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आधुनिक भावबोध के कवि - कुंवर नारायण

दूसरे विश्वयुद्ध के बाद की घनघोर हताशा और निराशा का जबरदस्त प्रभाव वैश्विक ही नहीं वरन भारतीय कविता पर भी दिखाई दिया। भारतीय परिवेश में प्रयोगवादी कविता इस विचार से काफी प्रभावित रही। फिर भी नई कविता के दौर में अनेक कवियों ने इस विचारधारा से मुक्त हो कर भी कविता रची, जिनमें केवल हताशा या निराशा नहीं बल्कि जीवन से गहरा लगाव था। कुंवर नारायण जी का इस प्रसंग में उल्लेख किया जा सकता है। आपकी कविता में जीवन का यथार्थ का चित्रण तो है ही लेकिन कोरे विचार का बोझ नहीं है, कविता भाव और संवेदना को साथ लेकर चलती है। कविता के बारे मे आपका यह मत रहा है कि कविता शब्दों और भाषा के माध्यम से बाहरी जीवन के यथार्थ को देखने का माध्यम है, न केवल देखने बल्कि सोचने‍ समझने का भी माध्यम है, यह इतना महत्वपूर्ण है कि इसका और कविता का सम्बन्ध सीधा और सहज होते हुए बेहद जटिल भी हो सकता है। आपकी कविता में तर्क, विचार और चिन्तन की समिश्रित सघनता है, को जिन्दगी की अनुभूति को सघन व्याख्या देती है। अस्तित्व का प्रश्न नई कविता का केन्द्रीय प्रश्न है, कुंवर जी इससे टकराते हैं, किन्तु भिन्न मुद्रा में। वे मानते है कि अस्तित्व का प्रश्न विरन्तर प्रश्न है, इसलिए उसके विकल्प की तलाश भी एक विशिष्ट किस्म की प्रक्रिया है, और यह भी चिरन्तन है। आपकी रचनाओं-आत्मजयी और वाजश्रवा के बहाने आदि में यही व्यक्त हुआ कि जीवन और मृत्यु का प्रश्न नितान्त जटिल और शाश्वत है और इन प्रश्नों का महत्व इनके अस्तित्व में बने रहने से ही है। जीवन की सार्थकता को तलाशते हुए कवि कहते हैं‍ -

क्या है जीवन
कहाँ है वह? कहाँ खोजे उसे
किस देश किस काल में?

इस प्रकार कवि दार्शनिकता के प्रश्न को आज की सभ्यता का प्रश्न बनाता है। नचिकेता के पौराणिक कथा को आधुनिक सन्दर्भ देता है। यह आधुनिकबोध पाश्चात्य आधुनिक बोध का घनघोर अनुगामी नहीं है। यहाँ भारतीय जीवन का कालबोध नजर आता है , जो जीवन को खण्ड खण्ड नहीं सम्पूर्णता में देखता है।

वह आज भी वैसा ही है
जैसा कोई आज रहा होगा
इस आज से कहीं बहुत पहले

विश्वनाथ प्रसाद तिवारी जी इसके बारे में कहते हैं कि अछोर अतीत है पीछे, अनन्त अंधकार है आगे। बीच में अथाह जीवन, जो केवल मानवों का नहीं, सम्पूर्ण सृष्टि का है और जो खण्ड में नहीं बल्कि अखण्ड काल की निरंतरता में प्रवाहमान है।

कुंवर नारायण जी ने विश्व भ्रमण किया है, जिसका प्रभाव अनुभव संसार पर पड़ना स्वाभाविक है, किन्तु यह समझना भ्रामक होगा कि आपकी कविता पर अंग्रेजी कविता का प्रभाव है। आप बन्द किस्म की भारतीयता से मुक्त रहते हुए भी ठेठ भारतीय दार्शनिक दृष्टि रखते हैं।

यह सही है कि कुँवर विचारधारा के प्रति रूढ़ नहीं हैं, किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि उनकी कविताएँ सामाजिक सरोकार से दूर हैं, या आपकी कोई सामाजिक दृष्टि ही नहीं है। वस्तुतः आपके लिए सामाजिक सरोकार का अर्थ व्यापक है। आप व्यक्ति और समूह के बीच जो सम्बन्ध देखते हैं वह द्वन्द्वात्मक है और समूह के समक्ष व्यक्ति की अस्मिता समाप्त नहीं हो जाती है। आपका मानना है कि मार्क्सवाद दुनिया को समझने का एक विज्ञान है और काफी सटीक है ।

वस्तुतः कुंवर जी कविता में विचार की सीधी मौजूदगी को स्वीकार नहीं करते हैं, कविता का लक्ष्य मनुष्य का जीवन है, इसलिए उसमें विचार कामहत्व तो है, पर देखने की बात है कि वह कविता में सीधे‍‍‍-सीधे तो नहीं आ रहा है। ऐसा होने पर कविता राजनैतिक नारा बन कर रह जाएगी, और इस तरह की कविताएँ बहुत पसन्द नहीं किया जा सकता है। आपका मानना है कि साहित्य को खास तौर से कविता को उन ताकतों में नहीं गिना जा सकता जो दुनिया को बदल देगी। यह फौजी किस्म का एक्शन नहीं बल्कि विनम्र सांस्कृतिक प्रयास है जो हमारे निजी और सामाजिक मन को मानवीय भावनाओं के प्रति सजग रख सकती है। यह चेष्टा इतनी सुकुमार और मूल्यवान है कि उसे पूरी कोशिश से बचाए रखना जरूरी है, अगर हम सभ्यता और बर्बरता में फरक बनाए रखना जरूरी मानते हो तो। जिजीविषा या जीवन शक्ति का अर्थ केवल सबसे ताकतवर का अपने को बचाए रखना नहीं है, वह विवेक शक्ति भी है जो सुन्दर और कोमल को बचानें में सक्षम हो। एक समाज और संस्कृति के सामर्थ्य को इस रूप में भी देखना समझना जरूरी है कि उसमें कलाएँ और कविता कितना स्वतंत्र और सुरक्षित अनुभव करती हैं।

कविता के सामाजिक सरोकार को स्वीकारते हुए भी कुंवर नारायण जी परोक्ष को महत्व देते हैं, तो यह जीवन से पलायन का सूचक नहीं हैं। वस्तुतः वे जीवन की समग्रता में विश्वास रखते हुए जीवन को एक रूपीय रेखीय रूप में नहीं बल्कि बहुरूपीयता में देखते हैं। वे जीवन को मात्र ठोस रूप में न देखते हुए इतिहास, स्मृति, और शृद्धा के आईने में देखते हैँ। कवि के लिए समय टुकड़ों में नहीं बँटा है, उसमें एक निरन्तरता है जो प्रवाह देती है।

एक अथक कथावाचक है समय
ढीठ उपदेशक है कालचक्र
दुहराता पिछले पाठ
लिखता कुछ नए पृष्ठ
जीवन का महाग्रन्थ
एक संकलन के प्रारूप में नत्थी
पिता पुत्र दृष्टान्त की
असंख्य चित्रावलियाँ

संवेदना और भाषा की सघनता, विडम्बना का प्रयोग और कविता में नाटकीयता कुंवर जी के शिल्प की कुछ खास विशेषताएँ हैं।

प्रस्तुति

लताश्री

C T .S कालोनी
हजारी बाग
बिहार
 


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