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कृत्या के इस अंक का अंग्रेजी संस्करण पोलिश अमेरिकन कविताओं पर केन्द्रित है। पोलिश भाषा कविता के क्षेत्र में बेहद समृद्ध है, यह तो हम जानते ही हैं कि पोलिश संस्कृति ने दो नोबल पुरस्कार विजता कवियों को जन्म दिया है ( Czeslaw Milosz - 1911- 2004 and Wilslawa szymborska -1923 ) , इसके अतिरिक्त "Three Bards" के नाम से प्रसिद्ध Adam Mickiewicz(1798- 1855),Juliusz Slowacki(1809-1849) और Zygmunt Krasinski(1812-1859) भी इस देश के साहित्य की स्वर्णगाथा कहते हैं । यही नहीं पोलिश साहित्य के सम्राट कवि, उपन्यासकार और नाटककार Tadeusz Rozewicz ( 1921) पर किसी भी पोलिश नागरिक को गर्व हो सकता है। पोलिश संस्कृति का पुरातन गौरव है, लेकिन पोलकों ने अनेक संघर्षों का समना किया है, कभी धर्म के कारण दबाए गए तो कभी राजनैतिक विश्वास के कारण। दोनो विश्वयुद्धों ने पोलकों को बुरी तरह से झिंझोड़ कर रख दिया। न जाने कितनी बार उन्हे अपनी जमीन से खदेड़ा गया, और अनेक बार वे पलायन कर विस्थापित किए गए। दूसरे विश्व युद्ध में तो अनेकों पोलकों को बन्धक मजदूर बना कर दूसरे देशों में भेजा गया। फिर भी पोलकों की साहित्य में अनुपम स्थान रहा है।
साहित्य के क्षेत्र में पोलिश लोगों की इस जबरद्स्त पैठ का क्या कारण हो सकता है, निसन्देह एक कारण यह भी है जो Laurie A Gomulka Palazzolo ने कहा है कि "यदि पोलिश जन कर्मठ,मेहनती और लगनवाले न होते,और अपने हर काम को पूरे मन और भावना से निभाने में विश्वास नहीं करते तो वे कुछ भी नहीं होते। मेरा विचार है कि पोलिश लोग पुरातन ग्रीक वासियों के समान हैं जो ये विश्वास करते थे कि जीवन के अन्त में इस बात का महत्व नहीं कि व्यक्ति ने क्या पा लिया, बल्कि यह महत्वपूर्ण है कि उसने अपने जीवन को शिद्दत से जीया है कि नहीं। मेरा विचार है कि पोलेण्ड की आकृति दिल जैसी अनायास ही नहीं है,पोलेण्ड का चिन्ह भी समृद्ध,गहन और भावपूर्ण है। लाल रंग शौर्य का प्रतीक है और श्वेत शान्ति का"
पोलिश अंक की परिकल्पना के पीछे दो समकालीन पोलिश कवियों कविताएँ रही हैं। क्रिस्टीना पिकोज और जान John Guzlowski , दोनो की कविताएँ कृत्या में छप चुकी हैं। जब मैंने जान की कविताएँ पढ़ी तो मै दहल उठी, किस मानसिक प्रतारणा से निकल कर यह कौम आगे बढ़ी है, इसकी कल्पना मेरे लिए दुष्कर थी। तभी मैं जान पाई कि यूरोप में पैठे भेदभाव को। क्रिस्टीना की कविताओं में विषाद तो था, पर कड़वाहट या छटपटाहट नहीं, किन्तु जान की कवितांओं में दूसरे विश्व युद्ध के वक्त नाजी कैम्प में रहने वाले माता पिता का वर्णन था, जिसे पढ़ कर न केवल मन विचलित हुआ बल्कि रंग भेद से भयानक उस भेद को समझ पाई जो श्वेत रंग समाज में जड़ें जमाए हुए है। यह छटपटाहट तब और गहरी लगी जब पोलिश लोगों को विस्थापित होना पड़ा। विस्थापित अस्मिता का दर्द हम अपने जैसे लोगों के बीच भी झेलते हैं, इस बात को मै खूब समझती हूँ। तभी मुझे लगा कि पोलिश/अमेरिकन (यानी कि विस्थापित हुए पोलिश लोगों की कविता) कविता का एक अंक जरूर निकाला जाए। लेकिन दोनो संपादकों के उत्साह से एक नहीं बल्कि दो अंको की सामग्री मिल गई। मैं सभी कविताओं का हिन्दी में अनुवाद भी देना चाहती थी, लेकिन मेरे दो हाथों में इतनी ताकत नहीं बची है कि अकेले ही अनुवाद कर लूँ, और कृत्या के पास इस वक्त तक कोई सहयोगी नहीं है। मैं कोशिश करके कुछ अनुदित कविताएँ जरूर इस अंक के साथ देना चाहूँगी। संभवतः अनुवाद में कुछ कमियाँ रह गई हो, फिर भी हम कुछ झलक तो पाएंगे ही।
पोलिश कविताओं के साथ साथ एक महत्वपूर्ण कहानी कार एक उपन्यास कार मृदुला गर्ग की कविताएँ। दरअसल उन्होंने कविताएँ अंग्रेजी अंक के लिए भेजी थीं, किन्तु मेरे अनुनय पर उपन्यासों के बीच आई हिन्दी की कविताओ को भी भेजा। अब यह अध्ययन का विषय तो हो जाता ही है कि कविता कथा को किस तरह से विस्तार देती है। संस्कृत , पाली आदि साहित्य में कथा ओर कविता साथ साथ चली थीं, लेकिन बाद में दोनों विधाएँ अलग अलग हो गईं। यह भेद कभी कभी तो इतना बढ़ गया कि कुछ साहित्यकारों ने इन्हें एक दूसरे का विरोधी ही मान लिया।
मृदुला गर्ग जी की कविताएँ हमें फिर से सोचने का मौका देती है, जिन्हे हम "कविता के बारे" में पढ़ेंगे।
मित्रों हिन्दी का अंक सिकुड़ता जा रहा है, संभवतः मेरे काम करने की क्षमता कम हो रही है, फिर भी आशा है कि कोई संबल हाथ इसे संभालेगा जरूर। और यह अपने पाँचवे वर्ष भी सफलता पूर्वक निकलेगा।

रति सक्सेना

      
                                                     
 


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