डेसमन्ड खारमाफ्लांग Desmond L. Kharmawphlang

यहाँ

यहाँ , बर्बादी बिछी है, शाप की तरह
नीला असमान, सफेद आसमान-
पेड़ों के ऊपर लिपटता खुलता है
उलझे चीथड़ों की तरह
और हवा पेट हिलाते हुए
अट्टाहास करती है फूलों के बीच

खून की गाँठ बन गई है इतिहास
ईश्वर आते हैं खसरा लेकर
और दरवाजे बन्द
खुदकुशी के लिए मजबूर औरत सी
है कथाएँ झरनों की

यहाँ, जहाँ मीठी है चावल की शराब
और लोग भूखे हैं।
बहुत गहरा है विलाप शायद
और बेहद ज्यादा दुखी चुप कराए जा चुके हैं।
मृत्यु का अट्टहास सभी ओर
मै अभी भी पारंगत नहीं हूँ भाषा में।

अंग्रजी से अनुदित:-तरुण भारतीय

(डेसमन्ड खारमाफ्लांग की अन्य कविताएँ)


चन्द्रकान्त मुड़ा सिंह

मैं


(मन्त्री और अग्रज कवि अनिल सरकार के लिए)

तुम गीत सुनना चाहते हो
मैं गा सकता हूँ
ठुमक ठमक नाच सकता हूँ
बस, पैसे मत माँगना
पैसों से मैं मोल लूँगा घोड़ा
घोड़ा और मैं, एक जोड़ी
कूदेंगे , नाचेंगे और कभी- कभी युद्ध में चले जाएंगे
जहाँ तुम्हारी गाड़ी नहीं जा सकती।

तुम पारखी हो कविता के
जो कि मैं लिख सकता हूँ, थोड़ा चक्त चाहिए
नायलोन की रस्सी से बाँध दूँगा शब्द
कोई नहीं कह सकता कि कविता का कोई माई- बाप नहीं।
किन्तु कविता छपाने के बहाने
कृपया पैसे मत माँगना।

इन पैसों से मौल लूँगा प्यार
मैं और प्यार
बहेंगे बयार में
फूलेंगे, फलेंगे, खून भी टपकाएँगे
इस खून से रंगना नहीं अपना झण्डा।

तुम हीरा सिंह को जगा सकते हो
मुझ पर दुखी होना है तो हो लो
किन्तु "पुर्णश्री त्रिपुरा" के लिए पैसे मत माँगना
इन पैसों से मौल लूँगा मृत्यु
मृत्यु में ही मेरी अपनी है
मैं हिडिम्बा का दूसरा पुत्र हूँ।

काकबराक से:-तरुण भारतीय

(चन्द्रकान्त मुड़ा सिंह की अन्य कविता)


राबिन डांङाम

क्रान्ति के बाद

जब ऊँघते रुरुयाते स्वरों में
क्रान्ति शुरु हुई तो
सभी जगह बलिदानी उग आए
वे हर जगह घूमते फिरते हैं, और खत्म करते हैं
उस सब को जन विरोधी है।
हर रात वे अपनी सवारी से
कुचलते जाते हैं सभी स्वप्नों और स्मृतियों को
एकाग्रता से
हम कृतज्ञ हैं
स्वतःस्फूर्त मंत्र मुग्धता और
स्वप्नों को अनुशासित करने के अनिवार्य पाठ के लिए
और अब हमारा आहार है यथार्थ ।
हर सुबह वे नए सवेरे की शिक्षा देने के लिए
दिवालोक को अनूदित करते हैं
इकहरे रंगों में,
हम कृतज्ञ हैं इस सभ्य चमत्कार के लिए
जिसे इस वर्गविहीन सवेरे में
एक बढ़िया से स्नान जैसे बाँट सकते हैं।
और हाँ, बलिदानियों ने सूर्य को गोली मार दी है
क्यों कि वह शोषक की तरह जल रहा था
और आकाश में टाँग दिया एक लाल तारा

