लक्ष्मी शंकर
वाजपेयी

लक्ष्मी शंकर वाजपेयी की कविताओं जिन्दगी से जुड़ी छोटी-छोटी बातों को इस सरलता और सहजता से प्रस्तुत किया गया है कि वे जन सामान्य के मन की बात को कह पाती हैं। आप आकाशवाणी से जुड़े हैं, और कविता के साथ गीत विधा में भी सामर्थ्य रखते हैं।
पता है - के-210 , सरोजनी नगर, नई दिल्ली 110023

संकेतों की भाषा

वे चार पाँच के समूह में
बातें करते हैं
संकेतों की भाषा में
देखते बनती हैं
उनके हाथों और उंगलियों की
संचालन की मुद्राएँ और उनकी गति
वे डूबे हैं बहुत गहरे
अपने वार्तालाप में
तरह तरह के भाव
उभरते हैं उनके चेहरों पर
उनकी इस बातचीत का दृश्य
बनाता है अजीब कौतुहल का वातावरण
विस्मित हो देखते हैं आसपास के लोग
फिर आपस में फुसफुसाते हैं
दयाभाव से लेकर उपहास तक के
मिश्रित भावों से
गूंगे हैं-- फुसफुसाता है कोई
उन्हें दिखाता है सिर्फ गूंगापन
वे सुन ही नहीं पाते
कि इस वार्तालाप में
जिन्दगी कैसे चहक चहक कर बो रही है!

वे लोग

वे लोग
डिबिया में भरकर पिसी हुई चीनी
तलाशते थे चींटियों के ठिकाने
चतों पर बिखेरते थे बाजरा के दाने
कि आकर चुगें चिड़ियाँ
वे घर के बाहर बनवाते थे
पानी की हौदी
कि आते जाते प्यासे जानवर
पी सकें पानी
भोजन प्रारंभ करने से पूर्व
वे निकालते थे गाय तथा अन्य प्राणियों का हिस्सा
सूर्यास्त के बाद, वे नहीं तोड़ने देते थे
पेड़ से एक पत्ती
कि खलल न पड़ जाए
सोये हुए पेड़ों की नींद में
वे अपनी तरफ से शुरु कर देते थे बात
अजनबी से पूछ लेते थे उसका परिचय
जरूरतमन्दों की करते थे
दिल खोल कर मदद
कोई पूछे किसी का मकान
तो खुद छोड़ कर आते थे उस मकान तक
कोई भूला भटका अनजान मुसाफिर
आ जाए रातबिरात
तो करते थे भोजन और विश्राम की व्यवस्था
संभव है, अभी भी दूरदराज किसी गाँव या कस्बे में
बचे हों उनकी प्रजाति के कुछ लोग
काश ऐसे लोगों का
बनवाया जा सकता एक म्यूजियम
ताकि आने वाली पीढ़ियों के लोग
जान सकते
कि जीने का एक अन्दाज ये भी था

खण्डित प्रतिमाएँ

अब वे सब की सब
रख दी गई हैं
एक पुराने बरगद के नीचे
यही तरीका है शायद
कि संभव नहीं हो नदी में विसर्जन
तो रख देते हैं "खण्डित प्रतिमाओं" को
किसी पेड़ के नीचे
कभी पूजाघरों में प्रतिष्ठित
इन्हीं के सामने खड़े होते थे लोग
अपनी सम्पूर्ण दयनीयता, विनम्रता
और भक्तिभाव समेटे
जोड़ कर कातर हाथ!
यही बचाती थीं
बच्चों को रोगों से
दिलाती थीं परीक्षाओं में नम्बर
सुधार देती थीं बिगड़ा हुआ पेपर
सुरक्षित ले आतीं थीं बच्चों के पिता को
दूसरे शहरों से
ढ़्यान रखती थी होस्टल में पढ़ रही बेटी का
पूरी हुई कितनी मन्नतें इन्हीं की पूजा से
अब वे उपेक्षित कर दी गई हैं
सत्ता से उतरे सत्ताधीश की भांति
आते जाते कुछ राहगीर
अभी भी जोड़ देते हैं हाथ श्रद्धावश
तब क्या इन्हें भी मिलती होगी
उतनी ही खुशी
जितनी कि मिलती है
स्वयं को उपेक्षित महसूसते
वृद्ध पिता को
लम्बे अरसे बाद अपने बेटे की चिट्ठी पाकर!
 


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