मैं कृत्या हूँ
कृत्या - मारक शब्द शक्ति,
कृत्या - जो केवल सच के साथ चलती हो,
कृत्या - जो पूरी तरह सही का साथ देती हो ।

 
 

कृत्या प्रकाशन की  पुस्तकें
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साहित्य के क्षेत्र में पोलिश लोगों की इस जबरद्स्त पैठ का क्या कारण हो सकता है, निसन्देह एक कारण यह भी है जो Laurie A Gomulka Palazzolo ने कहा है कि "यदि पोलिश जन कर्मठ,मेहनती और लगनवाले न होते,और अपने हर काम को पूरे मन और भावना से निभाने में विश्वास नहीं करते तो वे कुछ भी नहीं होते। मेरा विचार है कि पोलिश लोग पुरातन ग्रीक वासियों के समान हैं जो ये विश्वास करते थे कि जीवन के अन्त में इस बात का महत्व नहीं कि व्यक्ति ने क्या पा लिया, बल्कि यह महत्वपूर्ण है कि उसने अपने जीवन को शिद्दत से जीया है कि नहीं। मेरा विचार है कि पोलेण्ड की आकृति दिल जैसी अनायास ही नहीं है,पोलेण्ड का चिन्ह भी समृद्ध,गहन और भावपूर्ण है। लाल रंग शौर्य का प्रतीक है और श्वेत शान्ति का"
पोलिश अंक की परिकल्पना के पीछे दो समकालीन पोलिश कवियों कविताएँ रही हैं। क्रिस्टीना पिकोज और जान John Guzlowski .....
रति सक्सेना
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जंग खत्म हो गई, लेकिन हम अब भी उसके परिणामों से जूझ रहे हैं। हमारे पास खाने की मेज है लेकिन खाना नहीं, दर्द है लेकिन दवा नहीं, लोहे के पलंग हैं, लेकिन बिछाने को पुआल नहीं है।
हर दिन मैं रात का इंतजार करती हूँ, जिससे इन चीजों के इंतजार से बच सकूँ।
जान गुजलोस्क्वी ( John Guzlowski)
*
मैं एक अधेड़ औरत, एक लेखक, जैसा कि यहाँ जानी जाती हूँ, तुमसे मुहब्बत करती हूँ। पतझड़ करीब करीब खत्म हो गया, और तुम्हारी और मेरी दुनिया सर्दी के मौसम में प्रवेश कर गई।
क्रिस्टीना पिकोज (Christina Pacosz)
*
सड़कों पर घूमना
मै शायद ही भूला हूँ
लेकिन आज मैं
लौट आया हूँ

बूटो के तले
कब्र के पत्थर की तरह
भारी हो गए हैं
मैं बड़े चमकदार चूहे सा
महसूस कर रहा हूँ
लेकिन फिर भी
अभी लौट रहा हूँ
Peter Burzynski

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गद्य की गति में उत्ताल उछालें तो नहीं, किन्तु गंभीर गहनता होती है, जो उसकी चाल को थोड़ा मध्यम, थोड़ा शान्त पर मानस को उद्वेलित करने वाला बना देती है। यदि सरल शब्दों में कहा जाए तो गद्य के भीतर सुगबुगाती कविता होती है। हमारे पुरातन साहित्य में गद्य पद्य के साथ-साथ चलता रहा। कालिदास की शकुंतला जितनी अपनी कथात्मकता के लिए प्रसिद्ध हुई, उतनी ही बेहद खुबसूरत काव्य अंशों के कारण भी।
बहुत धीमे धीमे गिरा करते हैं
देवदार के दरख्त
हवा हैरान सी चुप रहती है
चोटी की शाख धँस जाती है
धरती के भीतर
धूल का बगूला सिर्फ
चार फुट ऊपर उठता है
बवण्डर नहीं उठा करते
हर कब्र की गहराई से
कुछ ऊँचे दरख्त खुद
जमीन में समा जाते हैं
जड़ों की मिट्टी में
कभी-कभी रेत मिली रहती है
मृदुला गर्ग के उपन्यासों में आईं कविताएँ
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सच यह है कि - चेहरा छिपा ही रहता है
चाहे घूंघट किता ही पारदर्शी क्यों ना हो
सिल्क फुसफुसाहट सी मुलायम हो
शादी के बिस्तरे पर, सफेद किनारी
धागों और अकेलेपन से बुनी हो
हम हमेशा पर्दे में होते है, यहाँ तक कि
चादर के नीचे भी, हमारी खाल हमारे भीतर के
हजारो कोषों को ढंकने वाली एक परत ही तो है
*
यह देश गुड़िया घर है
बिर्च पेड़ के डिब्बे पर
दिलों से सज्जित, चेस्टनट के
के फलों को तोड़ते हुए दिखाना
बचपन का चर्च
जहाँ कोई भी उजाले में नहीं आता
काँच की आँख वाले की मौत पर
शृद्धा सुमन का अर्पण
चन्दा इक्कट्ठा करने का डिब्बा
एक खाली हाथ, हजारों बारीक कतरने
से बर्फ का रूप निर्माण
इक्कम दुक्का (Hopscotch)खेलती धरती धरती, मैं बच नहीं पाती हुँ
जेहन्ने डरब्यू
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बहुत कम
मैंने कहा बहुत कम
दिन बेहद छोटे थे

छोटे दिन
छोटी रातें
छोटे साल

मैंने कहा बहुत कम
मैं रख भी नहीं सका

मेरा दिल घबरा गया
खुशी से
निराशा से
प्रेम से
आशा से

राक्षसों के जबड़े
मुझे कस रहे हैं

मैं सुनसान द्वीपों में
नग्न लेटा हूँ

संसार की सफेद व्हेल मछली
मुझे अपने बिल में ले जाती है

अब मैं नहीं जानता
जो कुछ अन्दर वह कितना सच है
*

क्षण कल से, और सदियों पहले से
एक तलवार का गाव, चमकदार दर्पण के सामने
पलकों की रंगाई, एक जबरदस्त धमाका, एक लड़ाकू जहाज
की नोक का समुद्री वनस्पति से टकराना,
वे हमारे भीतर घुस रहे हैं
पूर्णता का इंतजार करते हुए

Czeslaw Milosz, चेस्लाव मिलोष

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VOL - IV/ PART IX

(अप्रेल -  2009)

संपादक :  रति सक्सेना


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