क्रान्ति की इस उत्साहित प्रक्रिया में
मैंने एक दिन कहा:-"ब्रदर्स! अगर हम ऐसे ही
अपने स्वार्थहीन उद्देश्यों पर अपने माताओं और बच्चों की बलि चढ़ाते रहे
तो बलिदान के लिए कोई नहीं बचेगा
या फिर सभी प्रतीक्षारत बलिदानी
फूलों की पालकी पर चढ़ना चाहेंगे तो
कौन शासक होगा नए सवेरे का?"
मैंने कहा:- "ब्रदर्स क्रान्ति के समय मेरी
मेरी कविता में आ गई है शान्तिप्रियता
जो कि लोकोपयोगी नहीं है
लेकिन कृपया क्षमा करना
इस सठियाए आदमी को
जो ख्याति पाने के इन दिनों भी लिखता है
नीले आकाश के बारे में।"

अनुवाद:-तरुण भारतीय

(राबिन डांङाम की अन्य कविता)
 


राजेन्द्र नागदेव की कविता

पत्थर में बन्द आदमी

उसने बार बार कहा था मृत्यु के बाद मत बनाना मेरा बुत
मैं नहीं चाहता बहरा, गूँगा, निश्चल होना

मैं चाहता हूँ चलता रहूँ चलता रहूँ, बोलता रहूं , सुनता रहूँ
मेरी जिह्वा से उपजे शब्दों में
दुनिया भर के शब्दहीनों की बस्तियाँ हों

मेरे कानों में धरती के सबसे अधिक कुचले गए
घास के तिनके की कराह पहुँचे
और कुचल कर गुजरते बूटों की आवाज

मैं तमाम उत्पीड़ितों को
षडयन्त्र के चक्रव्यूह से निकालना चाहता हूँ
और आधे-अधूरे शरीरों में
स्पंदित रहना चाहता हूँ बैसाखी बन कर

अपने बयान में उसने और भी बहुत कुछ कहा था

लोगों की भीड़ लगी थी, कंधों पर झोले लटके थे
झोलों में छलनियाँ थीं
और सबके पास ठहरने के लिए समय बहुत कम
(उन्हें अन्य अधिक जरूरी काम करने थे)

उस आदमी को उन्होंने छाना
और जिसने, जितना जरूरी समझा
उसे अपने लिए उतना बचा लिया
जबकि,जरूरी तो वह पूरा का पूरा था

फिर उन्होंने तीन गज लम्बे एक गज चौड़े पत्थर को
इस तरह तोड़ा, काटा और घिसा कि वह आदमी बन गया
इस आदमी का चेहरा बिल्कुल उस आदमी जैसा था
इस आदमी के हाथ बिल्कुल उस आदमी जैसे थे

इस आदमी के पाँव बिल्कुल उस आदमी जैसे थे
इस आदमी के बाल बिल्कुल उस आदमी जैसे थे
आसमी को फिर सदियों तक के लिए खड़ा कर दिया गया

वह आदमी सबसे भव्य और ऊँचे स्तंभ पर खड़ा है
कहाँ अनमने भाव से केवल उसके पाँवों की उंगलियाँ छुई जाएँगीं
अथवा, दूर से उछाल कर फैंकी जाएंगी फूलमाला कंधों पर

बस इतना ही बचा है छना हुआ आदमी उस शहर में

उस आदमी की आत्मा कभी उस पत्थर के अन्दर
विश्राम की मुद्रा मे लेट नहीं सकती
(उसकी इच्छा को इस तरह पूरा किया गया)

आदमी को इतने ऊपर ले जाकर रख दिया गया है
कि, उसकी आवाज उतर कर नहीं कर पहुँचती किसी तक
(उसकी आवाजे मुश्किलें पैदा करती थीं)

उस आदमी को अनन्त काल तक बिना पलक झपकाए
इतनी ऊँचाईं से देखते रहने होंगे अब
शहर के समस्त काले कारोबार
लाख लाख प्राणों की अन्तहीन त्रासदियों से
गुजरना पड़ेगा पलप्रतिपल
मूक रह कर झेलने होंगे भ्रष्टतंत्र के तमाम दंश

और...
वह हिल भी नहीं सकेगा
न आवेश में, न आक्रोंश में, न पीड़ा में
न सहानुभूति में, न करुणा में।

(राजेन्द्र नागदेव की अन्य कविता)
 

