
Czeslaw Milosz, चेस्लाव मिलोष
चेस्लाव मिलोष का जन्म June 30, 1911,को Szetejnie, Lithuania में
हुआ था। वे पेशे से इंजीनियर थे, उन्होंने बचपन से कविता लिखना
शुरु किया था़ युद्ध के बाद वे अमेरिका में पोलिश सरकार की
समाजवादी सरकार के राजदूत बने। उन्हे पेरिस भेजा गया लेकिन
राजनैतिक मतभेदों के कारण उन्होंने राजनैतिक अभय माँगा और पेरिस
में बस गए। बाद में वे अमेरिका गए और पोलिश भाषा पढ़ाने लगे।
उन्होंने उपन्यास भी लिखे, वे हमेशा पोलिश भाषा में लिखते थे, और
अंग्रेजी में अनुवाद करते थे। उन्होंने कई नामी लेखकों की कृतियों
का पोलिश में अनुवाद किया था। 1980 में उन्हे नोबल पुरस्कार से
नवाजा गया, तभी उनकी कृतियाँ पोलिश में भी पढ़ी जाने लगी, उससे पहले
उनकी कृतियाँ पोलेण्ड में पढ़ी तक नहीं जाती थी।
मुटभेड़
हम पौ फटने से पहले बर्फ से जमें खेतों में घुड़सवारी कर रहे थे
तभी अंधेरे में रक्तिम उजास उगी
अचानक एक खरगोश सड़क के उस पार भागा
हम में से किसी एक ने हाथ से उसकी ओर इशारा किया
यह काफी पहले की बात है, आज उनमें से कोई भी जिन्दा नहीं
न ही खरगोश, न ही वह आदमी जिसने इशारा किया था
मेरी प्रिये! वे सब अब कहाँ है, वे कहाँ जा रहे हैं
उस हाथ का माँस, गति की लकीर, कंकड़ो की खड़खड़ाहट
मैं यह सब दुख के साथ नहीं, बल्कि आश्चर्य से पूछ रहा हूँ।
Wilno, 1936
*
बहुत कम
मैंने कहा बहुत कम
दिन बेहद छोटे थे
छोटे दिन
छोटी रातें
छोटे साल
मैंने कहा बहुत कम
मैं रख भी नहीं सका
मेरा दिल घबरा गया
खुशी से
निराशा से
प्रेम से
आशा से
राक्षसों के जबड़े
मुझे कस रहे हैं
मैं सुनसान द्वीपों में
नग्न लेटा हूँ
संसार की सफेद व्हेल मछली
मुझे अपने बिल में ले जाती है
अब मैं नहीं जानता
जो कुछ अन्दर वह कितना सच है
Berkeley, 1969

भूलना
भूल जाओ दुख को
जो तुमने दूसरों को दिए
भूल जाओ वे दुख
जो दूसरों ने तुमको दिए
पानी सदैव बहता रहता है
बसन्त की चिनगारियाँ और बस हो गया
उस जमीन पर चलों जिसे तुम भूल रहे हो
कभी तुम सुनोगे दूर से छूटा
इसका क्या मतलब है, तुम पूछोगे, कौन गा रहा है?
