पराशर गौर
 


पराशर जी कनेडा में रहते हैं, और हिन्दी साहित्य से विशेष ममता रखते हैं, अपनी जमीन से दूर रहते हुए जिस तरह की रिक्तता का अनुभव होता है, वही उनकी कविता में स्वर बनता है जो मानवता के काफी करीब होता है।

समय

जब भी कोई चीज़
इजाद होती है , तो
उसका अंत भी ,
साथ जन्म ले लेता है !

हमारा खेल भी समाप्त होने वाला है
क्योकि .......
हम सब बारूद के ढेर पर बैठे है !

इस सभ्यता के युग में सब
हथियारों के पीछे दौडे जा रहे है
ये दौड़ .......
कब, कहाँ समाप्त होगी
ये तो आने वाला कल ही बताएगा !

वो कल...
अवश्य आयेगा
जब,
सब कुछ समाप्त हो जायेगा
पीछे छूट जायेगा
एक इतिहास !

जिसमे दफ़न होगी
मानव द्वारा निर्मित अन्वेषणों के
संहार की सिलसिलेवार दास्ताँ !

मुझे ...,
अपने मरने का कोइ गम नहीं
गम है तो इस बात का
कि, ईश्वर द्वारा निर्मित मानव
इतना बीभत्स, इतना क्रूर भी हो सकता है
जो, मानव, मानव के
खून का प्यासा हो !

शायद
फिर से एक नये माहाभारत के
होने कि आशंका है
इस महाभारत में ना तो
कृष्ण, ना हज़रात
और ना ही ईसा मसीहा
होगा तो केवल एक "एटम"
जो मानव को
हमेशा हमेशा के लिए मिटा देगा !

पता नहीं
तब, कोई शांति का मशीहा
पैदा भी होगा या नहीं
हां, इतना जरूर है कि तब तक
बहुत देर हो चुकी होगी !
मानव मानव के लिए तरसेगा
सनद रह जायेगी .केवल
बारूद धुँआ!
बस धुँआ!
 


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