अमरजीत कौंके

घर का अँधेरा


मैं घर से चला
तो घर का अँधेरा
मेरे साथ साथ
चल रहा था

मेरी आँखों में सूरज था
उज्जवल भविष्य के
सपने थे
लेकिन मेरे पाँवों में
पीछे छूट चुके
घर की बेड़ियाँ थीं
रिश्तों की आवाजे थीं
मेरे शहर की
छूट रही सीमाएँ थीं
मेरे पूर्वजों की आत्माएँ थीं

मै अपने रास्तों मे अटके
काले पर्वतों से जूझा
मरुस्थली पगडंडियों को फलाँगा
समुद्रों को तैरा
हाथों में सूरज को पकड़ा
तितलियों को
सपनों में सजाया
धीरे धीरे मैंने
अपनी इच्छा का
अपना संसार बसाया।

मैं जल्दी जल्दी
माँ की सूख रही हथेलियों पर
चन्द सिक्के टिकाऊँ
और वापिस
अपने सहर लौट आऊँ

लेकिन
मेरे पीछे चल पड़ती
कुछ आवाजें
जिनसे बचने के लिए
मैं छटपटाऊँ
दर्द से बिलबिलाऊँ

अँधेरे के
इस जंगल से
निकलने के लिए
तिलमलाऊँ
आँसू बहाऊँ

मैं घर से चलता
तो घर का अँधेरा
अब भी
मेरे साथ साथ चलता।

( अमरजीत कौंके की अन्य कविताएँ)

 


एन गोपी की तेलगु कविता

यह है बंबई


( 1996 में अखिल भारती तेलुगु महासभा में पढ़ी गई कविता )

गुड मार्निंग बंबई!
तुझे देखे पच्चीस साल हो गए
कुच भी तो नहीं बदला
वही वेग वही आवेग।
छायागीत की परतों में मोहम्मद रफी बुलाता है-
"मिलता है यहाँ सब कुछ मिलता नहीं दिल"
तेरे पास दिल नहीं होता
तो इतने सारे लोगों का पेट कैसे छुपाए रखती!
तेलुगु दीप लेकर आया हूँ
अपने व्यस्त जीवन से एक नजर इधर भी फैंकना!
यहाँ कपड़ों की मिलों के धागे की बुनाई में
फँसे बुनकरों के हालात तो ठीक ठाक है न?
याद है न
कि यहाँ की भव्य इमारतों को
प्रवासी तेलुगु हाथों ने ही बनाया था?

यह क्या बेटे !
एक इंच भी जगह खाली नहीं!
आत्मीयता दिखाने की फुरसत नहीं
क्या अरब सागर ही सड़क पर चढ़कर
जनता की नदी बन बहने लगा!
सबकों जगह दिलानी है
तो क्या समुद्र में और जमीन उगानी होगी?
वेमन्ना* को साथ लाना चाहता था
तुकाराम से तत्व चर्चा करते
वेमन्ना ने कहा-
तुम जो कर रहे हो यह काफी है!
तेरी कार्पोरेट संस्कृति में
तुम्हें जरा भी फुरसत नहीं
तेरे लिए तेलुगु का दीप लाया हूँ
जरा दिल की बात कहने दो
हमारे आपसी जन्म सम्बन्धों के बारे में बताने दो
असल में संस्कृति का अर्थ मिलाना ही तो है
दरारे पड़ने के लिए तो दस मिनिट ही काफी हैं!

शिवाजी को श्रीशैलम में तेलुगु तलवार मिली
तेलुगु पेट भरने वाली गोदावरी
नासिक में ही जन्मी
पेट तो मराठी में भी पेट होता है
पेट की क्या भाषा हो सकती है?
भूख ही उसकी भाषा है।
बिवांडी, शोलापुर, अहमद नगर , नादेंड
चाहे कहीं भी हो
प्रवासी पक्षी सभी
दुखों के समूह बनकर खड़े हैं
यहाँ सभी कोठियाँ आकाश की ओर देखती हैं
लेकिन मिट्टी का पराग बन जाना ही संस्कृति कहलाता है
संस्कृति श्रमिक जनों के रक्त स्पंदनों की कृति है
अब मैं चला
रफी का गीत फिर से मेरा पीछा करता है
नमस्कार मुम्बई नमस्कार!

अनुवाद.. आर शान्ता सुन्दरी

(एन गोपी की अन्य कविता )
 


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