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पिछले दिनो मुझे वीसा लेने के लिए यूरोपियान देशों के वीसा- आफिस जाना पड़ा। फार्म भरते वक्त मैंने शायद जिद की वजह से कार्य - कवि और रोजगार ‍- आत्मनिर्भर (self employed) भरा था। जाने का मकसद भी कविता वाचन था। हालाँकि मेरे पास सारे आमन्त्रण थे, फिर भी वीसा खिड़की पर बैठी भारतीय लड़की के चेहरे पर बड़ी परेशानी झलक रही थी। उसने शायद इससे पहले किसी को इतनी बेशरमी से अपने को कवि घोषित करते हुए नहीं देखा होगा, उस ने मुझ से दो तीन बार पूछा- आप काम क्या करती हूँ, मैंने एक ही जवाब हर बार दिया, कविता और कविता से सम्बन्धित कई काम। फिर वह बोली- आप केवल कविता के लिए दूसरे देश क्यों जाना चाहती हैं, इसका जवाब मेरे पास तुरन्त तो नहीं था, वह फिर बोली कि प्रचार के लिए, तो मैंने कहा कि यह आमन्त्रण विदेश में बसे भारतीयों की तरफ से नहीं, बल्कि उन देशों की अपनी भाषा की साहित्यिक संस्थाओं से है,इसलिए बात प्रचार की नहीं, देश की कविता को विदेश में अपनी भाषा में ले जाने की और उनकी कविता को अपने देश में लाने की है। लेकिन वह लड़की रटे -रटाये जवाब की उम्मीद कर रही थी। उसे मेरे जवाबों से सन्तुष्टि नहीं हो पा रही थी। मैंने फिर उससे कहा कि हम दूसरे देशों में जाकर संगीत सभाएँ भी तो करते हैं, क्रिकेट खेलते हैं, वो भी अपने देश का पैसा खर्च करके। यदि कोई साहित्य लेकर जाए तो परेशानी की क्या बात है? इसपर वह असली मुद्दे पर आ गई- आपने लिखा है कि (self employed) , तो आपकी आमदनी का जरिया क्या है, उसके हाथ मेरा बैंक अकाण्ट था, जिसमे उतनी रकम तो थी, जितनी वे चाहते हैं। फिर भी उसका यह सवाल कविता के अस्तित्व को चुनौती की तरह था। और मैं उससे झूठ भी नहीं बोल सकती थी। मैंने कहा कि मेरी कमाई का जरिया कविता नहीं, बल्की अध्यापन है जो अनियमित होते हुए भी मुझे आर्थिक सहयोग देता है।

इतने दिनों बाद मैं यह सोच रही हूँ कि भारतीय कविता अभी तक व्यवसायिकता से अछूती है, इस बात को कविता से दूर रहने वाला तक जानता है। चित्रकारों के चित्र और शिल्पकारों के शिल्पों, संगीत कारों के संगीत आदि सभी कलाओं से धन उपार्जन संभव है, लेकिन कविता से नहीं। हालाँकि इन सभी कलाओं की कविता से तुलना की जाती है, लेकिन धन के मामले में कविता काफी पिछड़ी है। कविता व्यवसाय नहीं शौक माना जाता है। लेकिन शौक तो मन बहलाने का माध्यम है, और कविता में मन बहलाना मात्र दस प्रतिशत कर्म है। कविता एक जुनून है जो जिस के सिर चढ़े उसे जीने नहीं देता, कविता एक उपासना है जो जिससे हो पाए वह धन्य हो जाता है। लेकिन कविता व्यवसाय से सीधी तरह से जुड़ी नहीं है। फिल्म आदि में संगीत के पार्श्व में थोड़ी बहुत कविता होती है , लेकिन कर्मरत कवि कविता को उपासना ही मानते हैं।

क्या कविता को व्यवसायिकता से जोड़ा जा सकता है? यदि जोड़ा जाए तो क्या होगा? क्या कविता की प्रकृति पर असर पड़ेगा? रीतिकालीन युग में कविता को राज्य प्रशय मिला, बिहारी जैसे कवियों को धन सम्मान सभी मिला। लेकिन बिहारी आदि एक दो कवियों को छोड़ कर अधिकतर काल की गर्त में खो गए। कबीर, सूरदास आदि फक्कड़ कवियों ने अपनी वाणी को जन जन की वाणी बन दिया। तो इसका मतलब यह है कि कविता को धन की आवश्यकता नहीं, लेकिन धन नहीं तो क्या सम्मान भी नहीं मिलना चाहिए? कम से कम उसके महत्व को तो जानना चाहिए। मजे की बात यह है कि कविता के नाम पर बकवास सब पूरे समाज में प्रचलित है, लेकिन साहित्यिक कविता जन-जीवन से बिल्कुल अलग-थलग पड़ गई है। कविता की यह स्थित पूरे विश्व में है, फिर भी कविता लिखी जा रही है, और आज भी सबसे सुन्दर और सटीक अभिव्यक्ति के रूप में प्रयुक्त है... मुझे लगता है कि यह विरोधाभास ही कविता की जिजीविषा को बनाए रखता है, इसलिए इस बात की चिन्ता की जरूरत नहीं कि कविता का अस्तित्व को संकट है, यही बात हमे कविता के क्षेत्र में सतत करमरत रहने को प्रेरित करती है।

यह चौथे वर्ष का आखिरी अंक है, अंग्रेजी में यह अंक फिर से पोलिश कविता का है। अंग्रेजी में हम अनेक देशी विदेशी भाषाओं की कविता के विशिष्ट अंक निकाल चुके है, हर बार अतिथि सम्पादकों ने अच्छा काम किया , किन्तु हिन्दी में आज भी कृत्या किसी विशेष अंक का इंतजार कर रही है, हमें न ही कोई सहयोगी मिला है, ‌और न ही विशिष्ट अंक के लिए सामग्री, लेकिन हमने आशा नहीं छोड़ी है। आशा है कि हम भारतीय भाषाओं के अंक निकला पाने में सफल होंगे।

शुभकामनाएँ

रति सक्सेना

पत्र-संपादक के नाम                                                      
 


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