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किन्तु जो बात
मुझे चिन्तित कर रही है, वह यह है कि आज का साहित्य अभाव के साथ
नही खड़ा है, आज साहित्य लाभ चाहता है, वह भावनाओं का व्यापारीकरण
चाह रहा है। .......
अब हमे सोचना है कि हम जो रच रहे हैं वह मात्र स्वान्त सुखाय है,
या फिर कुछ सोचने को भी मजबूर करता है।
रति सक्सेना
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घुटने अड़ने
लगते हैं, चश्मे चढ़ने लगते हैं
बातें जो कहनी हैं, रह जाती हैं
अर्थ समझ में पहले से ज्यादा आने लगते हैं
फूल तोड़ना चाहते थे, अब डाली पर ही भाता है
!!
अनूप सेठी
कि तुम अब
उसके साथ ही रहोगे
और किसी को कभी भी
उसके काँधे पर बन्दूक नहीं रखने दोगे
उसके रस्सी जैसे बालों में
हाथ फिरा कर
उसे खूब प्यार करोगे
कृष्ण किशोर
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आखिर क्या कारण है कि भारतीय
भाषाओं पर गहरे संकट की बात करने वाले इस समय में कविता रचना के
उत्साह में कमी नहीं आई है । भाषा से दूर भागने वाले युवक भी
साहित्य से अपने आप को काट नहीं पा रहे हैं । यहाँ पर हम केवल कविता
की बात कर रहे हैं, कविता के संस्कार की नहीं। ..... आज जब
व्यक्ति भीड़ में अकेला पड़ता जा रहा है कविता को लेकर कई प्रयोग किए
जा सकते है । कविता एक ऐसी थैरोपी के रूप में उपयोगी हो सकती है....और »
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सलीब का मार्ग
सोने की कुटिया छायी
सोने के फूस का गठ्ठर बनाया
सोने से रेशम
संगमरमर की मरियम गढ़ी
वे इंतजार में हैं प्रभु
तू क्यों जन्म नहीं लेता ?****
एक लहर नहीं है सागर
एक पेड़ नहीं है कानन
एक रंग नहीं है इन्द्रधनुष
एक स्वर नहीं है संगीत
महिते , भारत वसुधेdir="ltr">
अय्यप्पा पणिक्कर
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अरणि पुष्प सी
मैं हुई पीली
सावन की उजली चमेली
कब लौट मुझे वे दर्शन देंगे
झेल रही हूँ उलाहने नित
आँच विरह की दग्ध किए है
कौन उसे जा हाल बखाने
कब लौट मुझे वे दर्शन देंगे
कंद मिश्री की आरटी उतारी
फिर छल कर मुझे कहाँ गये
बीच सबों के उपहास किया
कब लौट मुझे वे दर्शन देंगे
अरुणिमाल
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