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 पूर्णिमा वर्मन की रपट‍‍:-

कृत्या-2008 काव्योत्सव- एक कविता रपट
(10 कविताएँ)


1.
सर्द धूप में सजे हैं दीप
अल्पनाओं पर
अतिथियों के समूह बिखरे हैं अलिंदों में
जैसे सजे हों कविताओं के गुलदस्ते
फूट रही हैं परिचय की कलियाँ
शुरू होने को है उत्सव
प्रतीक्षा का अंत होने को है

2.
शोभित है सभागार
जल उठा मंगल-दीप
स्वागत! स्वागत!!
पुष्पगुच्छों से अलंकृत वरिष्ठ जन
महक उठी है पहली कतार
कविता के अंतर्राष्ट्रीय सूर्य
चमक उठे हैं
एक ही छत के नीचे

3.
उमड़ी है कविताओं की सरिता
न... न... झरना है यह तो
हर पल बदलता अपने तेवर
झर... झर...
अभी यहाँ अभी वहाँ
देश और भाषाओं की परिधियाँ लाँघते
लो! उड़ने लगे करतलों के सीकर
रंग बदलते अप्रत्याशित प्रवाह
कौंधते स्वर
उमगते मन
कविता का उत्सव जारी है

4.
चाय के प्याले हैं
चुस्कियाँ हैं
सीढ़ियाँ हैं नीचे को उतरती
घाट पर गंगा है कलाकृतियों की
जीवन को कूँची में समेटती
कविता के रंग भरती
रंगों में डूबे हैं कवियों के समूह
कलाकार डूबे हैं कविता में
कला हर पल उकेर रही है
कविता
कैनवस पर

5.
देश है विदेश है
भोजन है और है बतकही
मुक्तांगन मंच की दीर्घाओं में बैठे हम
बिखरी है हरियाली
पत्तियों में झर रही कविता
तंदूर से उठा रहा धुआँ
पक रही कविता
गुलाब के फूलों में
गुन-गुन कर गा रही कविता

6.
नया शहर
सड़कें याद नहीं रहती
गुम जाता है कला भवन बार बार
बार बार ढूँढते हैं हम
रास्ते जबतक याद होते हैं
शहर छोड़ने का वक्त हो जाता है

7.
मटका चौक का कलश
निरंतर
कर रहा अभिषेक
काव्योत्सव का
राजतिलक होने को है

8.
सीमा नहीं है कविता की
शब्द और अर्थ के परे
अवतरित होती है ध्वनियों में, चलचित्रों में
मेह सी बरसती है
सूफ़ी संगीत में
सभागार तर

9.
फ़्लैश हैं चमकते हुए
नोटबुक में सरसराते हैं कलम
नेरियत्तु में मुद्रित हो रहे हस्ताक्षर
परिचय पत्र
जा रहे इस पार – उस पार
उत्सव बन रहा है
चिरस्मरणीय

10.
वापसी का समय
धन्यवाद! धन्यवाद!!
साथ के अंतिम पल
शहर की धुन को समेटते हम
थकान दिख जाती है यहाँ वहाँ
संतोष की आभा लिए
छूट रहा है शहर मित्र सा
हवा में तिरती है विदा
फिर मिलेंगे अगले साल

 


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