लीलाधर जगूड़ी

दुविधा में आत्मा

आत्मा ने रोटी खाई
तो और भी आत्मनिर्भर हो गई
कपड़े पहने
तो और भी व्यवस्थित होकर सँवर गई
जूते पहने
तो और भी निर्भय होकर चलने लगी

पानी पिया तो शरीर में और भी तृप्त लगने लगी आत्मा
पेड़ ने जैसे नदी को
नदी ने जैसे असम्भव को
अपने भीतर खींच लिया हो

आत्मनिर्भर, आत्मविभोर
आत्मतृप्त क्षणों से गुजरती आत्मा को
कुछ आत्महीनताएँ
आत्मनिर्वाण की ओर ले जाने की सोच रही हैं

जबकि रोटी, कपड़े और जूते ने उसे पानी पीते ही
कुछ अधिक मानवीय स्वतंत्रता की ओर
ले जाने की सोची है।

(लीलाधर जगूड़ी की अन्य कविता)


गीत चतुर्वेदी

लोकतन्त्र

फल सब्जी लेते समय मुझे सिखाया गया है
फल सब्जी को चुनना
इस चुनने पर एतराज नहीं ठेलेवालों को भी मैं बहुत छाँट
छाँटकर चुनता भिंडी पाती उठा निहारता दस बार गोभियों को
चमकते सेबों को सूंघकर जाँचता
झाँकता प्याज के सिर कितनी चकरी बनती हैं
लौटकर आता और पाता
चुनने की निर्थकता सेब आलू में बदल चुका होता प्याज से
आती सदियों पुरानी बू

(गीत चतुर्वेदी की अन्य कविता)


सुमन राजे ( स्मृति में)

समाधि लेख

वे मेरा समाधि लेख लिख रहे थे
कल रात
उन संज्ञा, सर्वनामों और विशेषणों का
प्रयोग करते हुए
जो खड़े थे अपने अर्थ के बिल्कुल विपरीत
पकड़कर लाए बँधुआ बाल मजूरों से
वे लिख रहे थे मेरा समाधि लेख
खिड़की के बाहर मैने देखा
आसमान धुआँ हो गया था
और धुआँ कोहरा
और कोहरा बरसती बून्दें
और बून्दें प्यास
और प्यास जमी हुई उदास नदी।
पेड़ ठीक आदमियों की तरह खड़े थे
तटस्थ, जड़
घौंसलों की हलचलें खामोश
चर्चा थी डालों पर गिलहरियों में
दुनिया के सारे मौसमो नें
मुअत्तिल कर दी महकने की कोशिश
मुझे मालूम था, वे मेरा मृत्यु लेख लिख रहे थे
अब मुझे सो जाना चाहिए।
फिर अचानक मैंने
जूही की कली को इठलाते देखा
वर्जित ठाँव पर फिर फिर बाँधी नाव
सीढ़ियों पर धूप में बैठकर
आत्महत्या के विरुद्ध मुट्ठियाँ बाँधी
कुआनों नदी के किनारे किनारे चली
मिली गलबहियाँ सखियों से
ब्रह्म राक्षस से किए दो दो हाथ
एक नींदहीन सपनों से भरी रात गुजार कर
अल सुबह! मैंने पाया
मैं हूँ!
लोगों! देखो-सुनों
पेड़ों, चिड़कुलों, गिलहरियों
कुहरा, आसमान, नदी सब सुनो
मैं हूँ
और वे मेरा-
समाधि लेख लिख रहे थे

(अहमदाबाद आकार से साभार)

(सुमन राजे  की अन्य कविता)
 


शैलेन्द्र चौहान की कविता

बहुत दिनों बाद

फिर कितने दिनों बाद
पकड़ी मैंने कलम
लिखी कविता

फिर कितने दिनों बाद
बादल घिर आए
हम बौखलाए
कायम रही गर्मियाँ
रहे हम सुर्खियों में

फिर कितने दिन सोचा
चलो गाएँ बजाएँ
कितने दिन देखा
बीमारों से खचाखच
अस्पताल।

फिर पड़ा अकाल
उठा दंगो का सवाल
कितने लोग हुए हलाल
फिर खाकी वर्दी का आतंक
जेल के सींखचों के
पीछे लोग बेहाल
फिर शातिर अपराधियों का बोलबाला
सच्चे का मुँह काला
फिर धनिया और गोबर हुए
पाँच रुपये के मोहताज
फिर राजा चौपट के सर पे ताज
फिर देश का वही हाल
फिर मुझे हुआ मलाल
कितने दिनों बाद!

