निपट
निरंजन की वाणी
महाराष्ट्र की नाथ परम्परा में निपट निरंजन का बड़ा नाम है, नाथ
कवियों की वाणी में सूफी कवियों के समान जीवन के प्रति विशिष्ट
दृष्टिकोण होता है जो बड़ी सहजता से मानव मन की बड़ी से बड़ी
गुत्थियों को खोलता है। निपट और निरंजन गुरु शिष्य थे, जिनका नाम
एक साथ लिया जाता है। एतिहासिक दृष्टि से निपट बाबा औरंगजेब के
समकालीन हैं। कहा जाता है कि औरंगजेब से उनका वार्तालाप हुआ था, और
सम्राट बाबा के विचारों से प्रभावित भी था। निपट बाबा की उपलब्ध
रचनाएँ इस प्रकार हैं, -
१. निपट निरंजन और आलमगीर का संवाद
२. निरंजन वजीर का संवाद
३. नसीहतनामा
४. फकीर चालीसा
५. बाबा के प्रति आलमगीर के उद्गार
६. अलीफनामा
७. उपदेशात्मक आध्यात्मिक बानी
यद्यपि काल गणना के अनुसार निपट बाबा रीतिकालीन है, किन्तु उनके
कवित्त में भक्तिकाल की परंपरा का पालन है। निपट बाबा की उक्तियाँ
आज भी हमे कुछ सोचने को मजबूर कर देती हैं। हम अगले कुछ अंकों में
निपट बाबा की उक्तियाँ देने की कोशिस करेंगे।
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ब्रह्म पिता है कौन, माया की माता कौन,
खाता कौन पिता कौन, कहाँ वाकों घर है।
निर्गुन की जात कौन सगुन की गोत कौन
ज्योतिन का ज्योत कौन, कौन परात्पर है ।।
सिद्धन का वेद कौन, योगियों का नाद कौन,
वेदन का भेद कौन शास्त्र क्या आधार है।।
कै निपट निरंजन गुरु का न जाना घर,
स्वर है कि नर या सूकर कूकर है।।
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क्षेत्र गोत्र पुत्र पौत्र माता है न पिता कोई।
अहं खावे भक्ति पीवे न कोई वाको घर है।
अनंग है असंग है, अभंग है अरंग है।
सब घटव्यापक एक परात्पर है।
न काया है न माया है छाया है न आया गया,
नेती नेती वेद कहे वो तो तीर्थ ये रहै।
न पास है न दूर "निपट" हाजिर हजूर
असंग है अनंग है अभंग भरपूर है।
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जागते नयन कौन, सुनते श्रवण कौन,
विनास का निवास कौन, भोर भके कौन है।
पाप कौन पुन्य कौन मुवे कौन रोवे कौन
ऊँच और नीच कौन, जागे सोवे कौन है
दूर औ नगीच कौन, ब्रह्म का बीज कौन
आया सो प्रथम कौन जीवत मरे कौन है।
निपट में बसे कौन, रूप में विचार कौन
एक में अनेक कौन अनेक में कौन है।
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जागते नयन आप, सुनते श्रवण आप,
अखिलेश अलिप्त आप भोर भके सोई है।
पाप नहीं पुन्य कौन मुवे ना रोवे कोई
ऊँचनीच दुख नहीं, जागे सोवैं ठाईं है।।
दूर और नगीच पास ब्रह्म बीज सोई खास
आदि माया का बिलास, जग रचवाई है।
निपट में बसे आप, सोहं विचार रूप,
एक में अनेक सोई अनेक में वो ही है़।।
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बैठा ऐसा बैठा नहीं खड़ा ऐसा खड़ा नहीं
गया ऐसा गया नहीं, आया ऐसा आया कौन?
करा ऐसा करा नहीं, तरा ऐसा तरा नहीं,
खाया ऐसा खाया नहीं पिया ऐसा पिया कौन?
देखा ऐसा देखा नहीं सुना ऐसा सुना नहीं,
जिया ऐसा जिया नहीं सोया ऐसा सोया कौन?
चला ऐसा चला नहीं निपट निपटा नहीं,
दिया ऐसा दिया नहीं, लिया ऐसा लिया कौन?
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ध्रुव जैसा बैठा नहिं, गरुड़ सा खड़ा नहीं,
नचीकेत सा गया नहीं सुक सा आया कौन?
राम जैसा करा नहीं,प्रल्हाद सा तरा नहीं,
भीम सा खाया नहीं,अगस्त सा पीया कौन?
भुंसुकी सा देखा नहीं, परिच्छीत सा सुना नहीं,
लोमेश सा जिया नहीं,कुंभकर्ण सा सोया कौन?
नारद सा चला नहीं निपट सा भूला नहीं,
बली जैसा दिया नहीं सुदामा सा लिया कौन?
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ये मेरे मन्दिर और ये मेरे महल मुल्क,
मेरे ये जहागिर मनसब खेती बाड़ी है।
ये मेरे सेवक गण दिन रात सेवा करे,
ये मेरी सेज की प्यारी सुन्दर सी ठाड़ी है।।
ये मेरे हाथी अंबारी दुनिया में मान भारी,
ये मेरे नाती गोती, पोती खिलाड़ी है
कहे "निपट निरंजन", सब मेरे मेरे कहे,
अंत के समय संग आवे नहीं काड़ी है।।
क्रमशः |
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