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सिर्पी बालसुब्रहमण्यम तमिलनाडु के लब्धप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपके 17 कविता संग्रह और 8 निबन्ध संग्रह हैं। आपके अनेक शोध ग्रन्थ भी हैं।

आपकों साहित्य के क्षेत्र में अनेक पुरस्कार प्राप्त हुए है। संप्रति आप साहित्य अकादमी में तमिल बोर्ड के अध्यक्ष हैं। इन कविताओं का अनुवाद पद्मावती ने किया है, जो अनुवाद के क्षेत्र में सतत कर्मशील हैं।

 

सिर्पी बाल सुब्रहमण्यम की कविताएँ

अनुवाद: डा वे पद्मावती (तमिळ से)

तितली

अरी तितली!
किसका हो तुम अनुवाद?


अनूदित हुई क्या
बहती नदी की चमकीली त्वचा से?
या फिर
भोर में खिले पुष्पों के
प्रातःकालीन स्वप्नों से?
या फिर
हरी नसों वाले पान के कोमल पत्तों से?

क्या तुम अनूदित हो
नवयुवतियों की
सघन अलकों वाली पलकों से?

तुम जब फैलाती पंख
दिखती नकली आँखें
क्या अनूदित हुई तुम नाग के फण से?

क्या तुम अनूदित हो
कोमल तन और श्वेत रेशमी
बादल के नन्हे-नन्हे टुकड़ों से

छूते ही चिपकने वाले
तुम्हारे परों का भूरा रंग
अनूदित है क्या हिरोशिमा से?

यह नील रंग तुक्हारा
क्या बना है
साक्रटीस के अन्तिम प्याले से?

यह तुम्हारा कत्थई रंग
निकला है क्या
बाण बिद्ध कौञ्च पक्षियों के रक्त से?

और यह श्वेत रंग
क्या मिला है तुम्हे
नोवा की नाव के कबूतरों से?

और पीत वर्ण
मिला क्या पश्चिमी पर्वतीय घाट के
कटहल के कोयो से?

क्या मिला तुम्हे यह श्याम रंग
आदिकालीन शून्य के गाढ़ अंधकार से?

तितली बुदबुदाती हुई
उड़ गई‍
" इस धरती पर वास्तविकता
के लिए कहाँ स्थान ?"

जहाँ भी देखो.....

खड़े होने पर नजर आते
कदम बढ़ा पास आने पर दूर जाने वाले
इस तारे से मुझे पुकारने वाले?

क्या वह मैं स्वयं हूँ!

धरती में अम्बर है
अम्बर में धरती!

*

अंधकार
प्रकाश का अभाव नहीं
रोशनी को
छानने की चलनी है

दिन
रात का विलोम नहीं है
अंधेरे का
पतला घोल है

*

मरुस्थल के पाताल में
स्थित है समुद्र
तभी तो वे
गर्वान्वित होते हैं
पाँव पसारते हुए

*

मृत्यु का अर्थ
समाप्ति नहीं है
एक सीमा को
पार करना है

*

रोना है
चेहरे की माँसपेशियों में
कंपन,
और उनका चलन ही
मुस्कुराहट है

हम ही है जो
दोनों को अलग-अलग
समझते हैं

*

हर वस्तु पूरी तरह से
सम्पूर्ण नहीं
अथवा
अधूरी नहीं

परिपूर्णता में
अभाव है
अपूर्णता में
पूर्णता है।

*

देश काल लुप्त होता है
व्याप्त होने के लिए

*

गाँव की नदी

कहाँ से आई
यह नदी?

क्या टूट गया
पर्वतों का मौन?
या फट गया
अम्बर का वस्त्र?
क्या खुल गया
वनों का रहस्य

नहीं....

मुझसे निकल कर
मेरे अंतरंग के
स्रोतों को खोलकर
मेरे वक्षों को
पुलकित कर
मेरी रक्त नालिकाओं में
पुष्प पल्लव की सुगन्ध भर
मुझे नहलाती
मुझ में ही लीन होती...

उधर से आती है
यह नदी!

