गद्य की गति कविता के संग

मृदुला गर्ग के उपन्यासों में आईं कविताएँ
गद्य की गति में उत्ताल उछालें तो नहीं, किन्तु गंभीर गहनता होती
है, जो उसकी चाल को थोड़ा मध्यम, थोड़ा शान्त पर मानस को उद्वेलित
करने वाला बना देती है। यदि सरल शब्दों में कहा जाए तो गद्य के
भीतर सुगबुगाती कविता होती है। हमारे पुरातन साहित्य में गद्य पद्य
के साथ-साथ चलता रहा। कालिदास की शकुंतला जितनी अपनी कथात्मकता के
लिए प्रसिद्ध हुई, उतनी ही बेहद खुबसूरत काव्य अंशों के कारण भी।
यही स्थिति अधिकतर संस्कृत कृतियों की रही। यही कारण है कि काव्य
शास्त्र में गद्य भी काव्य के अन्तर में समाहित रहा। दरअसल
किस्सागोई और लोक गीत, दोनों ही जन मानस की अभिव्यक्तियाँ हैं।
पाश्चात्य साहित्य में कमोबेश यही स्थिति रही। , लेकिन १९ वीं सदी
में दोनों विधाओं के बीच एक लम्बी सीमा रेखा खिंच गई। कालान्तर में
यह बेहद विवादित विषय के रूप में परिवर्तित हो गई। वेद की छात्रा
होने के कारण मैं इस बात को पचा नहीं पाती हूँ, लेकिन नक्कारखाने
में तूती की आवाज, कौन सुनता है। अभी हाल में ही मृदुला जी की
कविताएँ अंग्रेजी में मिली (कृत्या के लिए) , उनमें तैरती संवदनाएँ
बेहद मन को छूने वाली थी। मुझे लगा कि वे हिन्दी में भी कविताएँ
लिखती होंगी, किन्तु उन्होंने ही बताया कि वे हिन्दी में अलग से
नहीं लिखतीं, किन्तु उपन्यासों में कुछ कविताएँ कथा अंश के रूप मे
अवश्य आई है। मैंने मृदुला जी कुछ कहानियों और उपन्यासों को पढ़ा
है, और मुझे उनके गद्य की गत्यात्मकता में कविता की खुशबू आई।
निसन्देह गद्य को कविता की तरह से लिख पाना अपने में विशिष्ट है।
इसलिए मैंने उनसे उपन्यासों की कविताएँ भेजने का आग्रह किया।
मृदुला जी ने अपने व्यस्त जिवन से समय निकाल कर इन कविताओं को
भेजा, जो गद्य के बिना पूर्ण कविताएँ लगती हैं, और कथा के साथ कथा
का हिस्सा बन जाती है।
मुझे लगता है कि यह समिश्रण साहित्य की ताकत बन सकता है, बस जरूरत
है सहज आत्मीयता कि, जो दोनों विधा में सामंजस्य बैठा सकें।
मैं इन कविताओं को इसलिए अलग से प्रस्तुत कर रही हूँ कि हम कविता
के बारे में एक और नजरिए से देखना शुरु करें।
अनित्य (उपन्यास से)
बहुत धीमे धीमे गिरा करते हैं
देवदार के दरख्त
हवा हैरान सी चुप रहती है
चोटी की शाख धँस जाती है
धरती के भीतर
धूल का बगूला सिर्फ
चार फुट ऊपर उठता है
बवण्डर नहीं उठा करते
हर कब्र की गहराई से
कुछ ऊँचे दरख्त खुद
जमीन में समा जाते हैं
जड़ों की मिट्टी में
कभी-कभी रेत मिली रहती है
चितकोबरा (उपन्यास से)
मैं जीती हूँ
चाहत में बँटे
बिखरे क्षणों में
जब मैं नहीं होती
विषाद का गहरा गढ़ा
मुझे चूसकर
भीतर- बहुत अन्दर
उगला करता है
तपता गुबार
घुटन के अंतिम क्षण में
अट्टहास की गूंज पर चढ़
उछल निचली सतह से
तुम्हारे पास गिर कर
जीने लगती हूँ- पर
गढ़े से भी मुझे
कम प्यार नहीं
प्यार की बात बेकार है
वहीं मेरा घर है
गढ़े के बहुत अन्दर
सबसे निचली सतह पर
जहाँ हर क्षण बराबर
काला धुँआ उगला करता है

कठगुलाब (उपन्यास से)
मैंने नहीं चुना यह जीवन
यह अभिशाप मिला मुझे अगम्य से
किस बूते पर सिद्ध बने हो परम गुरु
देखो मैंने सिद्ध कर ली दुख पिपासा
वही शक्ति है ना तुम्हारी
अखण्ड शान्ति व सुख दोगे कैसे
पा चुकी जीवन का एकमात्र आदर्श
परम, पूर्ण, नित्य, अनन्त दुख
एक और अजनबी (नाटक से)
कल रात तुम्हारी प्रतीक्षा करते
मैंने देखा--
मेरे पथरीले बगीचे के
धुंधियाते कोने में
कैक्टस पर एक फूल खिला है !
धीमे-धीमे मेरी आँखों के सामने
उस कंकरीले ठूँठ पर
असंबद्ध दौड़ते क्षणों की कतार से
टूट कर दिपदिपाता एक पल
आ जड़ा है।
फिर देखा--
घोंसले से गिरे अबोध पक्षी -सा
पंख फड़फड़ाता
वह
मेरी प्रतीक्षा का संगी
मुझे आश्वस्त करते-करते
स्वयं धरती पर झड़
बिखर चुका है।
बच रहा है वह कंटीला झाड़
अपने भाग्य पर स्तब्ध
निर्भाव प्रतीक्षा करता
मेरी तरह
उस रात की जिस रात
कैक्टस पर फूल फिर
--खिलेगा--
प्रस्तुति
रति सक्सेना