बच्चे सा दिखता सूरज गरमा रहा है
एक पोते और एक पड़पोते ने जन्म लिया
हाथ ने फिर तुम्हे रास्ता दिखाया
नदियों के नाम तुम्हारे साथ रहेंगे
ये नदियाँ कितनी अनन्त दिखती हैं
तुम्हारे खेत रिक्त हैं
शहर के टावर वैंसे नहीं रहे, जैसे पहले थे
अब तुम देहलीज पर मौन खड़े हो।
परिपक्वता में देर
बहुत जल्दी नहीं, ज्यों- ज्यों मेरे नब्बे साल मेरे पास आते हैं
नुझे लगा कि मुझ में एक दरवाजा खुल रहा है, और मैं
सुबह की साफ हवा में जा पहुँची हूँ।
एक के बाद एक कर के मेरी पुरानी जिन्दगियाँ मुझे छोड़ रही हैं
जहाज की तरह, दुख के साथ।
और देश, शहर, बगीचे, समुद्रों के शोर
अपनी तूलिका का करीब लाते हुए
जो उन्हे उनसे भी बेहतर बताने के लिए तैयार है
मैं लोगों से अलग नहीं हुआ हूँ
दुख और करुणा ने हमारा साथ पकड़ लिया
हम भूल गए- मैं लगातार कह रहीं हूँ-हम सब राजा के बच्चे हैं
जहाँ से हम आए हैं, वहाँ कोई भेदभाव नहीं
हाँ और ना में, है और था में, और होगा में
हम बेहद संतृप्त थे, हमने उस भेंट के सौंवे हिस्से से ज्यादा
उपयोग नहीं किया, जो हमें लम्बी यात्रा में मिले
क्षण कल से, और सदियों पहले से
एक तलवार का गाव, चमकदार दर्पण के सामने
पलकों की रंगाई, एक जबरदस्त धमाका, एक लड़ाकू जहाज
की नोक का समुद्री वनस्पति से टकराना,
वे हमारे भीतर घुस रहे हैं
पूर्णता का इंतजार करते हुए
मुझे मालूम था, हमेशा, कि मैं अंगूर के बगीचे में कामगार होऊँगा
जैसे कि सभी आदमी और औरत एक समय में
चाहे वे इसे जानते हैं, या नहीं जानते
http://www.poetry-chaikhana.com/M/MiloszCzesla/Forget.htm
परियों पर
तुम से सब कुछ ले लिया गया, सफेद पौशाक
पंख, यहाँ तक अस्तित्व
फिर भी मैं तुम पर विश्वास करता हूँ
कि तुम एक दूत हो
वहाँ, जहाँ कि दुनिया उलट जाती है
एक तारों और दानवों की कसीदाकारी किया गया भारी कपड़ा
तुम टहल रहे हो, विश्वास करने योग्य चीजों का मुआयना करते हुए
यहाँ तुम काफी कम समय के लिए रुकी
अभी और फिर दुपहर की घड़ी में, यदि आसमान साफ हो,
एक चिड़िया के द्वारा दुहराई गई धुन में
या फिर दिन के खत्म होने पर सेव की खुशबू में
जब कि रोशनी आर्किडों को जादुई बनाती है
वे कहते है कि किसी ने तुम्हारा अविष्कार किया है
लेकिन मुझे यह बात पर विश्वास करने योग्य नहीं लगती
आदमी के लिए तो उसने अपना भी अविष्कार किया है
कोई शक नहीं कि तुम्हारी आवाज इस बात का पक्का सबूत है
क्यों कि यह केवल चमकदार जीव की हो सकती है
भारहीन और पंखदार (क्यों नहीं?)
बिजली से बँधे
मैंने वह आवाज न जाने कितनी बार नीन्द में सुनी है
और कितना अद्भुत है कि, मैं ज्यादातर समझ गया हूँ
एक अपार्थिव आवाज में अनुशासन या प्रार्थना
दिन करीब आ रहा है
दूसरा भी
तुम वही करो, जो कर सकती हो

एकमात्र
घाटी और इसके सारे जंगल पतझड़ी रंग में रंगे हैं
एक मुसाफिर आता है. उसे एक नक्शा यहाँ ले आया
या फिर उसकी याददाश्त, बहुत पहले कभी सूरज
जब सबसे पहले बर्फ गिरा, इस रास्ते से गुजरते हुए
वह प्रफुल्लित हुआ था, हर चीज में चमकते दरख्तों की,
चिड़िया की उड़ान की , पुल पर रेलगाड़ी की ताल थी
गति में उत्सव. वह कई बरसों के बाद लौटा, उसे कुछ नहीं
चाहिए था, सिवाय एक चीज के, एक महत्वपूर्ण चीज के
वह देखना चाहता था, पवित्र और सहज, अनाम
बिना किसी आशा, भय या आशा के
उस तट पर, जहाँ न कोई " मैं" या फिर " ना-मै" हो।
अनुवाद रति सक्सेना
इन कविताओं के अनुवादों का बिना अनुमती के उपयोग करना मना है।
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