( शैलेन्द्र चौहान की अन्य कविता
)
  


सुभाष रस्तोगी की कविता

मुझे माफ करना

मुझे माफ करना
रास्तों
मेरे हमसफर पेड़ों
वनस्पतियों
चींटियों
और तिलचट्टों
सभी मुजे माफ करना
मैं तुम पर
कोई कविता नहीं लिख सका

हवाओं और मौसमों
माफ करना
तुमने तो हमेशा
सही वक्त पर दस्तक दी
मेरे द्वार पर
लेकिन मैं ही
कभी तुम्हारी अगवानी नहीं कर सका
माफ करना
तस्वीर बनकर
दीवार पर लटके मेरे पुरखों
कि मैं कभी तुम्हारे फ्रेम से
धूल तक साफ नहीं कर सका
मुझे माफ करना
मेरे सहयात्रियों
कि मैं अपनी उंगली की जरा सी
चुभन से तो चीख पड़ा
जब तब तुम्हारी चीखों को
अनसुना करता रहा

मैं बेहद शर्मिन्दा हूँ
अपने उन साथियों के प्रति
जिनकी उम्मीद की गाड़ी
आई ही नहीं कभी स्टेशन पर
और ऊसर से फूटने वाली
पतली जलधार के लिए
जो भटकते रहे दर-ब-दर
मैं लताओं के प्रति भी
बेहद शर्मिन्दा हूँ
जिन्हे समय पर कभी
अंजुरी भर पानी भी नहीं दे सका मैं
और वे शून्य में टकटकी लगाए
बलि चढ़ गई काल-चक्र के

मैं जिन्दगी के तमाम/अहम सवालों से
माफी माँगता हूँ
कि हर बार बड़ी चालाकी से
उनके जवाब टाल गया
समय-देवता
ध्यान न देना तुम मेरी मूढ़ता पर
जब भी मिला तुमसे
अपनी हीनताओं को छुपाया
और झूठ बोला
छुपन-छपाई का खेल खेलता रहा
मैं हमेशा/अपने आप से भी
इसलिए क्षमाप्रार्थी हूँ मैं स्वयं से
हर दरो- दीवार से
हर दोस्त हर दुश्मन से

लेकिन मेरी कविता खफा न होना मुझसे
क्योंकि मैं तुमसे कभी झूठ नहीं बोला
जो शब्द मिले विरासत में
ऋषि ऋण के रूप में
उन्हें स्वीकार कर
सही अर्थों में तराशने की कोशिश की
और मेरी यही कोशिश
आज तक जारी है!

(अहमदाबाद आकार से साभार)


पराशर गौर की कविता

भूख

जब कई मुझ से पूछता है कि,
क्या, तुमने कभी
नियति को देखा है ?
तो,
न जाने क्यूँ तब
मेरी निगाहें बरबस
मेरी हथेलियों की रेखाओ पर जाकर टिक जाती है
और
ढूंढ़ने लगती है उन रेखाओ के बीच फसे
मेरे मुकद्दर को ...

सुना है रेखाए भाग्य की
प्रतिबिम्ब होती है
जिसमे छुपा होता है हर एक का कल !

कल किसने देखा है
आज जिंदा रहूंगा तो कल देखूंगा ना
अगर बच गया तो,
फिर से सारे शब्द, नियति,संयम
रचने लगेगे अपने अपने चकब्यूह
मुझे घेरने का !

इससे अच्छा तो मै
अपनी हथेलियों को बांध कर रख दूँ
आज पसर के सो जाता हूँ
नियति से कल निपट लेगे !

(पराशर गौर की अन्य कविता कविता)
 


मेरी बात | समकालीन कविता | कविता के बारे में | मेरी पसन्द | कवि अग्रज
हमसे मिलिए | पुराने अंक | रचनाएँ भेजिए | पत्र लिखिए | मुख्य पृष्ठ