवि के रूप रूसी कवियित्री बेल्ला अख्तादूलिना को पढ़ना निश्चित ही महत्वपूर्ण होगा।

नए वर्ष में हमारे भीतरी बाहरी अंधेरे दूर हों, इसी शुभकामना के साथ

रति सक्सेना


पत्र-संपादक के नाम                                                      
 


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