योगेंद्र कृष्णा

प्रेम का अनगढ़ शिल्प

काटने से पहले
लकड़हारे ने पूछा
उसकी अंतिम इच्छा क्या है

वृद्ध पेड़ ने कहा
जीवन भर मैंने
किसी से कुछ मांगा है क्या
कि आज
बर्बर होते इस समय में
मरने के पहले
अपने लिए कुछ मांगूं

लेकिन
अगर संभव हो
तो मुझे गिरने से बचा लेना
आसपास बनी झोपड़ियों पर
श्मशान में
किसी की चिता सजा देना
पर मेरी लकड़ियों को
हवनकुंड की आग से बचा लेना
बचा लेना मुझे
आतंकवादियों के हाथ से
किसी अनर्गल कर्मकांड से

मेरी शाख पर बने
बया के उस घोंसले को
तो जरूर बचा लेना
युगल प्रेमियों ने
खींच दी हैं मेरे खुरदरे तन पर
कुछ आड़ी तिरछी रेखाएं
बड़ी उम्मीद से
मेरी बाहों में लिपटी हैं
कुछ कोमल लताएं भी

हो सके तो बचा लेना
इस उम्मीद को
प्रेम की अनगढ़ इस भाषा
इस शिल्प को

मैंने अबतक
बचाए रखा है इन्हें
प्रचंड हवाओं
बारिश और तपिश से
नैसिर्गक मेरा नाता है इनसे
लेकिन डरता हूं तुमसे

आदमी हो
कर दोगे एक साथ
कई-कई हत्याएं
कई-कई हिंसाएं
कई-कई आतंक

और पता भी नहीं होगा तुम्हें
तुम तो
किसी के इशारे पर
काट रहे होगे
सिर्फ एक पेड़...

(योगेंद्र कृष्णा की अन्य कविताएँ)


विवेक गौतम की कविता

सम्पन्नता


मुझे
उड़ना है
बन्द करों
चिड़ियों की उड़ान

मुझे
रैंप पर उतरना है
नोंच डालों
तितलियों के पंख
बन्द करों
भंवरों का गुंजन

मुझे
मुस्कराना है
बन्द करो
फूलों का खिलना
चाँद का निकलना

मुझे छूनी हैं ऊँचाइयाँ
विलीन करो पहाड़ों को
महासागरों में
सरका दो सूर्य को
किसी दूसरी आकाश गंगा में।

(विवेक गौतम की अन्य कविताएँ)


ब्रज श्रीवास्तब

मेरा प्रेम भी


तुम तो कब की बिछुड़ चुकी हो
तब हम आखिरी बार मिले थे
जब छत पर रखे गमले में गुलाब ने
दिया था मौसम का सबसे प्यारा फूल

तब से अब तक कितना कुछ गुजर गया
कितनी बार पस्ती को रौंदा मैंने

पहली बार तो तब, जब
एक हमपेशे ने तोड़ा भरोसा
मैंने मन ही मन खूब ढूंढ़ा था तुम्हें
एक बार मैं जूझा अपने वजूद के लिए
शून्य में से निकाल लाया अपने हिस्से का जीवन
इस तरह लगभग रोजाना करता रहा
मुठभेड़ मैं दिन से

और हासिल करता रहा रात
इन छोटी विजयों को मैं ऐसे ही नहीं पाता रहा
मुझे लगता तुम्हीं रहती मौजूद उसमें
अचरज है ऐसा तुम कैसे कर सकी होओगी

मुझे भरोसा है
तुम भी वहाँ जीत जाती होगी एक लड़ाई
मेरा प्रेम भी बना होगा एक अदृश्य सा हथियार

(ब्रज श्रीवास्तब की अन्य कविताएँ)
 


रचना श्रीवास्तब की कविता

अभिलाषा है
तेरे खुश्क होते शब्दों पे
बादल रख दूँ
तुम थोड़ा भीग जाओ
तुम्हारी वो मेज
जिस पे मेरे नाम की मीनाकारी थी
डायरी जिनमे में नजाने कितनी बार
मै डूबी उतरी थी
वो लम्हे फर्श पे बिखरादूँ
तो शायद
खामोशियाँ जो आहटों को
आगोश में भरे तेरे अंदर है
लफ्ज बन के बह जायें
तुम अपने हिस्से में नहा लो
में आपने में डूब जाऊँ

( रचना श्रीवास्तब की अन्य कविताएँ)
 


प्रताप नारायण सिंह

विमुखता

बहुत चाह थी कि वे माँगते मुझसे
और मैं जंगल में जाकर दूर तक
तोड़ लाता मेहंदी के झाड़।
उनकी हथेलियों का चटख रंग
बिखरता पूरे दिन मेरे होठों पर
मुस्कराहट बनकर।

बहुत चाह थी कि वे माँगते मुझसे
और मैं समंदर में उतरकर गहरे
इकठ्ठा कर लाता मोतियों वाले सीप।
उनके गले की श्वेत आभा
झिलमिलाती पूरे दिन मेरी आंखों में
चमक बनकर।

बहुत चाह थी कि वे माँगते मुझसे
और मैं भोर में बगीचे से
चुन लाता बेला के फूलों को ।
उनके बालों की मादक सुगंध
बसती पूरे दिन मेरी साँसों में
गुदगुदी बनकर।

उन्होंने मांग लिया विमुखता मुझसे
और मैंने पहना दिए
अपनी चाह को श्वेत परिधान।
उसकी डबडबायी आँखें
चुभती हैं पूरे दिन मेरे सीने में
फाँस बनकर। 


(प्रताप नारायण सिंह अन्य कविताएँ)


रति सक्सेना की कविता

मौसम बनते जाना

अजीब सा मौसम था
लगा कि आसमान के सीना भारी है
न खुल कर बरस रहा था और ना ही चमक रहा था
मेरे घुटने का दर्द गुडहल के फूल सा खिलने लगा
पैरों कि उंगलियाँ सुन्न होने लगी
मैंने बाहर निकलने से पहले मोजे निकाल पहन लिए,
गले में शाल डाल लिया।
हवा और पानी की बून्दे
आपस में गुत्थम- गुत्था थीं, पेड़ों की शाखाएँ
बिल्ली के बच्चों सी सिर झुकाएँ खड़ी थी
आसमान काफी नीचे उतर आया था

तभी पीठ पर किसी ने छुआ
मुड़ कर देखा, चालीस साल पहले का वक्त खड़ा था-

तपन में बारिश की मनौतियाँ,
ठण्डक के लिए सूखता गला, और अन्होरियों से भरी
गर्दन, काले मेघा पानी दे, पानी दे गुड़ धानी दे

मै थमी और वापिस लौटी, मोजे को उतार फैंके
चालीस पहले की तपन को शाल बन ओढ़ कर
दरख्तों के नीचे गुजरती, बून्दों में भीगती हुई
मैं खुद मौसम बन गई।

(रति सक्सेना की अन्य कविताएँ)

 


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