यहाँ भी हैं
नन्हे कान्हा
नाग के शीश पर चढ़
बांसुरी बजाने वाले
यही है मेरी यमुना

अन्तिम समय
थक कर लेटने के लिए
हरिश्चन्द्र का श्मशान और
आग्निस्नात अवशेषों के लिए
माटी के कुंभों को
अपने गर्भ में समाने वाली
गंगा भी यही है...

यह मेरी कावेरी है
जो कभी नहीं झगड़ती
पड़ोसी राज्यों से

*

इसमें संगम है
नमकीन और दुधिया नदी का
इसमें है मेरे रक्त का नमक
और माँ का दूध भी

इसी के किनारे रचा
वह काव्य, जो कभी पढ़ा नहीं गया
वह इतिहास, जो अब तक लिखा नहीं गया...

इसकी लहरे निपुण हैं
पत्थरों से शिल्प बनाने में
दिन में चलते चित्र
रातों में
दूरस्थ हवाओं की
बाँसुरी से हिलता पारद

*

दूसरों को आहार बनाने वाली
मछलियाँ इसकी बनती
दूसरों का आहार

मैं भी बनूंगा
इस नदी का आहार कभी

*

मैं लेटा इसकी चटाई पर
मैंने चेहरा देखा अपना इसके आइने पर
यह मेरे प्यार की वीणा है
यह मेरे एकांतों का शयन कक्ष है
यह मेरे निःश्वासों की प्रतियोगिता स्थाल है।

असह्य भार से लुढ़कने वाला
बड़ा सा आँसू है

यादों को पंजीकृत करने वाला
सफेद कागज है

दुखों का नाला
खुशियों का सागर है
मेरी नील रक्त वाहिनी
मेरी आदिम कविताओं की
नाभि नाड़ी है
मेरी अन्तिम वसीयत का
दस्तावेज है

*

वक्त के कंधों पर
परिक्रमा करने वाली
इस महान कविता के
अक्षरों के बीच स्थित
मौन हूँ मैं!
 

सूरज की परछाई

मेरे
मन के लोक से
एक खण्डित ध्वनि....

*

किसकी परछाई हूँ
मैं?

पिता की? दादा की?
या फिर पड़ दादा की?
अपने अनगिनत पूर्वजों की
बढ़ती कतार?

"...इसके हाथी से कान
अपने दादा की तरह!
"..इस उम्र में ही गंज?
खानदानी जायदाद है..."

*

किसकी परछाई हूँ
मैं?

क्या धूल हूँ
अपने गाँव की
या फिर
एकान्त तपस्या में लीन
पीपल का पेड़ हूँ?

तीव्र गतिशीला
फेन उगलती नदी हूँ?

"न जाने कहाँ जा मरा
जा कर देखों पीपल के पेड़ के नीचे
गुल्ली डण्डा खेलता होगा"

"अरे क्या सोचते हो मेरे बारे में
मैं आळियारु नदी का पानी पी
हुआ हूँ बड़ा"


किसकी परछाई हूँ
मैं?


देवी मन्दिर के दीप की
चंचल दीप शिखा हूँ?

सीढ़ियों से चढ़
पळनि पर्वत पर स्थित मन्दिर हूँ
जैन,बौद्ध और वैष्णवों की
चौकी दौड़?

" पुजारी पर दैविक शक्ति आती है
भय लगता है"

"कुमार देव की कावड़ की तरह
फाइलें उठाता हूँ"

"हमेशा ही निरामिष
भोजन करता हूँ।"


किसकी परछाई हूँ
मैं?

भंवरों की गुंजार से युक्त
महावृक्षों से घिरा यह वन?
चीता?, चिम्पाजी?
वनों का संगीत सुनाने वाले
झरने?

" उसका चेहरा देखो...
पूर्ण रूप से जंगली है"
"यदि एक पूंछ हो तो
वह बन्दर ही लगता है"


किसकी परछाई हूँ
मैं?

काले घने अंधकार को
ओढ़ने वाला
निष्कृष्ट कीट हूँ?

कालिमा की रेख
मुझ पर पड़े तो
नीग्रों बच्चे की
काकड़ीनुमा हँसी की तरह
आदि सूर्य का
ज्योतिपुंज
मुझमें समाया रहता है
सदैव!
 


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