












कृत्या प्रकाशन की पुस्तकें
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जेड
दासिमय्या के वचन
जेड दासिमय्या बारहवीं सदी के भक्त कवि हैं, जो कबीर की तरह
जाति के जुलाहे थे। उनका स्थान कर्णाटक और उत्तर केरल का मध्य भाग
था। आपकों कर्णटक में आज भी भक्त कवि के रूप में मान्यता प्राप्त
है।
अनुवादक श्री शैल प. कळसद्
*
मुझे न चाहिए हाथी
मुझे न चाहिए सम्पत्ति
मुझे ना चाहिए साम्राज्य
तुम्हारे शरणों की सूक्ति के वचन
पल भर के लिए भी सुनने दोगे स्वामी
मैं दे दूंगा तुम्हे रामनाथ।
*
बिना कील, पहिए की गाड़ी
गिराए बिना नहीं रहेगी
गाड़ी का आधार कील है
बड़ी घमण्डी तन गाड़ी के लिए
शिव शरणों की बानी ही कील है
हे, रामनाथ।
*

मणियों के सूत्र समान
तुम हो त्रिनयन।
गिनने से तन भिन्न
आत्मा एक ही
अणु-रेणु के भीतर
गुण सम्पन्न तुम्हें मानकर
करता नमन हे रामनाथ!
*
सागर पर रखी धरती ऐसी
कि ना पाए पिघल
अम्बर को ताना ऐसे कि
नींव ना खम्भ
हे रामनाथ, सिवाय तुम्हारे
कौन देव यह कर पाए?
*
कहते हैं ढोया धरती को
अही कूर्म, दिग्गजों ने
है क्या आधार इन ढोने वालों का
जो इस भेद को बूझे
दिखाओं उन्हें रामनाथ!
*
भुजंग पर भूमि पसार रखी
अंजुरी जल से भरे सात सागर
हरि ब्रह्मादि देवों को
तरह- तरह के लोक देकर
रह गए अनजान, हे रामनाथ!
*
पेड़ के अन्दर मंदाग्नि रखी- न जले ऐसी
फेनिल दूध में घृत रखा-गंध न दे ऐसा
तन के भीतर आत्मा रखी ऐसी कि
तुम्हारे मेल मिलाप का भेद
जान मैं चकित हूँ रामनाथ!
*
थन में दूध छिपा
घी में गंध छिपा
हे शिव, तुमने प्रकृति में प्राण छिपाया
कैसे समझे तुम्हारे भेद को
जड़ मानव, हे रामनाथ!
*
भीतर तेल, पर भीगता नहीं तिल
भीतर आग, पर फटती नहीं शिला
कामवासना है, पर भोगे नहीं स्त्री
परवस्तु से प्रेषित प्राण, प्रकृति में न सरसता
कैसे समझे तुम्हारे भेद को
जड़ मानव, हे रामनाथ!
*
ज्ञानहीन गुरु
मन्दमति शिष्य को
दे जो उपदेश
अंधे को ठेले अंधा जैसे
हे रामनाथ!
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संसार विषय, माया प्रपंच
छूट गुरु करुणा से
गुरु चरण स्पर्श से, हुआ मैं मुक्त
हे रामनाथ!
*
घट में ज्यों सूरज दिखे
सब में है चैतन्य वैसे
पर संभव नहीं पाना सबको
बिन गुरु ज्ञान न होवे रामनाथ!
(वसब मार्ग से साभार) |
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